भारत-बांग्लादेश के बीच फिर दौड़ेंगी यात्री ट्रेनें! ढाका रख सकता है नए राजशाही-कोलकाता रूट का प्रस्ताव
बांग्लादेश और भारत के रेलवे अधिकारी मंगलवार से ढाका में होने वाली दो दिन की बैठक में आमने-सामने बातचीत करेंगे। इस बैठक में मैत्री, बंधन और मिताली एक्सप्रेस ट्रेनों को फिर से शुरू करने पर चर्चा होने की उम्मीद है
बूंद-बूंद का सटीक हिसाब रखेगी आधुनिक तकनीक, देहरादून में जल प्रबंधन की राष्ट्रीय कार्यशाला शुरू
Uttarakhand News: देश के प्राकृतिक जल स्रोतों को बचाने और नदियों को नया जीवन देने की दिशा में एक बड़ी वैज्ञानिक पहल शुरू हुई है. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान में जल संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन को लेकर दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला का भव्य आगाज हुआ. यह कार्यशाला आधुनिक कंप्यूटर मॉडलिंग और वैज्ञानिक तकनीकों के जरिए जल संकट का स्थायी समाधान तलाशने के मकसद से आयोजित की जा रही है. जल शक्ति मंत्रालय की विशेष परियोजना के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में देश भर से चार सौ से अधिक वैज्ञानिक, शोधकर्ता और छात्र जुड़े हैं. यह आयोजन स्पष्ट करता है कि भारत में पानी के गिरते स्तर और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए अब पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक सॉफ्टवेयर का सहारा लेना बेहद जरूरी हो चुका है.
आधुनिक सॉफ्टवेयर से तय होगी जल प्रबंधन की नई रूपरेखा
इस राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का सबसे अहम पहलू माइक हाइड्रो बेसिन सॉफ्टवेयर का व्यावहारिक उपयोग सिखाना है. विशेषज्ञ प्रतिभागियों को यह समझा रहे हैं कि कैसे भौगोलिक सूचना प्रणाली यानी जीआईएस डेटा और जलविज्ञान के सिमुलेशन का इस्तेमाल करके किसी भी नदी बेसिन का सटीक मॉडल तैयार किया जा सकता है. इसके जरिए वर्षा के पानी, नदियों के प्रवाह और भूजल की स्थिति का कंप्यूटर पर सटीक विश्लेषण संभव होता है. जलवायु परिवर्तन के दौर में जब मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है, तब यह तकनीक वैज्ञानिकों को यह अनुमान लगाने में मदद करती है कि आने वाले दशकों में पानी की उपलब्धता कैसी रहेगी. इसके आधार पर नीतियां बनाकर सूखे और बाढ़ जैसी विषम परिस्थितियों से समय रहते निपटा जा सकता है.
वैज्ञानिकों ने साझा की हिमालयी नदियों के पुनरुद्धार की रणनीति
कार्यशाला के पहले दिन देश के जाने-माने जल विशेषज्ञों ने अपने शोध और जमीनी अनुभव साझा किए. राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान रुड़की के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर.पी. पांडे ने हिमालयी क्षेत्रों की नदियों को बचाने के लिए समेकित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि पहाड़ों की पारिस्थितिकी बेहद संवेदनशील है, इसलिए वहां के जल स्रोतों और छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए वैज्ञानिक डेटा पर आधारित काम होना चाहिए. इसके बाद तकनीकी विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को सॉफ्टवेयर टूल्स की बारीकियों से अवगत कराया और वास्तविक आंकड़ों के जरिए कंप्यूटर पर मॉडल तैयार करने का अभ्यास कराया. इस हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग से युवाओं को जल प्रबंधन की जटिल गणनाओं को समझने में सीधी मदद मिल रही है.
भूजल संवर्धन और वाटर पॉजिटिव क्षेत्र बनाने पर विचार विमर्श
आयोजन के दौरान केवल सतही जल ही नहीं, बल्कि जमीन के भीतर मौजूद पानी के संरक्षण पर भी गहरा मंथन हुआ. केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान करनाल के पूर्व निदेशक डॉ. एस.के. कामरा ने वाटर पॉजिटिव लैंडस्केप विकसित करने का खाका पेश किया. इसका सीधा अर्थ है कि हम जितना पानी जमीन से निकालें, उससे अधिक पानी वैज्ञानिक तरीकों से जमीन के भीतर वापस पहुंचाएं. इसके लिए सही स्थानों का चुनाव करने और उपयुक्त ढांचों के निर्माण पर तकनीकी मार्गदर्शन दिया जा रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि हर बेसिन स्तर पर भूजल पुनर्भरण को अनिवार्य और योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाए, तो कई इलाकों को भीषण जल संकट से बाहर निकाला जा सकता है.
भविष्य की जल नीतियों को मिलेगा मजबूत वैज्ञानिक आधार
बढ़ती आबादी, औद्योगिकीकरण और अनिश्चित मानसून के कारण देश के जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है. ऐसे समय में ICAR और सारा जैसी संस्थाओं का यह साझा प्रयास देश की नीति निर्माण प्रक्रिया को नई दिशा देने वाला साबित होगा. यह कार्यशाला विभिन्न शोध संस्थानों, नीति निर्धारकों और युवा वैज्ञानिकों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान का एक सशक्त मंच बन गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रशिक्षण से तैयार होने वाले विशेषज्ञ आने वाले समय में देश के विभिन्न नदी बेसिनों की बेहतर योजना बना सकेंगे, जिससे समाज को दीर्घकालिक जल सुरक्षा मिल सकेगी.
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