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Mount Everest Glacier Crisis: माउंट एवरेस्ट पर नया खतरा; पर्वतारोहियों के पेशाब से तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर!
माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले देश-विदेश के हजारों पर्वतारोहियों की वजह से हिमालय के इकोसिस्टम पर एक अनूठा और गंभीर संकट खड़ा हो गया है। वैज्ञानिकों के नए शोध से खुलासा हुआ है कि ग्लेशियरों के तेजी से घटने के पीछे इंसान का पेशाब एक बड़ा कारक बन चुका है।
एवरेस्ट के बेस कैंप और उससे ऊपर के कैंपों में पर्वतारोहियों द्वारा छोड़े जाने वाले टन यूरिया और अमोनिया के कारण वहां की प्राकृतिक बर्फ का 'फ्रीजिंग पॉइंट' घट रहा है, जिससे हर साल हजारों टन बर्फ समय से पहले पिघल रही है।
यूरिया और लवणों के कारण कम हो रहा बर्फ का जमने का तापमान
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, इंसानी पेशाब में यूरिया, अमोनिया, सोडियम और पोटेशियम जैसे तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं। जब यह रसायन ग्लेशियर और बर्फ की परतों पर गिरते हैं, तो ये पानी के 'फ्रीजिंग पॉइंट' को कम कर देते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि शून्य डिग्री या उससे कम तापमान पर भी बर्फ पिघलने लगती है। इसके अलावा, पेशाब का हल्का डार्क रंग बर्फ की सफेदी को प्रभावित करता है, जिससे 'अल्बेडो इफेक्ट' कम होता है और सूरज की किरणें अवशोषित होकर बर्फ को और तेजी से पिघलाती हैं।
हर साल 2,500 टन बर्फ हो रही तब्दील, बेस कैंप क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित
एवरेस्ट पर हर साल सैकड़ों पर्वतारोही और उनके साथ जाने वाले शेरपा व गाइड महीनों तक समय बिताते हैं। इस दौरान उच्च ऊंचाई वाले शिविरों में शौचालय की समुचित व्यवस्था न होने के कारण भारी मात्रा में पेशाब बर्फ में ही जम जाता है। गर्मियों के मौसम में जब तापमान हल्का बढ़ता है, तो यही यूरिया-युक्त रसायन एक्टिव होकर आसपास की बर्फ को तेजी से गलाते हैं। अनुमान है कि केवल इस वजह से हर साल 2,500 टन से अधिक प्राकृतिक बर्फ पानी बनकर बह रही है।
पीने के पानी का स्रोत भी हो रहा प्रदूषित
यह संकट केवल ग्लेशियरों के पिघलने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय आबादी के लिए पीने के पानी का गंभीर संकट भी पैदा हो रहा है। ग्लेशियर के पिघलने से निकलने वाला पानी नीचे रहने वाले शेरपा समुदायों और निचले गांवों के लिए जल का मुख्य स्रोत होता है। पेशाब और गंदगी के कारण यह पानी दूषित हो रहा है, जिससे अमोनिया और बैक्टीरिया का स्तर बढ़ रहा है। इससे निचले इलाकों के जलस्रोतों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने का खतरा बढ़ गया है।
नेपाल सरकार और पर्यावरण प्रेमियों ने सख्त नियमों की तैयारी की
इस विकराल समस्या से निपटने के लिए नेपाल सरकार और पर्वतारोहण निकायों ने एवरेस्ट पर नियम कड़े करने शुरू कर दिए हैं। अब पर्वतारोहियों के लिए बेस कैंप से ऊपर 'पूप बैग्स' और यूरिन कलेक्टिंग कंटेनर ले जाना अनिवार्य करने पर काम किया जा रहा है, ताकि मानवीय अपशिष्ट को वापस नीचे लाया जा सके। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि जल्द ही 'क्लीन एवरेस्ट' के तहत सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो एवरेस्ट के प्रसिद्ध खुंबू ग्लेशियर का नामोनिशान मिटने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
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