किन लोगों को हो सकता है गर्दन का कैंसर? सर्जन ने बताया किन्हें है ज्यादा खतरा, यहां जानिए लक्षण
Neck Cancer Symptoms: फोर्टिस अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट और यूनिट हेड, हेड एंड नेक सर्जन डॉ. अंबेश सिंह ने बताया किन लोगों को गर्दन के कैंसर का खतरा ज्यादा रहता है. यहां जानिए गर्दन के कैंसर के रिस्क फैक्टर्स क्या हैं.
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Aja Ekadashi 2026 Vrat Katha: आज जरूर पढ़ें अजा एकादशी की व्रत कथा, मिलेगा भगवान विष्णु का आशीर्वाद
Aja Ekadashi 2026 Vrat Katha: आज यानी 7 सितंबर 2026, सोमवार को अजा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है. एक वर्ष में करीब 24 एकादशी तिथियां आती हैं. सभी एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होते हैं. अजा एकादशी का व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि, धन और खुशहाली आती है. धार्मिक मान्यता है कि एकादशी का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता है, जब तक आप इसकी व्रत कथा का पाठ नहीं करते हैं. सभी साधकों को अजा एकादशी पर राजा हरिश्चन्द्र की कथा सुननी या पढ़नी चाहिए. पढ़ें अजा एकादशी व्रत कथा.
अजा एकादशी की व्रत कथा
युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान हे पुण्डरिकाक्ष! मैंने श्रावण शुक्ल एकादशी अर्थात पुत्रदा एकादशी का सविस्तार वर्णन सुना. अब आप कृपा करके मुझे भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में भी बतलाइये. इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसके व्रत का क्या विधान है? इसका व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे युधिष्ठिर! भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं. इसका व्रत करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. इसलोक और परलोक में मदद करने वाली इस एकादशी व्रत के समान संसार में दूसरा कोई व्रत नहीं है. इस एकादशी से सम्बंधित जो कथा प्रचलित है, उसे में तुम्हें सुनाता हूं, श्रद्धा पूर्वक श्रवण करो.
कौन थे सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र?
बहुत समय पहले एक दानी और सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र हुऐ. राजा हरिश्चंद्र इतने प्रसिद्ध सत्यवादी और धर्मात्मा थे कि उनकी कीर्ति से देवताओं के राजा इन्द्र को भी इर्ष्या होने लगी. इन्द्र ने महर्षि विश्वामित्र को हरिश्चन्द्र की परीक्षा लेने के लिये उकसाया. इन्द्र के कहने से महर्षि विश्वामित्र जी ने राजा हरिश्चन्द्र को योगबल से ऐसा स्वप्न दिखलाया कि राजा स्वप्न में ऋषि को सब राज्य दान कर रहे हैं.
दूसरे दिन महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आये और अपना राज्य मांगने लगे. स्वप्न में किये दान को भी राजा ने स्वीकार कर लिया और विश्वामित्रजी को सारा राज्य दे दिया. अयोध्या से जब राजा हरिश्चन्द्र जब चलने लगे तब विश्वामित्रजी ने कहा जप, तप, दान आदि बिना दक्षिणा दिये सफल नहीं होते. राज-पाट तुम पहले ही सौंप चुके हो तो अब दक्षिणा कैसे दोगे.
खुद को चाण्डाल को बेचा राजा हरिश्चंद्र ने
तो हरिश्चंद्र ने महर्षि विश्वामित्र से दक्षिणा देने के लिये एक महीने का समय लेकर वे काशी आये. काशी में उन्होंने अपनी पत्नी रानी शेव्या को एक ब्राह्मण के हाथ बेच दिया. राजकुमार रोहिताश्व छोटा बालक था. प्रार्थना करने पर ब्राह्मण ने उसे अपनी माता के साथ रहने की आज्ञा दे दी. स्वयं अपने को राजा हरिश्चन्द्र ने एक चाण्डाल के हाथ बेच दिया और इस प्रकार ऋषि विश्वामित्र को एक हजार मोहरें दक्षिणा में दीं. महारानी शैव्या अब ब्राह्मण के घर में दासी का काम करने लगीं. चाण्डाल के सेवक होकर राजा हरिश्चन्द्र श्मशानघाट की चौकीदारी करने लगे.
हरिश्चंद्र शमशान में मृतकों के परिजनों से दाह संस्कार के बदले कर वसूली करने के काम को करता था. कई बार उनके सामने धर्मसंकट की स्थिति भी बनी लेकिन वे सत्य और कर्तव्य के मार्ग से विचलित नहीं हुए.
पूर्व जन्म के पाप के कारण हुई थी ऐसी दशा
एक दिन शमशान भूमि की तरफ गौतम ऋषि आ गए राजा ने ऋषि को प्रणाम किया गौतम ऋषि ने कहा कि किसी पूर्व जन्म के पाप के कारण आप की यह दशा हुई है. यदि तुम भाद्रपद कृष्ण एकादशी का व्रत करो और अजा एकादशी व्रत कथा सुनो तो तुम्हारा इस हालत से उद्धार हो जाएगा. राजा ने ऋषि की बात मानकर अजा एकादशी का व्रत करने लगे. एक दिन राजकुमार रोहिताश्व ब्राह्मण की पूजा के लिये फूल चुन रहा था कि उसे सांप ने काट लिया. सांप का विष झटपट फैल गया और रोहिताश्व मरकर भूमि पर गिर पड़ा. उसकी माता महारानी शैव्या को न कोई धीरज बंधानेवाला था और न उनके पुत्र की देह श्मशान पहुंचाने वाला था.
वह रोती बिलखती पुत्र के शव को लेकर शमशान में पंहुची तो पुत्र की लाश को देखकर हरिश्चंद्र का कलेजा भी भर आया. सारा वृतांत सुनकर हरिश्चंद्र ने कहा कि मैं अपने कर्तव्य में बंधा हुआ हु, जो भी यहां दाह संस्कार के लिये आता है उसे कर के रुप में कुछ न कुछ देना पड़ता है. रानी पास कर देने के लिए कुछ नहीं था. राजा हरिश्चन्द्र को बड़ा दुःख हुआ किंतु वे अपने धर्मपर स्थिर बने रहे. अपने हालातों पर दोनों भगवान से प्रार्थना कर रहे थे. जब हरिश्चंद्र ने दाह संस्कार नहीं करने दिया तो रानी ने अपनी आधी साड़ी चीर कर हरिश्चंद्र को कर के रुप में दी. उधर प्रभु भी यह सब कुछ देख रहे थे तो हरिश्चंद्र की कर्तव्य परायणता को देखकर वहां भगवान् नारायण, इन्द्र, धर्मराज आदि देवता और महर्षि विश्वामित्र प्रकट हो गए.
उन्होंनें उनके पुत्र को जीवित कर दिया और फिर से हरिश्चंद्र को राज-पाट भी लौटा दिया. तो इस प्रकार अजा एकादशी के व्रत से हरिश्चंद्र के समस्त दुःखों का निवारण हो गया. सत्य के प्रभाव से राजा हरिश्चन्द्र महारानी शैव्या के साथ भगवान के धाम मे चले गये. महर्षि विश्वामित्र ने राजकुमार रोहिताश्व को अयोध्या का राजा बना दिया.
हे राजन! यह सब अजा एकादशी के प्रभाव से ही हुआ. अतः जो मनुष्य यत्न के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट होकर अंत में वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं. इस एकादशी की कथा के श्रवणमात्र से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है.
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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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