तुलसी के पौधे में रोज जल चढ़ाना क्यों माना जाता है शुभ? जानें मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु से जुड़ी मान्यता
Tulsi puja rules: हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को बेहद पवित्र माना जाता है। यही वजह है कि कई घरों में सुबह स्नान के बाद तुलसी को जल अर्पित करने और दीपक जलाने की परंपरा निभाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी केवल एक पौधा नहीं बल्कि देवी स्वरूप मानी जाती हैं। घर के आंगन या पूजा स्थल पर तुलसी का पौधा होने को शुभता और सकारात्मकता से जोड़कर देखा जाता है।
मान्यता है कि नियमित रूप से तुलसी की पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में तुलसी पूजा के नियमों और परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है।
भगवान विष्णु को क्यों प्रिय है तुलसी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय हैं और तुलसी पत्र के बिना उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है।
इसी कारण एकादशी, देवउठनी एकादशी और भगवान विष्णु से जुड़े अन्य धार्मिक अवसरों पर तुलसी पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। कई श्रद्धालु भगवान विष्णु को भोग अर्पित करते समय भी तुलसी दल जरूर शामिल करते हैं।
मां लक्ष्मी से भी जुड़ी है तुलसी की मान्यता
हिंदू धार्मिक परंपराओं में तुलसी के पौधे को घर की सुख-समृद्धि से भी जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि जिस घर में तुलसी की नियमित पूजा होती है, वहां सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
कई परिवार सुबह और शाम तुलसी के पास दीपक जलाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करना घर में शांति और समृद्धि के लिए शुभ माना जाता है।
रविवार और एकादशी को लेकर क्या हैं मान्यताएं?
तुलसी पूजा से जुड़े नियम अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और क्षेत्रों में अलग हो सकते हैं। आमतौर पर लोग प्रतिदिन तुलसी को जल अर्पित करते हैं, लेकिन कुछ मान्यताओं में रविवार और एकादशी के दिन तुलसी में जल न चढ़ाने या पत्तियां न तोड़ने की परंपरा बताई जाती है।
इसी तरह शाम के समय तुलसी के पास दीपक जलाने की परंपरा भी कई हिंदू परिवारों में प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी की पूजा श्रद्धा और स्वच्छता के साथ करनी चाहिए।
तुलसी विवाह का भी है विशेष महत्व
कार्तिक माह में देवउठनी एकादशी के अवसर पर तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है। इस दिन तुलसी और भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम का विवाह कराया जाता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, तुलसी विवाह के बाद विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत का समय भी माना जाता है। कई जगह इस अवसर पर घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
घर में तुलसी का पौधा कहां लगाना चाहिए?
वास्तु और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी के पौधे को साफ-सुथरी और खुली जगह पर रखना शुभ माना जाता है। इसे ऐसी जगह रखा जाता है जहां पौधे को पर्याप्त धूप और हवा मिल सके।
धार्मिक दृष्टि से तुलसी के स्थान को पवित्र रखने की परंपरा है। इसलिए पौधे के आसपास साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है।
आज भी कायम है तुलसी पूजा की परंपरा
बदलती जीवनशैली के बावजूद आज भी देश के कई घरों में सुबह-शाम तुलसी पूजा की परंपरा निभाई जाती है। कहीं इसे धार्मिक आस्था से जोड़ा जाता है तो कहीं इसे परिवार की वर्षों पुरानी परंपरा के रूप में देखा जाता है।
तुलसी का पौधा भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और आज भी विशेष अवसरों पर इसकी पूजा श्रद्धा के साथ की जाती है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इन मान्यताओं की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। पाठक इसे सामान्य जानकारी के रूप में लें।
September Ekadashi 2026: सितंबर में कब है परिवर्तिनी एकादशी? जानें व्रत की तारीख, पारण समय और महत्व
हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना और व्रत के लिए विशेष माना जाता है। साल 2026 के सितंबर महीने में दो प्रमुख एकादशी व्रत पड़ेंगे। इनमें पहली अजा एकादशी 7 सितंबर और दूसरी परिवर्तिनी एकादशी 22 सितंबर को होगी। दोनों एकादशियों का धार्मिक महत्व अलग-अलग बताया गया है। आइए जानते हैं सितंबर में पड़ने वाली इन दोनों एकादशियों की सही तारीख, तिथि, पारण समय और मान्यताएं।
सितंबर में पड़ेंगी दो एकादशी
एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर महीने कृष्ण और शुक्ल पक्ष में एक-एक एकादशी आती है। इस तरह साल में सामान्य तौर पर 24 एकादशी पड़ती हैं। अधिकमास होने पर इनकी संख्या बढ़ भी सकती है।
सितंबर 2026 में अजा एकादशी और परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। दोनों ही एकादशियां भाद्रपद मास में पड़ती हैं और धार्मिक दृष्टि से इनका विशेष महत्व बताया गया है।
अजा एकादशी 2026 कब है?
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। इस बार अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा।
धार्मिक मान्यता के अनुसार अजा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना के लिए किया जाता है। कहा जाता है कि इस व्रत से व्यक्ति को पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति का पुण्य मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु के ऋषिकेश स्वरूप की पूजा करने की परंपरा बताई गई है।
अजा एकादशी की तिथि: 7 सितंबर 2026
एकादशी तिथि शुरू: 6 सितंबर की शाम 7:29 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 7 सितंबर की शाम 5:03 बजे
व्रत पारण: 8 सितंबर की सुबह 6:02 बजे से 8:33 बजे के बीच
परिवर्तिनी एकादशी 2026 कब है?
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इसे पार्श्व एकादशी और पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2026 में इसका व्रत 22 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा।
धार्मिक मान्यताओं में कहा गया है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और परिवर्तिनी एकादशी पर करवट बदलते हैं। इसी वजह से इस एकादशी का नाम परिवर्तिनी एकादशी पड़ा। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है।
मान्यता है कि परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। धार्मिक ग्रंथों में इसके व्रत को विशेष पुण्यदायी बताया गया है।
परिवर्तिनी एकादशी की तिथि: 22 सितंबर 2026
एकादशी तिथि शुरू: 21 सितंबर की रात 8:00 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 22 सितंबर की रात 9:43 बजे
व्रत पारण: 23 सितंबर की सुबह 7:38 बजे से 10:04 बजे के बीच
अजा और परिवर्तिनी एकादशी में क्या है अंतर?
अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण पक्ष में आती है, जबकि परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है। अजा एकादशी में भगवान विष्णु के ऋषिकेश स्वरूप की पूजा का उल्लेख मिलता है, वहीं परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन अवतार की आराधना की परंपरा है। दोनों व्रतों को लेकर धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ही भगवान विष्णु की भक्ति और उपासना से जुड़े महत्वपूर्ण व्रत माने जाते हैं।
नोट: एकादशी की तिथि और पारण समय स्थान के अनुसार सूर्योदय एवं स्थानीय पंचांग की गणना से थोड़ा अलग हो सकता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपने स्थानीय पंचांग के समय को प्राथमिकता दें।
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