पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की एक स्टडी में चेतावनी दी गई है कि चीन के शहरों पर परमाणु आतंकवादी हमले का खतरा हो सकता है। साथ ही, इसमें जापान की परमाणु क्षमताओं और उसके "री-मिलिटराइज़ेशन" (फिर से सैन्यीकरण) की कोशिशों को लेकर चिंता जताई गई है। स्टडी में कहा गया है कि बड़े पैमाने पर वैश्विक परमाणु युद्ध की संभावना काफी कम है। हालांकि, इसमें यह भी चेतावनी दी गई है कि देशों या आतंकवादी समूहों द्वारा छोटे परमाणु हमले की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। स्टडी में कहा गया है अगर कुछ देश या आतंकवादी समूह ऐसा जोखिम उठाते हैं, तो इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि चीन के शहरों पर परमाणु आतंकवादी हमला हो सकता है।
इस रिपोर्ट में एक ऐसी स्थिति का मॉडल तैयार किया गया जिसमें चीन के एक बड़े शहर पर कम क्षमता वाले परमाणु हथियार (जिसमें छोटे स्तर के टैक्टिकल हथियार भी शामिल हैं) से हमला होता है। 1945 में हिरोशिमा पर हुए परमाणु हमले के डेटा और दुनिया भर में किए गए सिमुलेशन के आधार पर, शोधकर्ताओं ने उन चुनौतियों का आकलन किया जिनका सामना हमले के बाद मेडिकल टीमों को करना पड़ सकता है। अध्ययन के अनुसार, आपातकालीन स्थिति में काम करने वाली टीमों को खतरनाक हालात, बड़े पैमाने पर सामाजिक अव्यवस्था और चोटों के जटिल मामलों से निपटना होगा।
चीन की तैयारी के बारे में स्टडी में क्या कहा गया
चीन ने परमाणु हमले के बाद होने वाले नुकसान से निपटने के लिए पहले ही 30 से ज़्यादा बेस वाला एक इमरजेंसी रेस्क्यू नेटवर्क बना लिया है। हालांकि, रिसर्च करने वालों ने कहा कि देश की मेडिकल रिस्पॉन्स क्षमता को और संसाधन और खास ट्रेनिंग देकर बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि स्थानीय अधिकारियों को एंटीबायोटिक्स और रेडिएशन से बचाने वाले उपकरणों सहित इमरजेंसी सप्लाई का पर्याप्त स्टॉक रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन सप्लाई को "युद्ध के लिए तैयार" (कॉम्बैट रेडीनेस) हालत में रखा जाना चाहिए। स्टडी में परमाणु और रेडिएशन सुरक्षा, रेस्क्यू प्रक्रियाओं और बचाव के उपायों के बारे में लोगों को और ज़्यादा जागरूक करने की भी बात कही गई। इसमें कहा गया कि ऐसी जागरूकता से इमरजेंसी के समय बेमतलब के व्यवहार और घबराहट को कम करने में मदद मिल सकती है। रिसर्चर का कहना है कि कम क्षमता वाले न्यूक्लियर आतंकी हमले से भी भारी जान-माल का नुकसान हो सकता है और कई तरह की गंभीर चोटें आ सकती हैं। इससे मेडिकल मदद देना, किसी आम न्यूक्लियर प्लांट में हुए हादसे के बाद की तुलना में ज़्यादा मुश्किल हो सकता है।
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