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तेलंगाना विधानसभा में स्पीकर रोए:BRS नेता पर आपत्तिजनक भाषा का आरोप, KTR-हरीश राव हिरासत में

तेलंगाना विधानसभा के स्पीकर गद्दम प्रसाद मंगलवार को सदन में भावुक होकर रो पड़े। BRS नेता पर उनके खिलाफ आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल करने का आरोप लगा है। विधानसभा के बाहर सोमवार को भी तनाव रहा। काले कपड़े पहने BRS विधायकों की सुरक्षा कर्मियों से बहस हुई। प्रवेश नहीं मिलने पर पुलिस ने KTR, हरीश राव और BRS के अन्य नेताओं को हिरासत में लेकर स्थानीय थानों में पहुंचाया। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने स्पीकर के अपमान की निंदा की और इसे ‘तेलंगाना के लिए काला दिन’ बताया। कांग्रेस ने BRS MLC टाटा मधु पर प्रसाद कुमार के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया है। हालांकि, टाटा मधु ने ऐसा कोई बयान देने से इनकार किया है। रेवंत रेड्डी बोले- 4 करोड़ लोगों का अपमान मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा, “यह तेलंगाना के लिए काला दिन है और तेलंगाना के 4 करोड़ लोगों का अपमान है। कल BRSLP यानी भारत राष्ट्र समिति लेजिस्लचर पार्टी की बैठक एक फार्महाउस में हुई। उनके सदस्यों को बुलाया गया। उनके नेता ने उन्हें इस तरह व्यवहार करने के लिए उकसाया और यहां भेजा। उन्होंने पुलिस व्यवस्था पर हमला किया और आज स्पीकर के खिलाफ ऐसी अनुचित भाषा का इस्तेमाल कर उनका अपमान किया।” रेवंत रेड्डी ने कहा कि स्पीकर के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा और उनके परिवार के सदस्यों के कथित अपमान को लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि स्पीकर का पद विधानसभा के सभी सदस्यों के बराबर है। उनके मुताबिक, कथित टिप्पणी पूरे समाज का अपमान है। CM ने कहा- यह गंभीर अपराध है रेवंत रेड्डी ने कहा, “कौन सा समाज इसे माफ करेगा? चाहे मध्यकाल हो, राजाओं का शासन हो, डोराओं यानी सामंती शासकों का दौर हो या लोकतंत्र, यह गंभीर अपराध है। इस विधानसभा कक्ष में स्पीकर के खिलाफ ऐसी आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया और परिवार के सदस्यों का भी अपमान किया गया।” उन्होंने कहा, “मेरे दलित और आदिवासी साथी सदस्यों को इसे दलितों और आदिवासियों का अपमान मानना चाहिए। मैं इसे पूरे समाज का अपमान मानता हूं। स्पीकर हम सभी के बराबर हैं। कोई डोरा हो सकता है, मैं रेड्डी हो सकता हूं या कोई ब्राह्मण हो सकता है, लेकिन एक बार जब कोई स्पीकर बन जाता है तो वह हम सभी के बराबर होता है।” कांग्रेस का आरोप, BRS MLC ने नकारा कांग्रेस ने आरोप लगाया कि BRS MLC टाटा मधु ने संवैधानिक पद पर बैठे दलित नेता प्रसाद कुमार के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की। हालांकि, टाटा मधु ने इस तरह का कोई बयान देने से इनकार किया। इस घटना के बाद तेलंगाना विधानसभा में राजनीतिक टकराव शुरू हो गया। सत्तारूढ़ कांग्रेस ने कथित टिप्पणियों की निंदा की, जबकि BRS नेता ने आरोपों को खारिज कर दिया। विधानसभा के बाहर 30-40 मिनट जाम BRS के विरोध प्रदर्शन के कारण तेलंगाना विधानसभा के बाहर ट्रैफिक भी प्रभावित हुआ। बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं और पुलिसकर्मियों के जुटने से करीब 30 से 40 मिनट तक जाम लगा रहा। प्रदर्शन कर रहे BRS नेताओं की टी-शर्ट पर “गारंटी लागू करने में कांग्रेस की विफलता” और “1000 दिन का शासन विफल” जैसे नारे लिखे थे। KTR बोले- 1000 दिन में एक भी वादा पूरा नहीं मौके पर पत्रकारों से बात करते हुए BRS के कार्यकारी अध्यक्ष KT रामा राव ने कहा कि कांग्रेस ने लापरवाह और झूठे वादे करके सत्ता हासिल की और समाज के सभी वर्गों को धोखा दिया। BRS के कार्यकारी अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने 420 वादे किए थे और उन्हें 100 दिन के भीतर लागू करने का भरोसा दिया था। उन्होंने कहा कि ये वादे बॉन्ड पेपर पर लिखकर भी दिए गए थे। KT रामा राव ने कहा कि 1000 दिन बीतने के बाद भी अब तक एक भी वादा पूरा नहीं किया गया है। इन आरोपों पर कांग्रेस की ओर से इस कॉपी में अलग जवाब नहीं दिया गया है।

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कॉर्पोरेट अपराध पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला:व्यक्ति आरोपी न हो, तब भी कंपनी पर चलेगा मुकदमा; जेल की जगह जुर्माना देना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कॉर्पोरेट आपराधिक जिम्मेदारी पर अहम फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इस वजह से किसी कंपनी के खिलाफ आपराधिक मामला खत्म नहीं किया जा सकता कि जांच एजेंसी ने उस व्यक्ति की पहचान नहीं की या उसे आरोपी नहीं बनाया, जिसके जरिए अपराध हुआ। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने सुनवाई के बाद फार्मा कंपनी सनोफी इंडिया लिमिटेड की अपील खारिज कर दी। कंपनी ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही खत्म करने से इनकार किया गया था। दवा खरीद से जुड़ा है मामला, फायदे के लिए रिश्वत देने का आरोप यह मामला BARC के लिए दवाओं की खरीद से जुड़ा CBI केस है। चार्जशीट में आरोप लगाया गया था कि BARC के एक अधिकारी ने सनोफी इंडिया के साथ मिलकर महंगी दरों पर दवाएं खरीदीं और गलत फायदा पहुंचाने के बदले रिश्वत दी गई। सनोफी इंडिया एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी है, जिसका मुख्य कारोबार दवाओं का निर्माण है। इस मामले में कंपनी के साथ उसका कोई कर्मचारी या अधिकारी आरोपी नहीं बनाया गया था। कंपनी ने दलील दी थी कि उसके खिलाफ मुकदमा चलाया ही नहीं जा सकता, क्योंकि उस पर आपराधिक मंशा यानी मेंस रिया नहीं थोपी जा सकती। कंपनी ने यह भी कहा था कि दोषी पाए जाने पर उसे जेल नहीं भेजा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने 98 पेज का फैसला लिखा जस्टिस जेबी पारदीवाला ने 98 पन्नों का फैसला लिखा। बेंच ने कॉर्पोरेट आपराधिक जिम्मेदारी के नियमों और किसी व्यक्ति के कृत्य व आपराधिक मंशा को कंपनी से जोड़ने के सिद्धांतों की विस्तार से जांच की। बेंच के सामने यह सवाल था कि क्या हाईकोर्ट को इस आधार पर कंपनी के खिलाफ शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही खत्म कर देनी चाहिए थी कि उसके साथ किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान नहीं हुई और उसे आरोपी नहीं बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपनी में "मेंस रिया" किसी जीवित व्यक्ति के कृत्य और मंशा को कंपनी से जोड़कर ही मानी जा सकती है। लेकिन कार्यवाही खत्म करने की मांग पर सुनवाई के चरण में किसी खास व्यक्ति की पहचान न होना अपने आप में अभियोजन के लिए घातक नहीं है। कोर्ट ने कहा, “भारतीय कानून के तहत स्थिति साफ है। किसी कंपनी पर ऐसे अपराध के लिए भी मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसमें सजा के तौर पर जेल जरूरी हो या मेंस रिया साबित करना जरूरी हो। कंपनी पर तभी मुकदमा नहीं चल सकता, जब अपराध में केवल जेल की सजा हो या अपराध की प्रकृति ऐसी हो कि उसमें व्यक्तिगत दुर्भावनापूर्ण मंशा जरूरी हो और कंपनी वह अपराध कर ही न सकती हो।” भास्कर नॉलेज- क्या है मेंस रिया एक कानूनी शब्द है, जिसका सीधा मतलब है— "अपराधी का इरादा" या "दोषी मन"।कानून की भाषा में किसी भी गलती को 'जुर्म' तभी माना जाता है जब वह जान-बूझकर की गई हो। 'मेंस रिया' का मतलब है कि क्या उस व्यक्ति का मन साफ़ था या उसने बुरा करने की नीयत से ही वह काम किया था। अगर नीयत खराब थी, तो कानून उसे 'मेंस रिया' मानकर सजा देता है। चार्जशीट में कंपनी का अपराध दिखना जरूरी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट को पहली नजर में यह दिखाना चाहिए कि अपराध कंपनी ने खुद किया है। कंपनी की भूमिका उसके काम, फैसलों और लेन-देन से जुड़े आरोपों से सामने आ सकती है। इसके लिए उस खास व्यक्ति का नाम देना जरूरी नहीं है, जिसने ये काम किए हों। कोर्ट ने कहा कि भारत और दूसरे देशों में कंपनियों को आपराधिक जिम्मेदारी के दायरे में लाया जाता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि कंपनियों के पास बहुत ज्यादा आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक ताकत होती है और वे गंभीर नुकसान पहुंचाने में सक्षम होती हैं। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह सवाल आसान लग सकता है, लेकिन करीब से देखने पर यह काफी जटिल है। उसने कहा कि कॉर्पोरेट आपराधिक जिम्मेदारी लंबे समय से कठिन विषय रही है। कोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे दो बुनियादी धारणाएं हैं। पहली, कंपनी अपने सदस्यों से अलग पहचान रखने वाली एक कृत्रिम इकाई है। दूसरी, कंपनी एक अमूर्त संस्था है। कोर्ट ने इसी संदर्भ में मशहूर कहावत का जिक्र किया कि कंपनी की कोई आत्मा नहीं होती, जिसे दोषी ठहराया जा सके और न ही शरीर होता है, जिसे सजा दी जा सके। व्यक्ति की पहचान के बिना भी मंशा का आकलन संभव कोर्ट ने कहा कि शुरुआती चरण में आसपास के तथ्यों और परिस्थितियों से मेंस रिया का अनुमान लगाया जा सकता है। इसके लिए किसी खास व्यक्ति की पहचान जरूरी नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किस व्यक्ति के कृत्य और मंशा को कंपनी से जोड़ा जाए, इसका विस्तृत आकलन ट्रायल के दौरान किया जाएगा। किसी व्यक्ति को आरोपी बनाना जरूरी है, इस दलील को भी बेंच ने खारिज कर दिया। फैसले में कहा गया कि कंपनी की सीधी आपराधिक जिम्मेदारी वाले मामलों में किसी प्राकृतिक व्यक्ति को आरोपी न बनाया जाना, अकेले कार्यवाही खत्म करने का आधार नहीं हो सकता। हालांकि, बेंच ने साफ किया कि कंपनियों को आपराधिक कार्यवाही खत्म करने के सामान्य नियमों से कोई विशेष छूट नहीं है। कंपनी की जिम्मेदारी तय करने के लिए 3 चरणों का ढांचा सुप्रीम कोर्ट ने यह तय करने के लिए तीन चरणों वाला नया क्रमबद्ध ढांचा बताया कि किसी व्यक्ति के कृत्य और उसकी आपराधिक मंशा को कंपनी से कैसे जोड़ा जाए। पहले चरण में कोर्ट को कंपनी के संवैधानिक दस्तावेज यानी आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन देखने होंगे। इससे पता चलेगा कि कंपनी की ओर से काम करने का अधिकार किसे दिया गया था। दूसरे चरण में यह देखा जाएगा कि यह अधिकार ऐसे व्यक्ति को सौंपा गया था या नहीं, जिसके पास पर्याप्त स्वतंत्रता और अपने स्तर पर फैसला लेने की क्षमता थी। इसके लिए उस व्यक्ति का आधिकारिक पद महत्वपूर्ण नहीं होगा। अगर पहले दोनों चरणों से स्थिति साफ नहीं होती, तो कोर्ट संबंधित कानून के उद्देश्य और नीति के आधार पर “विशेष आरोपण नियम” बना सकता है। कोर्ट ने कहा कि मेंस रिया अपराधों में कॉर्पोरेट आपराधिक जिम्मेदारी से जुड़े सवाल काफी मुश्किल होते हैं। इन पर आगे कानून बनाने और इस पूरे क्षेत्र के रिव्यू की जरूरत पड़ सकती है।

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'तीन साल से बात नहीं हुई, उनकी बहुत याद आती है', जेल में बंद इमरान खान को लेकर भावुक हुए वसीम अकरम

wasim akram got emotional over Imran khan health: पूर्व पाकिस्तानी तेज गेंदबाज वसीम अकरम ने अपने पूर्व कप्तान और दोस्त इमरान खान की सेहत को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की है. उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेदों से अलग इमरान को उचित और जरूरी चिकित्सा सुविधा मिलना प्राथमिकता होनी चाहिए. Wed, 9 Sep 2026 00:23:13 +0530

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