भाद्रपक्ष कृष्ण अष्टमी का पावन पर्व सम्पूर्ण भारतवर्ष में भारतीय जनमानस के नायक, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और जीवन-दर्शन में श्रीकृष्ण के विराट व्यक्तित्व और उनके लोककल्याणकारी संदेशों का स्मरण कराने वाला पर्व है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, भाद्रपक्ष कृष्ण अष्टमी की अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र और वृष राशि के संयोग में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ था। अत्याचारी कंस के आतंक से त्रस्त मथुरा में श्रीकृष्ण का जन्म अन्याय और अधर्म के विरुद्ध धर्म, सत्य और न्याय की विजय की आशा का प्रतीक बना। पौराणिक मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार माने जाते हैं और उनके व्यक्तित्व में बाल-सुलभ चंचलता, अद्भुत करुणा, अनुपम प्रेम, असाधारण पराक्रम, दूरदर्शी कूटनीति तथा गहन आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने भगवद्गीता के माध्यम से कर्म, धर्म और कर्तव्य का ऐसा कालजयी संदेश दिया, जो आज भी मानवता का मार्गदर्शन करता है। इस वर्ष 4 सितंबर को भगवान श्रीकृष्ण की 5253वीं जन्माष्टमी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। मंदिरों में विशेष सजावट, झांकियों, भजन-कीर्तन और मध्यरात्रि में भगवान के जन्मोत्सव के साथ यह पर्व भारतीय सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।
जन्माष्टमी के दिन देशभर में मंदिरों को सजाया जाता है, लोग रात्रि के 12 बजे तक व्रत रखते हैं और रात्रि 12 बजे शंख और घंटों की ध्वनि के जरिये भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खबर चारों दिशाओं में गूंज उठती है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल्याकाल में अनेकों लीलाएं की, जन्माष्टमी के अवसर पर ऐसी ही अनेक लीलाओं का मंचन किया जाता है। सही मायनों में श्रीकृष्ण हमारे इतिहास के अभिन्न अंग हैं, जिनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व जितना मोहक था, उतना ही रहस्यमयी भी और उतनी ही अनोखी थी उनकी लीलाएं। बाल्यावस्था से लेकर जीवनपर्यन्त लीलाएं करते रहे श्रीकृष्ण में कभी भगवान के दर्शन होते हैं तो कभी वे एक साधारण मानव सरीखे प्रतीत होते हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि मानव के रूप में भी श्रीकृष्ण उतना ही आकर्षित करते हैं, जितना कि भगवान के रूप में। उनका एक-एक कार्य मन में गहरा स्थान बना जाता है। उनके आदर्श, उनके जीवन की विद्वत्ता, वीरता, कूटनीति, योगी सदृश उज्जवल, निर्मल एवं प्रेरणादायक पक्ष, सब हमारे लिए अनुकरणीय हैं। श्रीकृष्ण को प्रेम एवं मित्रता के अनुपम प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। बचपन के निर्धन मित्र सुदामा को उन्होंने अपने राज्य में जो मान-सम्मान दिया, वह मित्रता का अनुकरणीय उदाकरण बना।
श्रीकृष्ण की लीलाओं को समझना जहां पहुंचे हुए ऋषि-मुनियों और बड़े-बड़े विद्वानों के बूते से भी बाहर था, वहीं अनपढ़, गंवार माने जाते रहे निरक्षर और भोले-भाले ग्वाले और गोपियां उनका सानिध्य पाते हुए उनकी दिव्यता का सुख पाते रहे। उन्हें कन्हैया कहें या कृष्ण, पीताम्बर कहें या वासुदेव या फिर देवकीनंदन अथवा यशोदानंदन, वास्तव में श्रीकृष्ण का भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वे महाभारत काल के ऐसे आध्यात्मिक एवं राजनीतिक दृष्टा रहे, जिन्होंने धर्म, सत्य और न्याय की रक्षा के लिए दुर्जनों का संहार किया। वे शांति, प्रेम एवं करूणा के साकार रूप थे। महाभारत युद्ध के समय शांति के सभी प्रयास असफल होने पर उन्होंने संशयग्रस्त धनुर्धारी अर्जुन को ज्ञान का उपदेश देकर कर्त्तव्य मार्ग पर अग्रसर किया और अन्याय की सत्ता को उखाड़ने के लिए अपने ही कौरव भाईयों के साथ युद्ध करते हुए उन्हें अपने कर्मों का पालन करने के लिए गीता का उपदेश दिया। युद्ध के समय वे हर पल धर्म की रक्षा करने के लिए अधर्म करने वालों के खिलाफ खड़े नजर आए, इसीलिए उन्हें अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। गीता में उपदेश देते हुए श्रीकृष्ण ने कहा थाः-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।।
अर्थात् हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं।
बाल्याकाल से लेकर बड़े होने तक श्रीकृष्ण की अनेक लीलाएं विख्यात हैं। श्रीकृष्ण ने अपने बड़े भाई बलराम का घमंड तोड़ने के लिए हनुमान जी का आव्हान किया था, जिसके बाद हनुमान ने बलराम की वाटिका में जाकर बलराम से युद्ध किया और उनका घमंड चूर-चूर कर दिया था। श्रीकृष्ण ने नररकासुर नामक असुर के बंदीगृह से 16100 बंदी महिलाओं को मुक्त कराया था, जिन्हें समाज द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाने पर उन महिलाओं ने श्रीकृष्ण से अपनी रक्षा की गुहार लगाई और तब श्रीकृष्ण ने उन सभी महिलाओं को अपनी रानी होने का दर्जा देकर उन्हें सम्मान दिया था। अपने एक उपदेश में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा था:-
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
अर्थात् साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूं।
श्रीकृष्ण का स्वरूप कितना दिव्य था, इसकी अनुभूति इसी से हो जाती है कि एक ओर जहां अपने स्तनों पर विष लेप कर मां का रूप धारण कर दूध पिलाने आई राक्षसी पूतना का दूध पीकर श्रीकृष्ण उसे मां का सम्मान देते हैं तो दूसरी ओर उसकी दुष्टता के लिए उसका वध भी करते हैं। श्रीकृष्ण ने लंबे समय तक द्वारका पर शासन किया, इसीलिए उन्हें द्वारकाधीश नाम से भी जाना जाता है। 36 वर्षों तक द्वारका पर शासन करने के बाद वे परम धाम को प्राप्त हुए थे। पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक, सत्य-असत्य से परे पूर्ण पुरूष की अवधारणा को साकार करते श्रीकृष्ण भारतीय परम्परा के ऐसे प्रतीक हैं, जो जीवन का प्रतिबिम्ब हैं और सम्पूर्ण जीवन का चित्र प्रस्तुत करते हैं। उनका चित्र जनमानस के हृदय पटल पर एक कुशल नेतृत्वकर्ता, योद्धा, गृहस्थी, सारथी, योगीराज, देवता इत्यादि विविध रूपों में अंकित है। श्रीकृष्ण बंधन भी हैं और मुक्ति भी, एक ओर जहां वे अपने भक्तों को अपने आकर्षण में बांधते हैं तो उन्हीं भक्तों को मोह-माया के बंधन से मुक्त भी करते हैं।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
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एक बात साफ हो जानी चाहिए कि दुनिया के देशों के लिए नेपाल त्रासदी को हल्के में लेना बड़ी भूल होगी। 2020 की कनाड़ा की रॉक स्लाइड और 2023 की सिक्किम में साउथ ल्होनक झील की ग्लेशियल फटने की घटना हमारे सामने हैं। यह कोई पहली या अंतिम घटनाएं नहीं हैं अपितु देखा जाएं तो यह समय रहते प्रयास नहीं किये गये तो ऐसी घटनाओं की आवृति जल्दी जल्दी और अतिविनाशकारी होगी, इससे नकारा नहीं जा सकता। जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले सालों में जिस तरह से प्रकृति का विकराल रुप देखने को मिल रहा है वह चाहे तूफानों के रुप में हो, चाहे जंगलों में लगती आग के कारण हो, ग्लेशियरों के पिघलने की हो, ग्लेशियलों के फटने की हो, भूकंपों की हो, बैमौसम आंधी बरसात की हो, अतिवृष्टि या अनावृष्टि की हो, मौसम चक्र में भले ही आंशिक परिवर्तन की हो या समुद्र्री तूफानों की बढती फ्रिक्वेंसी की हो बेहद गंभीर हो जाती है। वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों की लगातार चेतावनी को नजरअंदाज करने का ही परिणाम है कि नेपाल जैसी त्रासदियां आम होती जा रही है। यह केवल नेपाल या इससे जुड़े क्षेत्र के लिए ही गंभीर हालात नहीं हैं अपितु अमेरिका, चीन, भारत सहित दुनिया के दस देश नेपाल जैसी त्रासदी के मुहाने पर खड़े हैं। ग्लेशियल के फटने या यों कहें किग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी कि ग्लोफ जैसे हालात कभी भी इनके दायरें में आने वाले देशों में हो सकते हैं। यह भी सही है कि अभी तक भारत-नेपाल ही नहीं दुनिया के इस दायरें में आने वाला कोई भी देश इन आपदाओं से निपटने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो सके हैं। जानकारों की मानें तो भारत, चीन, पाकिस्तान, पेरु के एक करोड़ 50 लाख लोग इनके दायरें में सीधे सीधे आ रहे हैं। यह वह लोग है जो इन ग्लेशियलों के एक किलोमीटर से 10 किलोमीटर के दायरें में रह रहे हैं। आज ग्लोफ खतरें के दायरें में भारत, पाकिस्तान, कनाड़ा, पेरु, अमेरिका, चिली, इटली, नेपाल और कोलंबिया आए हुए हैं।
उत्तराखंड त्रासदी हमारे सामने हैं और उस त्रासदी के परिणाम सामने होने के बावजूद लगभग साल दर साल भूस्खलन के मामले हर सीजन में सामने आ रहे हैं। यह साफ हो जाना चाहिए कि प्रकृति से एक सीमा से अधिक खिलवाड़ किया जाता है तो विकृति का सामना हमें करना ही पड़ेगा। जीवनदायी यही प्रकृति अपने विकराल रुप में पलटवार करती है। ऐसे में समय के साथ सबक लेना जरुरी हो जाता है। आज सारी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण की बात तो की जाती है पर उस पर अमल पूरी तरह से हो नहीं पा रहा है। विशेषज्ञों की माने तो हालात यही रहे तो सदी के अंत तक समुद्र का जलस्तर दो मीटर तक बढ़ सकता है। तो दूसरी और अभी से समुद्र तटीय कई शहर डूबने की जद में आने की चेतावनियां दी जा रही है।
नेपाल की हालिया त्रासदी का कारण ग्लेशियल का फटना माना जा रहा है। दरअसल ग्लेशियर और ग्लेशियल में हमें भेद करके चलना होगा। ग्लेशियर भौगोलिक संरचना होती है। यह पहाड़ों और ध्रुवों पर लंबे समय से जमा बर्फ खण्ड होते हैं। यह अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण जमे रहते हैं पर जलवायु परिवर्तन और तापमान के बढने के कारण आज बड़ी मात्रा में ग्लेशियर के पिघलने की गति तेज होती जा रही है। दरअसल ग्लेशियरों के बड़े खण्डों के पिघल कर गिरने से ग्लेशियल झील बनती हैं। ग्लेशियल झील बन जाती है इसे हिमनदी झील भी कह सकते हैं। नेपाल की हालिया त्रासदी ग्लेशियल झील के फटने के कारण ही हुई है। वैज्ञानिकों की माने तो ग्लेशियलों के निर्माण की गति में काफी तेजी आई है। यदि हम हिमालय क्षेत्र की ही बात करें तो सतलुज बेसिन में 2019 में 560 ग्लेशियल झीलें थी जो चार साल यानी की 2023 तक 1048 हो गई हैं। नेपाल त्रासदी ग्लेशियल लेक आदटबर्स्ट फ्लड यानी की ग्लोफ का परिणाम है। साधारण शब्दों में कहा जाएं तो यह ग्लेशियल झील के फटने का परिणाम है। ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिक इन हालातों पर नजर नहीं रख रहे हो बल्कि देखा जाएं तो लीड्स विश्वविद्यालय के ग्लेशियल फ्लडिंग के विशेषज्ञ डॉ. जानाथन कारीविक पहले ही चेता चुके हैं। हमारे देश के ही राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एनडीएमए के विशेषज्ञों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी को रिपोर्ट प्रस्तुत कर हालात से रुबरु कराने के साथ ही ठोस सुझाव भी दिए हैं। दरअसल एक सीमा से अधिक प्रकृति से छेड़छाड़ का ही परिणाम इस तरह की त्रासदियां होती हैं। आज लाख चेतानें के बावजूद सतलुज बेसिन में बांधों के साथ साथ विद्युत परियोजनाओं सहित विकास परियोजनाओं का दखल बढ़ा है। एक सीमा से अधिक मानवीय दखल बढ़ी है। इससे तापमान में स्वाभाविक रुप से बढ़ोतरी होने के साथ ही अपशिष्ट भी फैल रहा है। दरअसल प्रकृति से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रुप से छेडछाड़ बढ़ रही है। एनडीएमए ने साफ साफ कहा है कि सतलुज बेसिन में नए निर्माण कार्यां या नई परियोजनाओं की स्वीकृति से पहले उनके परिणामों का भली प्रकार से अध्ययन और विश्लेषण किया जाएं। परिणामों का आंकलन कर गुणावगुण के आधार पर निर्णय लिए जाए। पर्यावरणीय परिणामों को देखकर ही कोई निर्णय लिया जाएं। यह भी देखा जाएं कि ऐसे स्थानों में मानवीय दखल को एक सीमित दायरें तक ही रखा जाएं। इसके साथ ही जलवायु व पर्यावरण विशेषज्ञों का दायित्व अधिक हो जाता है और आवश्यकता होने पर प्रकृति को बचाने के लिए इस क्षेत्र में कार्य कर रहे गैरसरकारी संगठनों को भी आगे आना होगा। आपदा प्रबंधन को भी ऐसा सिस्टम विकसित करना होगा जिससे इस तरह की घटनाओं की समय रहते चेतावनी मिल सके ताकि कम से कम जन हानि को तो बचाया जा सके।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
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