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फ़िल्म 'स्कूल भूल जाइए' नेशनल अवॉर्ड विनिंग फ़िल्ममेकर मेघना गुलज़ार की सिनेमा ही है वो मास्टरक्लास, जिसकी आपको ज़रूरत है
कुछ फ़िल्ममेकर फ़िल्में बनाते हैं. कुछ अपनी एक पहचान बनाते हैं. लेकिन मेघना गुलज़ार ने इससे भी दिलचस्प काम किया है. उन्होंने एक ऐसी सिनेमैटिक दुनिया खड़ी की है, जिस पर उनकी अपनी छाप साफ़ नज़र आती है. राज़ी, तलवार और सैम बहादुर जैसी फ़िल्मों के ज़रिए मेघना ने अलग-अलग जॉनर और विषयों को छुआ है, लेकिन उनकी कहानी कहने की जड़ हमेशा एक ही जगह रही है: किसी बहुत बड़ी घटना के अंदर छिपी इंसानी कहानी को ढूंढना.
वो एक हेडलाइन को उठाकर उसे परतदार ड्रामा बना सकती हैं, बेहद असहज मुद्दों को बिना सनसनी फैलाए सामने रख सकती हैं, एक गाने के ज़रिए पूरी भावना बयां कर सकती हैं और बॉलीवुड के बड़े-बड़े सुपरस्टार्स को ऐसे किरदारों में ढाल सकती हैं कि दर्शक कुछ देर के लिए भूल ही जाएं कि सामने स्टार है.
अब दायरा के साथ, जिसे मेघना गुलज़ार ने डायरेक्ट किया है और जिसमें करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन नज़र आएंगे, वो एक बार फिर क्राइम, पुलिसिंग और जस्टिस की दुनिया में कदम रख रही हैं. जंगल पिक्चर्स और पेन स्टूडियोज़ द्वारा प्रोड्यूस की गई दायरा सच्ची घटनाओं से प्रेरित है और 18 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज़ होगी.
तो आइए जानते हैं वो पांच वजहें, जो मेघना गुलज़ार के सिनेमा को अपने आप में एक अलग जॉनर बना देती हैं:
1) जहां बाकी लोगों को सिर्फ़ हेडलाइन दिखती है, मेघना वहां पूरी कहानी ढूंढ लेती हैं
मेघना गुलज़ार के लिए हेडलाइन कभी पूरी कहानी नहीं होती. रियल लाइफ़ घटनाएं, असाधारण लोग और ऐसी कहानियां जो पहले ही खबरों में जगह बना चुकी हैं, उनके लिए सिर्फ़ शुरुआत होती हैं. इसके बाद शुरू होता है उन कहानियों के पीछे छिपे लोगों और उनकी भावनाओं में गहरा उतरने का सफ़र. तलवार ने देश के सबसे पेचीदा क्रिमिनल केसों में से एक को लेकर सच के अलग-अलग वर्ज़न्स की तलाश को एक बेहद ग्रिपिंग कहानी में बदल दिया.
राज़ी ने एक असाधारण जासूसी कहानी को देशभक्ति, त्याग और परिवार से जुड़ी बेहद निजी कहानी बना दिया. छपाक ने सिर्फ़ एसिड अटैक की घटना तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि एक ऐसी महिला की कहानी कही जो अपनी ज़िंदगी को दोबारा अपने तरीके से जीना सीखती है. वहीं सैम बहादुर ने सिर्फ़ एक मिलिट्री लीजेंड की कहानी नहीं बताई, बल्कि यूनिफॉर्म के पीछे छिपे इंसान को सामने रखा.
हेडलाइन के अंदर छिपी बड़ी और इमोशनल कहानी को ढूंढ निकालने की यही खूबी शायद मेघना की सबसे बड़ी ताकत है. और दायरा में भी वो एक खौफनाक क्राइम को सिर्फ़ घटना बनाकर नहीं छोड़तीं, बल्कि उसे जस्टिस, पुलिसिंग और उन फैसलों पर एक बड़ी बहस में बदलती नज़र आती हैं, जो तब लिए जाते हैं जब दांव सबसे ऊंचे हों.
2) सबसे मुश्किल मुद्दों को उठाती हैं, लेकिन कभी ऑडियंस को लुभाने के लिए उनका तमाशा नहीं बनातीं
क्राइम. वॉर. देशभक्ति. जस्टिस. कानून. सज़ा. ये ऐसे विषय हैं जिन्हें आसानी से शॉक और सनसनी से भरे सिनेमा में बदला जा सकता है. लेकिन मेघना गुलज़ार इसके उलट रेस्ट्रेंट चुनती हैं और शायद इसी वजह से उनकी कहानियां और भी ज़्यादा असर करती हैं.दर्शकों को असहज करने के लिए उन्हें ग्राफ़िक सीन्स या ओवर-द-टॉप ड्रामा की ज़रूरत नहीं पड़ती. तलवार में आपको बांधे रखती है सच्चाई को लेकर बनी अनिश्चितता.राज़ी में असर करता है सहमत के फैसलों की इमोशनल कीमत.
उनकी फ़िल्में मुश्किल विषयों का इस्तेमाल आसान रिएक्शन पाने के लिए नहीं करतीं. वो उन विषयों के साथ बैठती हैं, उन्हें समझती हैं और दर्शकों को भी सोचने का मौका देती हैं. यही सेंसिबिलिटी दायरा में भी दिखाई देती है. ट्रेलर सिर्फ़ अपने खौफनाक क्राइम को हुक बनाकर नहीं छोड़ता, बल्कि तुरंत दर्शकों को जस्टिस, पुलिस एक्शन और ड्यू प्रोसेस की बड़ी बहस में ले जाता है. करीना कपूर खान की डीसीपी अजूनी कोहली और पृथ्वीराज सुकुमारन के डीसीपी रमन कुमार, जस्टिस को लेकर दो बिल्कुल अलग सोच का प्रतिनिधित्व करते नज़र आते हैं. और शायद फ़िल्म का सबसे बड़ा सवाल भी यही है: जवाब देने के बजाय सवाल पूछे जाएं तो?
3) “दिलबरो” से लेकर “इंसाफ़” तक, गुलज़ार साहब देते हैं मेघना की फ़िल्मों को उनका इमोशनल सिग्नेचर
कुछ गाने हिट होते हैं. कुछ याद बन जाते हैं. और फिर कुछ ऐसे गाने होते हैं जो अपनी फ़िल्म से हमेशा के लिए जुड़ जाते हैं. यहीं गुलज़ार साहब के शब्द मेघना गुलज़ार के सिनेमा में एक और इमोशनल लेयर जोड़ देते हैं. राज़ी का “दिलबरो” इसका परफेक्ट उदाहरण है. ये सिर्फ़ एक गाना नहीं था. ये सहमत और उसके परिवार के रिश्ते की एक इमोशनल खिड़की बन गया. घर छोड़ने का दर्द, रिश्तों की कीमत और एक बड़े मिशन के पीछे छिपे त्याग को इस गाने ने बेहद खूबसूरती से महसूस कराया.
इसी तरह छपाक का एंथम भी फ़िल्म की रूह का हिस्सा बन गया. स्क्रीन से बाहर निकलकर उसने हिम्मत, अपनी पहचान दोबारा हासिल करने और आगे बढ़ने की भावना को आवाज़ दी. मेघना की फ़िल्मों में म्यूज़िक का इस्तेमाल कुछ अलग ही महसूस होता है. ऐसा नहीं लगता कि फ़िल्म में गाने सिर्फ़ इसलिए डाले गए हैं क्योंकि फ़िल्म में साउंडट्रैक चाहिए.
ये गाने कहानी का हिस्सा बन जाते हैं. इमोशन्स को और गहरा करते हैं, रिश्तों को सामने लाते हैं और फ़िल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के पास कुछ ऐसा छोड़ जाते हैं, जिसे वो अपने साथ लेकर घर जाते हैं.
4) मेघना गुलज़ार की फ़िल्म सिर्फ़ देखते नहीं हैं, उससे कुछ लेकर भी निकलते हैं
मेघना गुलज़ार की फ़िल्म आपको एंटरटेन कर सकती है, इमोशनल कर सकती है और फिर चुपचाप आपके सामने ऐसा सवाल रख सकती है, जिसके बारे में आपको लगता था कि आप पहले से सब जानते हैं. तलवार देखने के बाद आप सोचते हैं कि क्या हम सच को जानने का दावा इतनी आसानी से कर सकते हैं? राज़ी देशभक्ति को बेहद निजी बना देती है, क्योंकि उसके केंद्र में त्याग है.
छपाक बातचीत को सिर्फ़ एसिड अटैक से आगे ले जाकर उस महिला की ज़िंदगी पर केंद्रित करती है, जिसे उसके बाद अपनी दुनिया दोबारा बनानी पड़ती है. सैम बहादुर मेडल्स और मिलिट्री हिस्ट्री से आगे जाकर लीडरशिप, हिम्मत और उस लीजेंड के पीछे मौजूद इंसान को समझने की कोशिश करती है.और दायरा भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाता दिखाई देता है.
फ़िल्म का सेंट्रल कॉन्फ्लिक्ट जस्टिस को लेकर एक असहज सवाल खड़ा करता है: जब कोई भयानक अपराध पब्लिक आउटरेज पैदा करता है, तो क्या जस्टिस तुरंत मिलना चाहिए या फिर उसे हमेशा कानून की प्रक्रिया के मुताबिक ही आगे बढ़ना चाहिए? हो सकता है आप थिएटर से निकलते वक्त इसका कोई पक्का जवाब लेकर न निकलें.लेकिन इस सवाल के बारे में सोचे बिना शायद आप थिएटर से बाहर नहीं निकल पाएंगे.
5) आलिया, दीपिका, विक्की, करीना, पृथ्वीराज: मेघना सुपरस्टार्स को किरदारों में ऐसे घोल देती हैं कि स्टार नज़र ही नहीं आता
मेघना गुलज़ार की सबसे इम्प्रेसिव ट्रिक्स में से एक शायद यही है. वो स्टार्स को कास्ट करती हैं, लेकिन स्क्रीन पर पहुंचते ही स्टार गायब हो जाता है. याद रहता है तो सिर्फ़ किरदार और उसे निभाने वाला कलाकार. राज़ी में आलिया भट्ट, आलिया भट्ट नहीं रह गई थीं. वो सहमत बन गई थीं, एक ऐसी युवा महिला जो एक असाधारण दुनिया में धकेल दी जाती है. छपाक में दीपिका पादुकोण बॉलीवुड की ग्लैमरस हीरोइन नहीं लगतीं. वो मालती के किरदार में इस तरह घुल जाती हैं कि उसकी कमजोरी, गुस्सा और हिम्मत कहानी के सेंटर में आ जाते हैं.
सैम बहादुर में विक्की कौशल सिर्फ़ एक मशहूर मिलिट्री फिगर का किरदार नहीं निभाते. वो सैम मानेकशॉ की पर्सनैलिटी, उनकी हाज़िरजवाबी और उनकी कमांडिंग प्रेज़ेंस को जीते हैं. और अब दायरा में करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन को एक ऐसी दुनिया में देखा जाएगा, जिसमें दर्शकों ने उन्हें शायद ही पहले कभी देखा हो. दो सीनियर पुलिस ऑफिसर्स, जिनकी जस्टिस को लेकर सोच उन्हें दो बिल्कुल अलग रास्तों पर ले जाती है.
यही है मेघना इफ़ेक्ट. स्टार आपको फ़िल्म देखने के लिए थिएटर तक लेकर आ सकता है, लेकिन किरदार आपको स्टार को भूलने पर मजबूर कर देता है. एक ऐसा जॉनर, जो सिर्फ़ उनका है रियल कहानियां. मुश्किल विषय. दिल छू लेने वाला म्यूज़िक. और ऐसे किरदार, जो फ़िल्म खत्म होने के बाद भी आपके साथ रहते हैं. इन सबको एक साथ रखिए और मेघना गुलज़ार के सिनेमा को किसी एक कन्वेंशनल जॉनर में फिट करना मुश्किल हो जाता है.
उनकी फ़िल्में क्राइम से स्पायनेज, बायोग्राफिकल ड्रामा से लेकर सर्वाइवल की कहानियों तक सफ़र करती हैं, लेकिन हर कहानी में एक सेंसिबिलिटी ऐसी होती है, जो पूरी तरह मेघना गुलज़ार की अपनी है. दायरा, जिसे जंगल पिक्चर्स और पेन स्टूडियोज़ ने प्रोड्यूस किया है और पेन मरुधर द्वारा डिस्ट्रीब्यूट किया जा रहा है, के साथ मेघना गुलज़ार एक बार फिर एक चैलेंजिंग विषय को बड़े पर्दे पर लेकर आ रही हैं.
और शायद यही सबसे आसान तरीका है ये बताने का कि उनका सिनेमा इतना खास क्यों है: मेघना गुलज़ार सिर्फ़ अलग-अलग जॉनर में काम करने वाली फ़िल्ममेकर नहीं हैं. वो खुद एक जॉनर बन चुकी हैं. दायरा 18 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज़ होगी.
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