सहारनपुर के ज़िला मजिस्ट्रेट के ऑफ़िस कॉम्प्लेक्स में बनी एक अवैध मस्जिद को शनिवार को गिरा दिया गया। अदालत ने इसे हटाने के पहले के आदेश को सही ठहराया था। राजनीतिक नेताओं के विरोध के बीच कलेक्ट्रेट में भारी सुरक्षा बल तैनात किया गया था। शुक्रवार को ज़िला जज की अदालत ने मस्जिद कमेटी की अपील खारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद सुबह-सुबह बुलडोज़र से उस ढांचे को हटाने का काम शुरू हुआ।
BSP प्रमुख मायावती ने भी पूरे राज्य में कथित तौर पर अवैध मस्जिदों को गिराने के उत्तर प्रदेश सरकार के कदम की आलोचना की और इसे रोकने की अपील की। X पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि सरकार बहुत जल्दबाजी में मस्जिदों को अवैध घोषित कर उन्हें गिरा रही है, और ऐसे विवादों को सुलझाने के लिए वैकल्पिक तरीकों को अपनाने की बात कही। मायावती ने कहा कि एक संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी धर्मों के मानने वालों का सम्मान करे और उनके धार्मिक स्थलों की रक्षा करे। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारियों को इस्लामी धार्मिक प्रथाओं में मस्जिदों के महत्व पर विचार करना चाहिए।
BSP प्रमुख ने अलग से आरोपियों के घरों को गिराए जाने पर चिंता जताई और कहा कि कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना परिवारों को सामूहिक रूप से सजा नहीं दी जानी चाहिए या बेघर नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कानून के जरिए कानून का शासन बनाए रखने की बात कही और सरकार व न्यायपालिका से इस मुद्दे पर ध्यान देने और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की अपील की। तोड़-फोड़ की कार्रवाई के दौरान SDM और सिटी मजिस्ट्रेट समेत प्रशासनिक अधिकारी मौके पर मौजूद थे। कलेक्टर ऑफिस के परिसर में भारी पुलिस बल तैनात किया गया था, जिसमें प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबुलरी (PAC) के जवान भी शामिल थे, और एहतियात के तौर पर कॉम्प्लेक्स के सभी गेट बंद कर दिए गए थे।
सहारनपुर के DIG अभिषेक सिंह ने बताया कि सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने पाया था कि मस्जिद "सरकारी ज़मीन पर अवैध रूप से बनाई गई थी" और इस आदेश के खिलाफ की गई अपील को खारिज कर दिया गया था। सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने 17 जुलाई को मस्जिद को अवैध घोषित कर दिया था और उसे गिराने का आदेश दिया था। साथ ही, सरकारी ज़मीन पर कथित अवैध कब्ज़े और उसके गलत इस्तेमाल के मामले में वहां मौजूद लोगों पर लगभग 6.41 करोड़ रुपये का मुआवज़ा भी लगाया था।
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महाराष्ट्र में केवल महाराष्ट्र में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया एफएसएसएआई ने ओल्ड मोंक रम की बिक्री पर रोक लगाई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई में रम की बिक्री पर लगाई गई रोक पर अंतरिम स्टे लगाने से कोर्ट ने इंकार कर दिया। एफएसएसएआई ने ओल्ड मक की बोतल पर मिसलीड करने वाली लेबलिंग और गलत दावों को लेकर महाराष्ट्र में इसकी बिक्री पर रोक लगा दी थी और इस पर इस बिक्री पर अंतरिम स्टे लगाने को लेकर कोर्ट से सुनवाई हुई कोर्ट में लेकिन कोर्ट ने मना कर दिया।
क्या है पूरा मामला
एक्टिंग चीफ जस्टिस रविंद्र वी गुघे और जस्टिस गौतम ए अखांड की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने ओल्ड मॉक की बोतल पर लिखे से इयर्स ओल्ड ब्लेंडेड और वेरी ओल्ड वेटेड ये दो शब्द जो हैं इस पर सख्त ऐतराज जताया। कोर्ट ने कहा आप जनता को गुमराह कर रहे हैं। 7 साल पुरानी का मतलब 7 साल ही होना चाहिए। अगर आप 7 साल का दावा कर रहे हैं तो 7 साल होना चाहिए। कोर्ट ने पैकेजिंग पर बेहद छोटे अक्षरों में लिखी जानकारी पर भी सवाल उठाए। जस्टिस गुगे ने बोतल को हाथ में लेकर कहा कि मैग्नीिफाइंग ग्लास लगाने के बाद भी उन्हें फ्लेवरिंग की जानकारी ठीक से नहीं दिख रही है। कोर्ट में सुनवाई के दौरान जज ने खुद ओल्ड मॉक की बोतल हाथ में लेकर देखी। बोतल पर आर्टिफिशियल फ्लेवरिंग की बेहद बारीक लिखावट थी। इस पर नाराजगी जताते हुए जस्टिस गुगे ने कहा मैंने अपने मैग्नीिफाइंग ग्लास का इस्तेमाल किया फिर भी मुझे नहीं दिखा। मैंने हर कोने से देखने की कोशिश की लेकिन मुझे यह लिखावट नहीं मिली। अब दोनों पक्षों की दलीलें जान लेते हैं।
कंपनी ने कोर्ट में क्या कहा
रम बनाने वाली कंपनी मोहन रॉकी स्प्रिंग वाटर की ओर से एडवोकेट नवरोज सिरावाई दलील दे रहे थे। एफएसएसएआई के नियम न्यूट्रल स्पिरिट में तय फ्लेवर मिलाने की इजाजत देते हैं। ऐसा उन्होंने कहा। उन्होंने कहा कि सभी सामग्री जो सभी कंटेंट्स हैं वो पैकेजिंग पर लिखे गए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दूसरी कॉम्पिटिटिव ब्रांड्स भी यही प्रोसेस अपनाती हैं। लेकिन सिर्फ ओल्ड मॉक को टारगेट किया जा रहा है। तो इसके जवाब में एडिशनल सॉललीिसिटर जनरल अनिल सिंह ने दलील दी कि रूल्स के तहत रम का असली टेस्ट गन्ने के फर्मेंटेशन से आना चाहिए।
FSSAI को क्या आपत्ति है
कोर्ट में FSSAI का पक्ष साफ़ है। जांच के दायरे में आए 'ओल्ड मोंक' के वैरिएंट्स मुख्य रूप से न्यूट्रल स्पिरिट (एक बहुत शुद्ध, बिना स्वाद वाला इथेनॉल) से बनाए जाते हैं, जिसमें मैच्योर रम स्पिरिट का हिस्सा बहुत कम होता है। रम का खास स्वाद और खुशबू, गन्ने से बने वॉश के फर्मेंटेशन, डिस्टिलेशन और लकड़ी के बैरल में एजिंग (पुराना करने की प्रक्रिया) से नहीं, बल्कि बाहर से रम फ्लेवरिंग मिलाकर लाई जाती है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (अल्कोहलिक बेवरेजेज) रेगुलेशंस, 2018' के तहत, रम के तौर पर बेचे जाने वाले प्रोडक्ट में "रम से जुड़ा खास स्वाद और खुशबू" होनी चाहिए। यह स्वाद और खुशबू स्टैंडर्ड प्रोडक्शन तरीकों से आनी चाहिए, न कि ऐसे फ्लेवरिंग से जो इन खूबियों की नकल करते हों। खबरों के मुताबिक, रेगुलेटर की लैब टेस्टिंग में कई पॉपुलर ब्रांड्स में आर्टिफिशियल या नेचर-आइडेंटिकल फ्लेवरिंग पदार्थ पाए गए। इनमें ओल्ड मोंक रम वैरिएंट्स, मैकडॉवेल्स नंबर 1 रम, बैगपाइपर डीलक्स व्हिस्की, ओल्ड कास्क डीलक्स XXX रम, एंटीक्विटी ब्लू व्हिस्की और रॉयल चैलेंज व्हिस्की शामिल हैं। इन नतीजों के आधार पर, FSSAI ने कुछ मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के खिलाफ बिक्री पर रोक लगाने के आदेश जारी किए। साथ ही, यह तर्क दिया कि कंज्यूमर्स को गुमराह करने से बचने के लिए ऐसे प्रोडक्ट्स को "रम-फ्लेवर्ड स्पिरिट" या "व्हिस्की-फ्लेवर्ड स्पिरिट" के तौर पर रीक्लासिफाई किया जाना चाहिए। एक खास विवाद का मुद्दा कुछ ओल्ड मोंक लेबल्स पर "7 इयर्स ओल्ड ब्लेंडेड" का दावा है। FSSAI का कहना है कि इसमें बिना एजिंग वाली न्यूट्रल स्पिरिट मुख्य सामग्री है, जबकि मैच्योर रम ब्लेंड का 5% से भी कम हिस्सा है। लेबलिंग नियमों के अनुसार, उम्र का दावा मिक्स में मौजूद सबसे कम उम्र की स्पिरिट के आधार पर होना चाहिए; इसलिए, उम्र का यह दावा गुमराह करने वाला हो सकता है। कोर्ट ने अभी मामले के गुण-दोष पर कोई फैसला नहीं सुनाया है। कोर्ट ने मोहन मीकिन (और संबंधित मैन्युफैक्चरर्स) द्वारा जमा किए गए संशोधित लेबल मॉकअप की जांच के लिए FSSAI को और समय दिया और अगली सुनवाई 11 सितंबर 2026 के लिए तय की।
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