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Explainer: सितंबर में भी बादलों ने दिया धोखा तो बिगड़ेगा बजट, आम आदमी से लेकर रिजर्व बैंक तक की बढ़ी चिंता

Below Average Rainfall: भारत में इस साल मानसून का मिजाज अब तक काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है. कहीं सामान्य से बहुत कम बारिश हुई तो कहीं कुछ ही घंटों में इतनी तेज बारिश हो गई कि पूरे सीजन का आंकड़ा सामान्य दिखाई देने लगा. अब सितंबर में भी मौसम विभाग ने सामान्य से कम बारिश और सामान्य से अधिक तापमान रहने का अनुमान जताया है. अगस्त में बारिश की कमी के बाद सितंबर की कमजोर बारिश किसानों के लिए चिंता बढ़ा सकती है.

अगर सितंबर में भी बारिश सामान्य से कम रहती है तो खरीफ फसलों की पैदावार पर असर पड़ सकता है. इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चीनी, खाद्य तेल, दाल और कपास जैसी कृषि वस्तुओं के उत्पादन और आयात पर भी पड़ सकता है. आगे चलकर इसका असर खाद्य महंगाई और भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI की नीतियों पर भी दिखाई दे सकता है.

सितंबर की बारिश इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत में जून से सितंबर तक चलने वाला मानसून खेती के लिए बेहद अहम होता है. देश के बड़े हिस्से की खेती आज भी बारिश पर निर्भर है. इस साल मानसून की शुरुआत कमजोर रही थी. जून में सामान्य से करीब 35 फीसदी कम बारिश हुई, जिसके कारण कई इलाकों में खेतों में पर्याप्त नमी नहीं बन पाई.

कम नमी के कारण किसानों को कपास, सोयाबीन, मक्का और धान जैसी खरीफ फसलों की बुवाई में देरी करनी पड़ी. बाद में बारिश हुई भी तो कई जगह लंबे समय तक सूखा रहा और फिर अचानक तेज बारिश हुई. ऐसे मौसम से खेतों में पानी और नमी का संतुलन बिगड़ सकता है.

अब सितंबर में इन फसलों के लिए महत्वपूर्ण समय चल रहा है. सोयाबीन में फलियां बनने और धान-मक्का जैसी फसलों में दाने भरने के दौरान पर्याप्त पानी की जरूरत होती है. अगर इस समय बारिश कम हुई तो फसल की गुणवत्ता और पैदावार दोनों प्रभावित हो सकते हैं.

इस बार मानसून में क्या गड़बड़ी रही?

इस साल मानसून को एक जैसा नहीं कहा जा सकता. देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से काफी कम रही, जबकि कुछ इलाकों में भारी बारिश हुई. यही वजह है कि किसी राज्य या पूरे देश का कुल बारिश आंकड़ा सामान्य दिखने के बावजूद जमीन पर किसानों की स्थिति अलग हो सकती है.

लंबे सूखे के बाद अचानक बहुत ज्यादा बारिश होने से भी खेती को नुकसान हो सकता है. तेज बारिश खेतों की ऊपरी मिट्टी को बहा सकती है और कई जगह जलभराव की समस्या पैदा कर सकती है. दूसरी तरफ बारिश के बीच लंबा अंतराल फसलों में नमी की कमी पैदा करता है.

यानी इस बार सिर्फ बारिश की कुल मात्रा ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि बारिश कब, कितनी और कितने अंतराल पर हुई.

एक नजर में समझिए

  • सितंबर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान है.
  • जून में मानसून की शुरुआत कमजोर रही थी और बारिश सामान्य से करीब 35 फीसदी कम रही.
  • कपास, सोयाबीन, मक्का और धान जैसी खरीफ फसलें नमी की कमी से प्रभावित हो सकती हैं.
  • सितंबर की बारिश सर्दियों में बोई जाने वाली फसलों के लिए खेतों में नमी तय करने में भी अहम होगी.
  • गन्ने का उत्पादन घटने पर चीनी के आयात की जरूरत बढ़ सकती है.
  • सोयाबीन और मूंगफली का उत्पादन घटने पर खाद्य तेलों का आयात बढ़ सकता है.
  • दालों की पैदावार कम होने पर चना, अरहर और मूंग जैसी दालों का आयात बढ़ सकता है.
  • कपास की घरेलू उपलब्धता कम होने पर सरकार आयात शुल्क में राहत दे सकती है.
  • कमजोर मानसून से खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है.
  • महंगाई और आर्थिक विकास दोनों पर दबाव बढ़ने से RBI के लिए ब्याज दरों पर फैसला लेना मुश्किल हो सकता है.

सर्दियों की फसलों पर भी पड़ेगा असर

मानसून का असर सिर्फ खरीफ फसलों तक सीमित नहीं रहता. सितंबर में होने वाली बारिश रबी यानी सर्दियों की फसलों के लिए भी महत्वपूर्ण है.

आमतौर पर सितंबर के मध्य के आसपास मानसून उत्तर-पश्चिम भारत से पीछे हटना शुरू करता है और अक्टूबर के मध्य तक इसकी वापसी पूरी हो जाती है. इसके बाद किसान गेहूं, सरसों, चना और दूसरी रबी फसलों की बुवाई शुरू करते हैं.

रबी फसलों के लिए खेत में पर्याप्त नमी होना जरूरी है. अगर सितंबर में बारिश कम रही तो मिट्टी में नमी का स्तर नीचे जा सकता है. इससे बीजों के अंकुरण और शुरुआती पौधों की बढ़त पर असर पड़ सकता है.

इसका मतलब है कि सितंबर में कमजोर बारिश का असर सिर्फ मौजूदा खरीफ फसल पर नहीं, बल्कि आने वाले रबी सीजन की शुरुआत पर भी दिखाई दे सकता है.

चीनी और खाद्य तेल के आयात पर क्या असर होगा?

कम बारिश का असर गन्ने पर भी पड़ सकता है. गन्ने जैसी पानी की ज्यादा जरूरत वाली फसल को पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है. चीनी मिलें जल्द ही गन्ने की पेराई शुरू करने वाली हैं, इसलिए आने वाले महीनों में उत्पादन का सही अनुमान महत्वपूर्ण होगा.

अगर घरेलू चीनी उत्पादन कम हुआ तो भारत को आयात बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है. सरकार पहले ही इस साल 10 लाख टन कच्ची चीनी को शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दे चुकी है. उत्पादन में ज्यादा कमी आने पर आगे भी ऐसे कदमों की जरूरत पड़ सकती है.

इसी तरह सोयाबीन और मूंगफली जैसी तिलहन फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ तो खाद्य तेल का आयात बढ़ सकता है. भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है. ऐसे में घरेलू उत्पादन में कमी का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर निर्भरता बढ़ा सकता है.

दालों और कपास पर भी नजर

चना, अरहर और मूंग जैसी कई दालें बारिश पर निर्भर क्षेत्रों में उगाई जाती हैं. अगर इस साल उत्पादन कम हुआ तो घरेलू बाजार में दालों की उपलब्धता घट सकती है. ऐसी स्थिति में भारत को म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अफ्रीकी देशों से आयात बढ़ाना पड़ सकता है.

कपास का उत्पादन भी कमजोर मानसून से प्रभावित हो सकता है. अगर घरेलू बाजार में कपास की उपलब्धता कम हुई तो सरकार कपास के आयात को आसान बनाने के लिए शुल्क में सीमित राहत दे सकती है.

भारत गेहूं, कपास और चीनी के दुनिया के बड़े उत्पादकों में शामिल है, जबकि चावल के मामले में भारत दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है. हालांकि चावल का बड़ा सरकारी और निजी स्टॉक होने के कारण इस फसल में सरकार के पास कुछ ज्यादा गुंजाइश बनी रह सकती है.

क्या इससे खाद्य महंगाई बढ़ सकती है?

मानसून और महंगाई का सीधा संबंध है. भारत में खाने-पीने की चीजों का हिस्सा उपभोक्ता महंगाई की टोकरी में एक तिहाई से ज्यादा है. इसलिए फसल उत्पादन में कमी आने पर सब्जियों, दालों, अनाज, खाद्य तेल और दूसरी चीजों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.

पिछले दो वर्षों में अच्छी बारिश ने खाद्य आपूर्ति को बेहतर बनाए रखने में मदद की थी. इससे खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने में भी मदद मिली. लेकिन इस साल अगर मानसून कमजोर रहा और फसलों का उत्पादन घटा तो यह स्थिति बदल सकती है.

जुलाई में खुदरा महंगाई 4.45 फीसदी और खाद्य महंगाई 5.52 फीसदी रही थी. ऐसे में आने वाले महीनों में मौसम की स्थिति महंगाई के लिए एक नया जोखिम बन सकती है.

RBI के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किल?

कमजोर मानसून से भारतीय रिजर्व बैंक के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है. आम तौर पर अगर अर्थव्यवस्था की रफ्तार कमजोर हो और महंगाई भी कम हो तो RBI ब्याज दरों में कटौती करने पर विचार कर सकता है.

लेकिन अगर खराब मानसून के कारण खाने-पीने की चीजें महंगी हो गईं तो महंगाई को नियंत्रित करना ज्यादा जरूरी हो सकता है. ऐसे में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती करना RBI के लिए आसान नहीं रहेगा.

दूसरी तरफ ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी का खतरा भी बना हुआ है. अगर एक तरफ महंगाई बढ़े और दूसरी तरफ आर्थिक विकास धीमा पड़े तो RBI के लिए नीतिगत फैसला और मुश्किल हो सकता है.

क्या यह करीब दो दशक का सबसे कमजोर मानसून बन सकता है?

सितंबर में बारिश सामान्य से कम रही तो पूरे मानसून सीजन की बारिश का घाटा और बढ़ सकता है. ऐसी स्थिति में यह मानसून करीब दो दशकों में भारत के सबसे कमजोर मानसून में शामिल हो सकता है.

हालांकि सिर्फ बारिश की कमी के आधार पर फसल उत्पादन का अंतिम अनुमान लगाना सही नहीं होगा. अलग-अलग राज्यों में बारिश की स्थिति, सिंचाई की उपलब्धता, मिट्टी में नमी, फसल का प्रकार और अक्टूबर-नवंबर के मौसम की परिस्थितियां भी उत्पादन को प्रभावित करेंगी.

फिर भी सितंबर किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण महीना है. अगर इस दौरान पर्याप्त बारिश हुई तो खरीफ फसलों को कुछ राहत मिल सकती है और रबी की बुवाई के लिए भी मिट्टी में जरूरी नमी तैयार हो सकती है. लेकिन बारिश कमजोर रही तो इसका असर खेती से लेकर खाद्य कीमतों, आयात और RBI की नीतियों तक देखने को मिल सकता है.

अल नीनो से क्यों बढ़ी चिंता?

इस पूरे घटनाक्रम में अल नीनो भी महत्वपूर्ण है. अल नीनो की स्थिति में भारत में मानसून कमजोर रहने की संभावना आम तौर पर बढ़ जाती है. यही वजह है कि अल नीनो के मजबूत होने की खबरें मौसम वैज्ञानिकों और कृषि क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ा रही हैं.

भारत की अर्थव्यवस्था में मानसून का महत्व सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है. खेती से किसानों की आय, ग्रामीण मांग, खाद्य कीमतें, आयात-निर्यात और महंगाई तक कई चीजें जुड़ी हुई हैं.

Photograph: (IMD)

इसलिए सितंबर में होने वाली बारिश आने वाले महीनों के लिए काफी अहम हो सकती है. अच्छी बारिश हुई तो किसानों और खाद्य आपूर्ति को राहत मिल सकती है, लेकिन बारिश सामान्य से कम रही तो इसका असर खेतों से निकलकर बाजार और अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है.

यह भी पढ़ें: मौसम की बेरुखी और सिस्टम की नाकामी, बारिश कम, यूरिया-डीएपी की किल्लत से चौपट हो रही फसलें

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चित्रकूट में CM योगी ने बाढ़ पीड़ितों के घावों पर लगाया मरहम, बांटी राहत सामग्री, ढहे मकानों के लिए दिए चेक

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रविवार को अपने एक दिवसीय दौरे पर धर्मनगरी चित्रकूट पहुंचे, जहां मुख्यमंत्री ने भीषण बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों का हवाई और जमीनी निरीक्षण किया। सीएम योगी ने मंदाकिनी नदी की बाढ़ से प्रभावित हुए सैकड़ों परिवारों से मुलाकात कर उनका दुख-दर्द जाना और उन्हें राशन किट व राहत सामग्री वितरित की। आपदा की इस घड़ी में त्वरित सहायता पहुंचाते हुए मुख्यमंत्री ने उन तीन बाढ़ पीड़ितों में से प्रत्येक को 1 लाख 20 हजार रुपए के चेक सौंपे, जिनके आशियाने बाढ़ की भेंट चढ़ गए थे। वहीं, कुछ लाभार्थियों को भूमि आवंटन प्रमाण पत्र भी दिए। प्रशासन अभी सर्वे करा रहा है, शीघ्र ही अन्य प्रभावितों को भी ऐसी ही मदद दी जाएगी।

मजबूती के साथ बाढ़ पीड़ितों के साथ खड़ी

राहत सामग्री वितरण के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनता को आश्वस्त करते हुए कहा कि संकट की इस घड़ी में उत्तर प्रदेश सरकार पूरी मजबूती के साथ बाढ़ पीड़ितों के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि किसी भी पीड़ित को परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। सरकार द्वारा हर वर्ग के सभी प्रभावित लोगों को बिना किसी भेदभाव के हर संभव मदद दी जाएगी। उन्होंने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए कि राहत कार्य में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

मुख्यमंत्री का दिल से आभार जताया

बाढ़ प्रभावित लोगों का दर्द व राहत कार्य की ताजा स्थिति जानने आए सीएम योगी ने चित्रकूट के रामायण मेला में आयोजित राहत सामग्री वितरण कार्यक्रम में मंच से जहां पूर्ण रूप से मकान छतिग्रस्त हो जाने पर मुकेश, लल्लू और चुन्नीलाल में प्रत्येक को 1 लाख 20 हजार रुपए के चेक प्रदान किए तो वही राम सूरज और सूरज कली को भूमि आवंटन प्रमाणपत्र प्रदान किया। मुख्यमंत्री के हाथों तुरंत मदद पाकर बाढ़ पीड़ित खुश नजर आए। राहत सामग्री और पक्के मकान का आश्वासन पाकर लोगों ने मुख्यमंत्री का दिल से आभार जताया।

सीतापुर मलकाना इलाके की रहने वाली रानी व मंजू ने बताया कि बाढ़ में हमारा पूरा घर डूब गया था और गृहस्थी का सारा सामान बर्बाद हो गया था। सुख्यमंत्री ने खुद आकर हमें राशन किट दी है जिससे हमें बड़ी राहत मिली है। मुख्यमंत्री ने हमें नया घर बनवाने का भरोसा भी दिया है।

लगातार खाने-पीने का सामान मिल रहा 

कटरा गूजर गांव की रहने वाली आशा ने बताया कि बाढ़ में हमारा मकान डूब गया था, लेकिन प्रशासन और योगी सरकार की सजगता के कारण बाढ़ के पहले दिन से ही हमें लगातार खाने-पीने का सामान मिल रहा था। आपदा के बीच भी हमें भूखा नहीं सोने दिया गया।

वहीं, एक अन्य बाढ़ पीड़ित ज्ञान सिंह ने कहा कि मेरा कच्चा मकान बाढ़ में ढह गया था। आज राशन किट भी मिली और घर बनवाने का भी आश्वासन मिला है। मैंने अपने जीवन में ऐसे मुख्यमंत्री कभी नहीं देखा जो इतनी जल्दी खुद पीड़ितों के बीच आकर उनका दुख-दर्द बांटें। जो सीएम योगी ने किया, वह आज तक किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया।

संवेदनशीलता की जमकर सराहना की

चित्रकूट की जनता और जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री के इस त्वरित दौरे और संवेदनशीलता की जमकर सराहना की है। बाढ़ क्षेत्रों का दौरा करने के बाद मुख्यमंत्री ने स्थानीय प्रशासन के साथ समीक्षा बैठक कर स्थिति को जल्द से जल्द सामान्य करने और पुनर्वास कार्यों में तेजी लाने के निर्देश दिए।

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