उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में प्रशासनिक कार्रवाई के तहत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) कार्यालय परिसर के भीतर बनी एक मस्जिद को रात भर चले ऑपरेशन में गिरा दिया गया। सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश के बाद यह कार्रवाई की गई, जिसमें मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण करार दिया गया था। इसके साथ ही मस्जिद कमेटी पर करीब 6.41 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना भी लगाया गया है।समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने बाद में दावा किया कि उन्हें कैराना स्थित उनके घर पर नज़रबंद कर दिया गया था।
कैराना लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली हसन ने कहा कि जब वह मस्जिद गिराए जाने के मामले पर अधिकारियों से मिलने और इलाके के लोगों की चिंताएं उठाने के लिए सहारनपुर जाने की तैयारी कर रही थीं, तभी भारी पुलिस बल उनके घर पहुंचा।
हसन ने कहा, "कल रात मुझे सहारनपुर जाने से रोकने के लिए मेरे कैराना स्थित घर पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया और मुझे नज़रबंद कर दिया गया।" गौरतलब है कि सहारनपुर ज़िला कैराना के अंतर्गत आता है।
32 वर्षीय सांसद ने सवाल उठाया कि क्या अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों से जुड़े मुद्दों पर अधिकारियों से मिलना किसी चुने हुए सांसद के लिए अपराध हो गया है। उन्होंने कहा, "लोकतंत्र में, जन-प्रतिनिधियों को लोगों की आवाज़ उठाने के लिए चुना जाता है। मुझे रोककर उस आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता।"
मस्जिद क्यों गिराई गई?
मस्जिद गिराने की कार्रवाई बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय समन्वयक विकास त्यागी की शिकायत के बाद की गई। उन्होंने आरोप लगाया था कि सहारनपुर में DM ऑफिस कॉम्प्लेक्स के अंदर मस्जिद का अवैध निर्माण किया गया था।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि इस जगह का इस्तेमाल कमर्शियल कामों के लिए किया जा रहा था, जिसमें पोस्ट ऑफिस और बाहरी लोगों को किराए पर दिए गए कमरे शामिल थे, और मस्जिद कमेटी किराया वसूल रही थी।
सुनवाई के बाद, सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने इस ढांचे को तुरंत गिराने का आदेश दिया। प्रशासन ने कहा कि यह कार्रवाई ज़रूरी थी क्योंकि उस जगह पर कब्ज़े और गतिविधियों से सरकारी दफ़्तर की सुरक्षा और गोपनीयता से समझौता हो रहा था।
समाजवादी पार्टी ने BJP सरकार की आलोचना की
समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने हसन को सहारनपुर जाने से रोका ताकि वह मस्जिद गिराए जाने का मुद्दा न उठा सकें।
SP प्रमुख अखिलेश यादव ने शनिवार को ट्वीट किया, "सौहार्द बनाए रखना सरकार की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी और उसकी उपलब्धि भी है।" सहारनपुर में तोड़-फोड़ की कार्रवाई उत्तर प्रदेश में उन धार्मिक ढांचों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई का हिस्सा है, जिन्हें अधिकारी अवैध या कब्ज़े वाली ज़मीन पर बना हुआ बताते हैं। इस तरह की कार्रवाई को कानूनी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है, जिसमें तोड़-फोड़ से पहले कोर्ट के आदेशों और सुरक्षा उपायों का पालन करने का मुद्दा भी शामिल है।
Continue reading on the app
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अगले सप्ताह भारत दौरे से पहले भारत-चीन संबंधों के मोर्चे पर एक बड़ा और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। उच्चस्तरीय कूटनीतिक बातचीत के बाद अब दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच भी संवाद की तैयारी है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है, जब नई दिल्ली और बीजिंग एक ओर सीमा पर तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और सैन्य सतर्कता बरकरार है। साफ है कि भारत-चीन संबंधों की नई तस्वीर संवाद, सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन की बनती जा रही है।
हम आपको बता दें कि हाल में बीजिंग में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच सीमा मुद्दे पर उच्चस्तरीय बातचीत हुई। इसके कुछ ही दिनों बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र में दोनों देशों के कोर कमांडर स्तर की बैठक की तैयारी ने संकेत दिया है कि राजनीतिक और कूटनीतिक संवाद के साथ सैन्य स्तर पर भी तनाव प्रबंधन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले के ताकसिंग क्षेत्र में बढ़ी गतिविधियों के बीच यह बातचीत विशेष महत्व रखती है।
यह घटनाक्रम बताता है कि भारत और चीन अब सीमा विवाद को केवल राजनयिक मुद्दे के रूप में नहीं देख रहे हैं। दोनों पक्ष समझते हैं कि हिमालयी सीमा पर किसी भी स्थानीय तनाव को समय रहते नियंत्रित करना जरूरी है, क्योंकि छोटी-सी घटना भी तेजी से बड़े सैन्य और राजनीतिक संकट में बदल सकती है।
हालांकि, संवाद की इस प्रक्रिया को संबंधों में पूर्ण सामान्यीकरण मानना जल्दबाजी होगी। देखा जाए तो भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा की जड़ें केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं हैं। एशिया में प्रभाव, हिंद महासागर में रणनीतिक उपस्थिति, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, प्रौद्योगिकी, पड़ोसी देशों में प्रभाव और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे अनेक मुद्दे दोनों को प्रतिद्वंद्वी भी बनाते हैं।
इसके बावजूद, दोनों देशों के सामने सहयोग और सह-अस्तित्व की आवश्यकता भी उतनी ही बड़ी है। दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले और तेजी से उभरते एशियाई देशों के बीच लगातार टकराव किसी के हित में नहीं है। व्यापार, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक आर्थिक व्यवस्था और बहुध्रुवीय विश्व जैसे मुद्दों पर दोनों के हित कई जगह मिलते हैं। इसलिए आने वाले समय में भारत-चीन संबंध न तो पूरी मित्रता की दिशा में बढ़ते दिखते हैं और न ही खुले संघर्ष की ओर। अधिक संभावना एक ऐसे रिश्ते की है जिसमें प्रतिस्पर्धा और सहयोग साथ-साथ चलेंगे।
लेकिन इस सह-अस्तित्व की सबसे बड़ी चुनौती चीन की तथाकथित ‘ग्रे-जोन’ रणनीति है। इसमें प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति पैदा किए बिना धीरे-धीरे दबाव बनाना, सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा विकसित करना, सैन्य उपस्थिति बढ़ाना, दावों को मजबूत करना और स्थिति को अपने पक्ष में बदलने का प्रयास शामिल हो सकता है। इस तरह की रणनीति में युद्ध की स्पष्ट शुरुआत नहीं होती, लेकिन प्रतिद्वंद्वी पर लगातार दबाव बना रहता है।
भारत के लिए चुनौती यही है कि वह हर गतिविधि को युद्ध के रूप में न देखे, लेकिन किसी भी रणनीतिक बदलाव को नजरअंदाज भी न करे। सीमा पर सड़कों, सुरंगों, हवाई सुविधाओं और संचार तंत्र का तेजी से विकास मात्र विकास परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता बन चुका है। बेहतर निगरानी, आधुनिक तकनीक, खुफिया क्षमता और सैनिकों तक तेज पहुंच भविष्य की रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से होंगे।
दूसरी ओर, विशेषज्ञों की रणनीतिक सोच में अब एक शब्द तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है, ‘सशस्त्र सह-अस्तित्व’। इसका अर्थ युद्ध की इच्छा नहीं, बल्कि शांति बनाए रखने के लिए पर्याप्त शक्ति और तैयारी रखना है। दूसरे शब्दों में, बातचीत जारी रहे, लेकिन सीमा पर सतर्कता कम न हो; संबंध बेहतर बनाने की कोशिश हो, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति कोई भ्रम न रखा जाए।
बहरहाल, भारत और चीन के बीच फिलहाल शांति की आवश्यकता दोनों को बातचीत की मेज पर बनाए हुए है, लेकिन प्रतिस्पर्धा इतनी गहरी है कि केवल भरोसे के सहारे भविष्य नहीं बनाया जा सकता। भारत चीन संबंधों की नई वास्तविकता यह है कि बातचीत जारी रहेगी, व्यापार और सहयोग के अवसर बने रहेंगे, लेकिन सीमा पर सैनिक भी पूरी तैयारी के साथ तैनात रहेंगे।
नीरज कुमार दुबे
Continue reading on the app