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पूजा में लौंग जलाना क्यों माना जाता है शुभ? जानें इसका धार्मिक महत्व और सही उपाय

Puja me Laung jalane ka mahatva: हिंदू धर्म में लौंग को अत्यंत शुभ और चमत्कारी मसाला माना जाता है, इसी वजह से इसे पूजा-पाठ और विशेष धार्मिक उपायों में इस्तेमाल करने की परंपरा प्रचलित है। मान्यता है कि लौंग की तीखी सुगंध वातावरण को शुद्ध करती है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती है। यही कारण है कि देवी-देवताओं की पूजा में लौंग का जोड़ा अर्पित करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

लौंग को क्यों माना जाता है खास?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, लौंग को देवी दुर्गा और देवी लक्ष्मी दोनों से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि पूजा में लौंग का जोड़ा चढ़ाने से आर्थिक तंगी दूर होती है और घर में धन-समृद्धि आती है। कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि लौंग की तीव्र सुगंध बुरी शक्तियों और नकारात्मक प्रभावों को दूर करने में सहायक मानी जाती है, इसी वजह से इसे तांत्रिक और धार्मिक, दोनों तरह के उपायों में इस्तेमाल किया जाता है।

लौंग से जुड़े प्रचलित उपाय
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, गुरुवार के दिन देवी लक्ष्मी की पूजा में लौंग का जोड़ा अर्पित करना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इससे घर में स्थायी रूप से धन का आगमन होता है। इसके अलावा कुछ परंपराओं में घर के मुख्य द्वार पर कपूर के साथ लौंग जलाने की भी प्रथा है, जिसे नकारात्मक ऊर्जा से बचाव के लिए किया जाता है।

लौंग अर्पित करने का सही तरीका
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा में हमेशा साबुत और ताजा लौंग का इस्तेमाल करना चाहिए। मान्यता है कि लौंग को हमेशा जोड़े में यानी दो की संख्या में अर्पित करना शुभ माना जाता है, क्योंकि विषम संख्या में लौंग चढ़ाना अशुभ माना जाता है। इसके अलावा लौंग अर्पित करते समय मन में देवी-देवताओं का ध्यान करना और श्रद्धा भाव बनाए रखना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

लौंग के औषधीय गुण भी हैं खास
धार्मिक महत्व के साथ-साथ लौंग को आयुर्वेद में भी अत्यंत गुणकारी माना जाता है। मान्यता है कि लौंग में प्राकृतिक एंटीसेप्टिक गुण पाए जाते हैं, जो सर्दी-खांसी और दांत दर्द जैसी समस्याओं में राहत देने में सहायक माने जाते हैं। इसके अलावा इसकी सुगंध को मानसिक तनाव कम करने में भी फायदेमंद बताया जाता है।

आज भी कई घरों में अपनाए जाते हैं लौंग से जुड़े उपाय
समय के साथ भले ही पूजा-पाठ के तरीकों में कुछ बदलाव आया हो, लेकिन लौंग से जुड़े धार्मिक उपाय और परंपराएं आज भी अनेक हिंदू परिवारों में उतनी ही श्रद्धा के साथ अपनाई जाती हैं। खासतौर पर गुरुवार और शुक्रवार के दिन देवी लक्ष्मी की पूजा में आज भी लोग लौंग का जोड़ा अर्पित करना नहीं भूलते।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले संबंधित विषय के विद्वान से सलाह अवश्य लें।

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Diastasis Recti: डिलीवरी के बाद हो सकती है डायस्टेसिस रेक्टी की समस्या, बचाव के लिए करें ये काम

Diastasis Recti: हर महिला की जिंदगी का सबसे खूबसूरत एहसास मां बनने पर होता है। लेकिन कुछ महिलाएं इस दौर में भी पोस्टपार्टम डिप्रेशन की वजह से मानसिक रूप से परेशान रहती हैं। यह एक तरह की मानसिक समस्या है, जो महिला के सोचने, महसूस करने या काम करने के तरीके पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। इस वजह से महिला घबराहट, उदासी, एंग्जायटी, डिप्रेशन और अकेलापन महसूस करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में 22 प्रतिशत महिलाएं पोस्टपार्टम डिप्रेशन से गुजरती हैं। मौटे तौर पर हर 5 में से एक महिला इसका शिकार होती है।

डिप्रेशन के प्रकार: पोस्टपार्टम डिप्रेशन अलग-अलग तरह का होता है। इसके एक प्रकार बेबी ब्लूज में डिप्रेशन का स्तर कम होता है और महिला कुछ ही हफ्तों में अपने आप ठीक हो जाती है। जबकि कुछ महिलाओं में डिप्रेशन लगातार बना रहता है, जिससे वह आत्मघाती कदम भी उठा सकती है। इसे सिवियर पोस्टपार्टम डिप्रेशन कहा जाता है। इस वजह से महिला ही नहीं उसके बच्चे की नींद और भूख दोनों कम हो सकती है। उसका शारीरिक-मानसिक विकास भी प्रभावित होता है। साथ ही परिवार के दूसरे सदस्यों को भी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ सकता है।
  
क्या हैं कारण: प्रेगनेंसी से लेकर डिलीवरी तक का समय एक महिला के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इस दौरान महिलाओं में शारीरिक-भावनात्मक रूप से कई तरह के बदलाव आते हैं, जिनके बारे में अनभिज्ञता, समुचित देख-रेख और उपचार ना कराए जाने पर पोस्टपार्टम डिप्रेशन बढ़ता चला जाता है। इसके कई अन्य कारण हो सकते हैं। जैसे-कम उम्र में मां बनना, हार्मोनल बदलाव होना,  डिलीवरी के बाद कमजोरी आना, प्रेगनेंसी के दौरान वजन बढ़ने और फिगर बिगड़ने का डर होना, पति और परिवार के सदस्यों का सपोर्ट ना मिलने पर तनावग्रस्त रहना, नवजात शिशु की देखभाल को लेकर चिंता होना, नींद पूरी नहीं हो पाना, पोषक आहार ना मिल पाना।

प्रमुख लक्षण: पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण हर महिला में अलग-अलग हो सकते हैं। आमतौर पर पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण में भूख कम लगना या बहुत ज्यादा खाने लगना, किसी से बात करने का मन ना करना, मूड स्विंग होना, उदास या निराश होना, ज्यादा चिंता करना, भावनाओं पर काबू ना रख पाना, बिना किसी कारण रोने का मन करना, नींद ना आना, कमजोरी और थकावट महसूस करना, किसी भी काम में मन ना लगना, चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ना, बच्चे से जुड़ाव महसूस ना होने के कारण उस पर ध्यान ना देना, खुद को या बच्चे को आघात पहुंचाने की कोशिश करना आदि।

करें डॉक्टर से कंसल्ट: अगर मां खुद स्वस्थ नहीं होगी, तो इसका सीधा असर बच्चे के विकास और महिला से जुड़े रिश्तों पर देखा जाता है। इसलिए महिला में पोस्टपार्टम डिप्रेशन का अंदेशा होने पर समुचित सहयोग देना चाहिए। जरूरत हो तो यथाशीघ्र डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए।

ट्रीटमेंट का तरीका: पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षणों के आधार पर इसका इलाज किया जाता है। चिंता को कम करने के लिए मरीज को एंटीडिप्रेसेंट दवाइयां दी जाती हैं। कॉगनेटिव बिहेवियर थेरेपी जैसी साइकोथेरेपी के माध्यम से महिला की काउंसलिंग की जाती है, जिससे महिला इस स्थिति का सामना बेहतर तरीके से कर पाती है।

फैमिली सपोर्ट है जरूरी: डिलीवरी के बाद बच्चे की परवरिश या महिला के रहन-सहन को लेकर परिवार के सदस्यों को यथासंभव उसकी मदद करनी चाहिए। डिलीवरी के बाद मां को खुश और पॉजिटिव रहने के लिए फैमिली को हैप्पी रखने का प्रयास करना चाहिए। सबसे जरूरी है कि महिला के पूरे आराम का ध्यान भी फैमिली मेंबर्स को रखना चाहिए। रात में पूरी नींद के साथ ही दिन में भी महिला को एक-दो घंटे सोना चाहिए। इस दौरान फैमिली मेंबर्स, बच्चे का ध्यान रखें। फैमिली मेंबर्स को महिला के छोटे-छोटे काम करने में मदद करनी चाहिए। चूंकि बच्चे का विकास मां की डाइट पर निर्भर करता है, इसलिए महिला के समुचित पोषण का ध्यान फैमिली मेंबर्स को रखना जरूरी है। उनकी डाइट में एक्स्ट्रा कैलोरी डाइट, मौसमी फल-सब्जियों और डेयरी प्रोडक्ट्स को शामिल करना चाहिए। 


पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बचाव के उपाय

  1. पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बचने के लिए महिलाओं को कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है-
  2. महिला को डिलीवरी से पहले ही बच्चे के आने की तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि बाद में किसी तरह की परेशानी ना हो।
  3. बच्चे का ध्यान रखने के साथ-साथ मां अपनी सेहत का भी ख्याल रखें। शारीरिक बदलावों को खुशी और सहजता से स्वीकारें।
  4. अपने पति, परिवार या करीबियों से खुलकर बात करें। अपनी उलझन और परेशानी बताने से ना हिचकिचाएं।
  5. अपने लिए समय जरूर निकालें। ऐसे काम करें, जिसमें आपको खुशी मिलती है।
  6. अपनी डेली रूटीन में योग और एक्सरसाइज जैसी फिजिकल एक्टिविटीज भी शामिल करें।
  7. शाम के समय अपने बच्चे को लेकर घूमने जाएं, रिलैक्स फील करेंगी।
  8. पोषण से भरपूर संतुलित आहार लें।

मेडिकल सजेशन
डॉ. निशा कपूर
एचओडी-गायनेकोलॉजी
मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल, एनसीआर

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  Sports

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5 captains most runs in ODI: वनडे क्रिकेट में कप्तानी का दबाव अक्सर दिग्गजों का खेल बिगाड़ देता है, लेकिन कुछ खिलाड़ियों ने इस चुनौती को ही अपनी ताकत बना लिया. रिकी पोंटिंग, एमएस धोनी, स्टीफन फ्लेमिंग, अर्जुन रणतुंगा और विराट कोहली जैसे महान कप्तानों ने न केवल अपनी टीमों का नेतृत्व किया, बल्कि कप्तानी के दौरान बल्ले से रनों का अंबार भी लगाया. पोंटिंग की स्थिरता से लेकर धोनी की फिनिशिंग और कोहली की आक्रामकता तक, वनडे क्रिकेट के इतिहास में बतौर कप्तान सबसे ज्यादा रन बनाने वाले 5 बल्लेबाजों के बारे में जानिए. Sat, 5 Sep 2026 17:34:15 +0530

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