कान्हा एक ठौर के नायं, सबके हैं
मथुरा से गोकुल, गोकुल से वृंदावन और वृंदावन से द्वारका तक कृष्ण की लीला का भूगोल फैलता गया, लेकिन ब्रज ने उन्हें कभी दूर नहीं जाने दिया. यहां कृष्ण भगवान से पहले कन्हैया हैं, श्याम हैं, नंदलाल हैं, लाला हैं. उनसे बात होती है, शिकायत होती है, रूठना होता है, मनाना होता है. ब्रज में भक्ति में जितना दर्शन है, उतना ही अपनापन भी है. यहां कोई बड़े-बड़े शब्दों में नहीं कहता कि ईश्वर और जीव का संबंध क्या है. कोई बस इतना कह देता है- 'कान्हा तो ब्रज के हिय में बसैं.'
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