Jammu Kashmir में सामान्य स्थिति के दावे पर Tarigami ने उठाए सवाल
जम्मू, छह सितंबर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने रविवार को जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकार बहाल करने की मांग करते हुए कहा कि उनके राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने से न तो देश के हितों की पूर्ति होगी और न ही इससे स्थायी शांति स्थापित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने केंद्रशासित प्रदेश में सामान्य स्थिति होने के केंद्र के दावों पर भी सवाल उठाया और कहा कि सरकार को बताना चाहिए कि अगर क्षेत्र में शांति लौट आई है, तो कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों को आतंकवादियों से एक बार फिर धमकियां क्यों मिल रही हैं। तारिगामी ने यहां 12 सितंबर को पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी की दूसरी पुण्यतिथि से पहले उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम से इतर पत्रकारों से बातचीत की।
उन्होंने जम्मू और श्रीनगर में हाल के प्रदर्शनों को लेकर भाजपा की आलोचना की। कुलगाम के विधायक ने कहा, ‘‘भाजपा भी प्रदर्शन कर रही है, जैसे नेशनल कॉन्फ्रेंस (राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए) कर रही है, लेकिन मुझे खुद समझ नहीं आया कि भाजपा आखिर किस बात को लेकर प्रदर्शन कर रही है। जहां तक भाजपा का सवाल है, केंद्र सरकार उनके साथ है और यहां की सरकार भी प्रभावी रूप से उनके हाथ में है—यहां का प्रशासन और अधिकारी भी।’’ उन्होंने पूछा कि शासन और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों के लिए भाजपा किसे जिम्मेदार ठहराएगी।
उन्होंने कहा, ‘‘तो वे शिकायत किससे करने जा रहे हैं? वे किसे जिम्मेदार ठहराएंगे? वे आखिर कहना क्या चाहते हैं?’’ तारिगामी ने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के तरीके की भी आलोचना की और क्षेत्र के उन अधिकारों को बहाल करने की मांग की, जिनका वह उल्लेख कर रहे थे।
उन्होंने कहा, ‘‘लोगों को बहुत लंबे समय तक गुमराह नहीं किया जा सकता। समय बदल रहा है, कश्मीर में भी और यहां जम्मू में भी।’’ विधायिका का जिक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र ने उसे शक्तिहीन कर दिया है। उन्होंने कहा, ‘‘हमें उम्मीद है कि विधायिका को उसका उचित स्थान फिर से प्राप्त होगा।
विधायिका को शक्तिहीन कर दिया गया है, उसे शक्तिहीन किसने किया? भारत सरकार ने।’’ उन्होंने जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकार बहाल करने की मांग करते हुए कहा कि यह क्षेत्र के भविष्य के लिए जरूरी है।
CM Vishnu Deo Sai ने झीरम घाटी हमले पर NIA फैसले के बाद Congress से सबूतों पर सवाल पूछे
रायपुर, छह सितंबर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 2013 के झीरम घाटी माओवादी हमला मामले में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की अदालत के फैसले की आलोचना को लेकर रविवार को कांग्रेस पर निशाना साधते हुए पूछा कि पार्टी ने जांच एजेंसी को अपने दावों का कोई सबूत क्यों नहीं सौंपा। साय ने एक बयान में कहा कि राजनीतिक बयानबाजी से सच नहीं बदल सकता। जगदलपुर की एक विशेष एनआईए अदालत ने इस हमले के सिलसिले में गिरफ्तार सभी 10 आरोपियों को शनिवार को दोषी ठहराया।
इस हमले में वरिष्ठ कांग्रेस नेता, विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र कर्मा सहित 29 लोग मारे गए थे। अदालत ने सजा की अवधि तय करने के लिए 16 सितंबर की तारीख तय की है। यह घातक हमला 25 मई, 2013 को हुआ था, जब माओवादियों ने बस्तर जिले के दरभा थाना क्षेत्र के अंतर्गत झीरम घाटी में एक राष्ट्रीय राजमार्ग पर कांग्रेस की परिवर्तन रैली पर घात लगाकर हमला किया था।
इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे ‘‘अधूरा न्याय’’ करार दिया था। उन्होंने कहा कि हमले के पीछे की कथित बड़ी राजनीतिक साजिश की जांच नहीं की गई है। वहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा था कि 10 आरोपियों को दोषी ठहराया जाना बस्तर, पीड़ितों के परिवारों या कांग्रेस के साथ न्याय नहीं है।
इस आलोचना का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री साय ने कहा कि यह मामला तब एनआईए को सौंपा गया था, जब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार सत्ता में थी। मुख्यमंत्री साय ने कहा, ‘‘जांच और न्यायिक प्रक्रिया लगभग 13 वर्षों तक चली, सौ से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए और अदालत ने सभी तथ्यों तथा सबूतों की जांच करने के बाद अपना फैसला सुनाया। अदालत ने 10 लोगों को दोषी ठहराया है और यह 16 सितंबर को उनकी सजा तय करेगी।’’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस को यह भी याद रखना चाहिए कि एनआईए देश की शीर्ष जांच एजेंसी है, किसी राज्य सरकार की एजेंसी नहीं।
बघेल पर तंज कसते हुए साय ने कहा कि जब कांग्रेस नेता विपक्ष में थे, तब वह दावा किया करते थे कि वह ‘‘अपनी जेब में सबूत लेकर घूम रहे हैं।’’ साय ने बघेल पर निशाना साधते हुए कहा, ‘‘सवाल यह है कि अगर उनके पास सबूत थे, तो उन्होंने इसे एनआईए को क्यों नहीं सौंपा? उनके पास जांच एजेंसी के सामने तथ्यों को रखने के लिए पर्याप्त समय था। आरोप लगाना आसान है, लेकिन उन्हें साबित करने के लिए तथ्यों और सबूतों की आवश्यकता होती है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक कार्यवाही सबूतों और तथ्यों पर आधारित होती है, राजनीतिक बयानों पर नहीं।
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