फेमस टीवी एक्ट्रेस करिश्मा तन्ना हाल ही में मां बनी है। इन दिनों अभिनेत्री अपनी मदरहुड जर्नी को एंन्जॉय कर रही हैं। करिश्मा तन्ना 42 की उम्र में मां बनी हैं। वहीं मां बनने के बाद शरीर में होने वाले बदलावों और रिकवरी को लेकर एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया पर अपनी जिंदगी की एक खास झलक शेयर की है। एक्ट्रेस करिश्मा तन्ना ने बताया कि इस दौरान उनका पूरा फोकस बच्चे के पोषण, खुद को सेहतमंद बनाए रखने और फिजिकल रिकवरी पर केंद्रित है। ऐसे में आज भी करिश्मा तन्ना का पोस्टपार्टम सीक्रेट जानकर खुद को फिट और हेल्दी बना सकती हैं।
पोस्टपार्टम रिकवरी का मूलमंत्र
करिश्मा ने अपनी पोस्ट के जरिए हाल ही में बनी माताओं के लिए कुछ बेहद उपयोगी और असरदार टिप्स शेयर किए हैं। उन्होंने बताया कि डिलीवरी के बाद किन आदतों को अपनाकर जल्द रिकवर हुआ जा सकता है।
सही खान-पान
नवजात बच्चे के पोषण के लिए पर्याप्त दूध बने, इसके लिए करिश्मा तन्ना अपनी डाइट में पौष्टिक और तरल पदार्थों को शामिल करती हैं।
हाइड्रेटेड रहना
लगातार ब्रेस्ट फीडिंग और मिल्क पंपिंग के कारण शरीर में पानी की कमी हो सकती है। इसलिए दिन भर भरपूर पानी और हेल्दी ड्रिंक्स का सेवन करना चाहिए।
सिकाई
शरीर की सूजन, निप्पल्स के दर्द और मांसपेशियों के खिंचाव से राहत पाने के लिए गर्म और ठंडी सिकाई बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है।
कमर दर्द से राहत
डिलीवरी क बाद होने वाले कमर और पीठ दर्द को कम करने के लिए हल्की सिकाई और सही पोश्चर का ध्यान रखना जरूरी होता है।
बेली सपोर्ट बेल्ट का इस्तेमाल
एक्ट्रेस ने सलाह दी है कि जो महिलाएं नई-नई मां बनी हैं, उनको नियमित रूप से बेली सपोर्ट बेल्ट का इस्तेमाल करना चाहिए।
पेट की मांसपेशियों को मिलता है सहारा
डिलीवरी के बाद पेट के आकार को सामान्य की भांति करने और ढीली मांसपेशियों को सपोर्ट देने में बेली सपोर्ट बेल्ट काफी कारगर है।
पीठ के मिलेगी मजबूती
बेली बल्टे पहनने से रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है, जिससे कमर दर्द में काफी आराम मिलता है।
करिश्मा तन्ना की पर्सनल लाइफ
एक्ट्रेस करिश्मा तन्ना ने लंबे समय तक वरुण बंगेरा को डेट किया और फिर साल 2022 में शादी रचाई थी। इसके बाद 29 जुलाई 2026 को गुरु पूर्णिमा के मौके पर कपल ने बेटे का स्वागत किया, जिसकी खबर एक्ट्रेस ने फैंस के साथ साझा की थी।
फिजिकल फिटनेस जरूरी
किसी भी महिला के लिए मां बनना उनके जीवन का सबसे खूबसूरत एहसास होता है। लेकिन इसके साथ-साथ अपने शरीर का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी होता है। करिश्मा तन्ना की तरफ से शेयर किए गए ये देसी पोस्टपार्टम हैक्स नई मांओं के लिए रिकवरी की राह को आसान बना सकते हैं।
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क्या किसी सरकारी स्कूल या हॉस्टल में गंदा पानी, खराब खाना या बिजली की किल्लत जैसी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान 30 दिन के भीतर पाना संभव है?...जहां देश के अधिकांश राज्यों में छात्र ऐसी बुनियादी सुविधाओं के लिए महीनों प्रशासनिक चक्कर काटने या सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं, वहीं बिहार सरकार ने एक पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था से इस धारणा को बदलने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा शुरू की गई इस नई पहल ने छात्र शिकायतों के निपटारे का एक ऐसा मॉडल पेश किया है, जिसकी गूंज अब देश भर में सुनाई दे रही है।
छात्रों की शिकायतें अक्सर लंबे समय तक अनसुलझी रहती हैं, इसकी बड़ी वजह प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता है। किसी छात्र को हॉस्टल की सफाई, भोजन की गुणवत्ता, बिजली-पानी या फीस से जुड़ी दिक्कत होने पर पहले वार्डन, फिर प्रिंसिपल और जरूरत पड़ने पर जिला शिक्षा कार्यालय तक जाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में न तो कोई तय समयसीमा होती है और न ही स्पष्ट जवाबदेही तय होती है, जिस वजह से छोटी शिकायतें भी हफ्तों-महीनों तक लंबित रह जाती हैं।
बिहार सरकार के विद्यार्थी सहयोग पोर्टल की खासियत यह है कि शिकायत दर्ज कराने के लिए दो अलग कैटेगरी बनाई गई हैं — पहली, शैक्षणिक संस्थान यानी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय से संबंधित विद्यार्थियों के लिए, और दूसरी, छात्रावास यानी हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए। पोर्टल के होमपेज पर ही यह दोनों विकल्प दिए गए हैं, जिससे छात्र सही कैटेगरी चुनकर सीधे संबंधित फॉर्म तक पहुंच जाता है। कैटेगरी चुनने के बाद छात्र के सामने एक सीधा-सादा फॉर्म खुलता है, जिसमें नाम, लिंग, पिता का नाम, जन्म तिथि और मोबाइल नंबर जैसी बुनियादी जानकारी भरनी होती है। ईमेल आईडी को वैकल्पिक रखा गया है, ताकि जिन छात्रों के पास ईमेल नहीं है वे भी शिकायत दर्ज करा सकें, जबकि मोबाइल नंबर को ओटीपी से वेरिफाई किया जाता है ताकि हर शिकायत असली छात्र की ओर से ही दर्ज हो।
पोर्टल पर छात्रों के लिए तीन सुविधाएं दी गई हैं। शिकायत दर्ज कराने का विकल्प हॉस्टल सुविधाओं, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और बिजली से जुड़ी समस्याओं के लिए है। इसके अलावा छात्र व्यवस्था सुधारने से जुड़े अपने सुझाव भी साझा कर सकते हैं, और सबसे अहम बात यह कि एक बार शिकायत दर्ज करने के बाद छात्र उसकी मौजूदा स्थिति और उस पर हुई कार्रवाई को ट्रैक भी कर सकता है। पोर्टल पर सबसे ज्यादा दर्ज होने वाली शिकायतों को भोजन, पेयजल, बिजली, शौचालय-सफाई, सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और इंटरनेट जैसी कैटेगरी में पहले से बांटा गया है, जिससे शिकायत सीधे संबंधित विभाग तक पहुंचती है और निपटारे में देरी नहीं होती।
पोर्टल पर दर्ज हर शिकायत का 30 दिनों के भीतर निपटारा सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई है। समाधान के बाद संबंधित छात्र को लिखित रूप से इसकी सूचना भी दी जाती है, ताकि यह साफ रहे कि उसकी शिकायत पर वाकई कार्रवाई हुई है। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शिकायतकर्ता छात्र-छात्राओं की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी, जिससे छात्र बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें। जिन छात्रों के पास ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने की सुविधा नहीं है, उनके लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1100 भी उपलब्ध कराया गया है।
पोर्टल का मकसद छात्रों की शैक्षणिक, परीक्षा, छात्रावास, छात्रवृत्ति और अन्य संस्थागत समस्याओं का पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से समाधान करना है।
सरकारी पोर्टल और हेल्पलाइन की घोषणाएं आमतौर पर होती रहती हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर व्यवहार में उतनी असरदार साबित नहीं होतीं। लेकिन बिहार सरकार की अब तक की कोशिशों को देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार गंभीरता से छात्रों की समस्याओं को सुनने की ओर अग्रसर है। इस पोर्टल की खासियत है कि इसमें एक जवाबदेही तंत्र भी जोड़ा गया है — तय समयसीमा में शिकायत का समाधान न होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का भी प्रावधान रखा गया है, जिससे यह सिर्फ कागजी व्यवस्था बनकर नहीं रह जाती।
पोर्टल के साथ-साथ सरकार ने हर महीने सहयोग शिविर आयोजित करने की व्यवस्था भी बनाई है, जिनमें मंत्री, विधायक, सांसद और संबंधित अधिकारी सीधे स्कूल-कॉलेजों में जाकर छात्रों से बातचीत करेंगे। इन शिविरों में मिलने वाली शिकायतों और सुझावों को भी उसी पोर्टल पर दर्ज कर ट्रैक किया जाता है, जिससे पूरा सिस्टम एक जगह जुड़ा रहता है। यह व्यवस्था खासकर उन इलाकों में उपयोगी मानी जा रही है, जहां छात्र ऑनलाइन माध्यम के बजाय सीधी बातचीत में ज्यादा सहज महसूस करते हैं।
जिन राज्यों में छात्र आंदोलन और कैंपस में असंतोष की घटनाएं सामने आती रही हैं, उनके लिए बिहार का यह मॉडल कुछ स्पष्ट संकेत देता है। शिकायत निवारण तंत्र तभी प्रभावी होता है जब उसमें तय समयसीमा और जवाबदेही दोनों शामिल हों। शिकायत और छात्रावास की समस्याओं को अलग-अलग कैटेगरी में बांटने और फॉर्म को आसान रखने से समाधान की रफ्तार तेज होती है, जबकि स्टेटस ट्रैक करने की सुविधा से छात्रों को भरोसा रहता है कि उनकी बात पर वाकई काम हो रहा है। साथ ही, सिर्फ डिजिटल पोर्टल पर निर्भर रहने के बजाय हेल्पलाइन और जमीनी शिविर जैसे विकल्प भी जरूरी हैं, ताकि हर वर्ग का छात्र इस व्यवस्था से जुड़ सके।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बड़ी घोषणाओं के साथ-साथ जमीनी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। बिहार का अनुभव यह दिखाता है कि अगर शिकायत निवारण तंत्र में पारदर्शिता, आसान प्रोसेस और जवाबदेही तय की जाए, तो नतीजे भी सामने आते हैं। अब देखना यह होगा कि अन्य राज्य इस मॉडल से कितना सीखते हैं और अपने यहां इसे किस रूप में लागू करते हैं।
- संजीव कुमार मिश्र
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