Bulandshahr News: स्वतंत्र भारद्वाज को Delhi Police ने हिरासत में लिया! Sanjay Kumar Case
Bulandshahr News: स्वतंत्र भारद्वाज को Delhi Police ने हिरासत में लिया! Sanjay Kumar Case #SwatantraBhardwaj #BulandshahrNews #DelhiPolice #SanjayKumar #NishuAzad #JantarMantar #UPNews #BreakingNews #DelhiNews #LatestNews #HindiNews #CJP #ViralNews Bulandshahr News: स्वतंत्र भारद्वाज को दिल्ली पुलिस ने उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से हिरासत में लिया है। यह कार्रवाई जंतर-मंतर पर संजय कुमार के साथ कथित मारपीट के मामले में हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस स्वतंत्र भारद्वाज को बुलंदशहर के चोला थाने ले गई, जहां पूछताछ की गई। news18 live | aaj ka taaja khabar | आज की ताजा खबर | up live news | news18 up live news | up news live | aaj ke taaja khabar | hindi hews | latest news | news in hindi | hindi samachar | hindi khabar | n18oc_uttar_pradesh Follow Every Breaking Story LIVE ???? Watch News18 LIVE 24x7: https://youtube.com/live/pVXYxHNwJo8 SUBSCRIBE to get the Latest News & Updates - http://bit.ly/News18UP News18 Mobile App - https://onelink.to/desc-youtube Follow Us on Social Media: Website: https://bit.ly/3auydBL Twitter: https://twitter.com/News18UP https://twitter.com/News18_UK Facebook: https://www.facebook.com/News18UP/ https://www.facebook.com/News18UK/ About Channel: News18 UP Uttarakhand is one of India's leading Hindi news channel and can be watched live on YouTube. News18 UP Uttarakhand news channel is a part of Network 18. Topics such as politics, education, health, environment, economy, business, sports, and entertainment are covered by this channel. The channel gives nationwide coverage. News18 UP Uttarakhand ,भारत का एक मात्र भरोसेमंद और लोकप्रिय न्यूज़ चैनल है। यह चैनल नेटवर्क १८ का हिस्सा है। यह चैनल उत्तरप्रदेश एवं उत्तराखंड के सभी क्षेत्रीय खबरों के साथ साथ सरकार, राजनीति, पर्यावरण , खेल-कूद से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय खबरें प्रसारित करता है|
DNA से पिता साबित होना रेप का सबूत नहीं:दिल्ली HC ने कहा- इससे यह साबित नहीं होता कि संबंध सहमति से बने थे या जबरदस्ती
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि DNA जांच से किसी व्यक्ति का बच्चे का जैविक पिता होना और यौन संबंध बनना साबित हो सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि संबंध सहमति से बने थे या जबरदस्ती। कोर्ट ने कहा कि DNA अपने आप में रेप का सबूत नहीं है। जस्टिस मधु जैन ने यह टिप्पणी उस अपील को खारिज करते हुए की, जो एक महिला ने एक व्यक्ति के बरी होने के खिलाफ दायर की थी। उस व्यक्ति पर महिला से बार-बार रेप करने, नशीला पदार्थ देने, अप्राकृतिक यौन कृत्य करने और धमकी देने के आरोप थे। कोर्ट ने कहा, “आरोप की गंभीरता आपराधिक मुकदमे में जरूरी सबूत के स्तर की जगह नहीं ले सकती।” अगर सबूत से बेगुनाही के पक्ष में भी उचित निष्कर्ष निकलता है, तो उसका लाभ आरोपी को देना होगा। यह जानकारी न्यूज एजेंसी ANI ने दी है। हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2024 का फैसला बरकरार रखा दिल्ली हाईकोर्ट ने द्वारका की अदालत का अक्टूबर 2024 का फैसला बरकरार रखा। द्वारका कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 376(2)(n), 377, 328, 506 और 509 के तहत लगे आरोपों से बरी किया था। महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी उसके परिवार को जानता था। उसने 2017 से धमकी देकर और बहला-फुसलाकर उसकी इच्छा के खिलाफ बार-बार शारीरिक संबंध बनाए। महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि एक बार आरोपी ने उसे नशीला पदार्थ दिया और उसके बाद उसका यौन शोषण किया। इसके बाद जून 2019 में उसने एक बच्चे को जन्म दिया। DNA जांच से यह साबित हुआ कि आरोपी ही बच्चे का जैविक पिता है। हालांकि, जस्टिस मधु जैन ने कहा कि DNA रिपोर्ट महत्वपूर्ण होने के बावजूद सिर्फ यौन संबंध और पितृत्व साबित करती है। सहमति थी या नहीं, यह DNA से तय नहीं होता कोर्ट ने कहा, “DNA रिपोर्ट अपने आप में यह साबित नहीं करती कि यौन संबंध किन परिस्थितियों में बने थे। यह भी तय नहीं करती कि संबंध सहमति से थे या बिना सहमति के।” हाईकोर्ट के मुताबिक, असली सवाल यह था कि क्या अभियोजन पक्ष ने बिना किसी उचित संदेह के यह साबित किया कि महिला की सहमति नहीं थी और रेप का अपराध हुआ था। कोर्ट ने कहा कि सहमति न होने से जुड़ी कानूनी धारणा का मतलब यह नहीं है कि महिला की गवाही न्यायिक जांच से बाहर हो जाती है। महिला की अकेली गवाही पर कोर्ट की टिप्पणी हाईकोर्ट ने माना कि उचित मामले में महिला की अकेली गवाही के आधार पर भी दोषी ठहराया जा सकता है। लेकिन ऐसी गवाही भरोसा पैदा करने वाली होनी चाहिए और न्यायिक जांच में टिकनी चाहिए। कोर्ट ने कहा, “महिला की गवाही को किसी उचित मामले में दोषसिद्धि का अकेला आधार बनाया जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी गवाही का भरोसेमंद होना जरूरी नहीं है।” कोर्ट ने यह भी कहा कि यौन अपराध के आरोप होने भर से अदालतें गवाही में मौजूद महत्वपूर्ण विरोधाभासों और असंगतियों को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। पीड़िता के व्यवहार को रूढ़ धारणाओं से नहीं परखा जा सकता जस्टिस मधु जैन ने कहा कि यौन अपराध के मामले में महिला के व्यवहार को इस सोच के आधार पर नहीं परखा जा सकता कि यौन हिंसा की पीड़िता को किस तरह व्यवहार करना चाहिए। कोर्ट ने कहा, “यौन अपराध की शिकायत करने वाली महिला के व्यवहार को इस रूढ़ धारणा के आधार पर नहीं परखा जा सकता कि पीड़िता को किस तरह व्यवहार करना चाहिए।” साथ ही, कोर्ट ने साफ किया कि जब अदालत को दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों का आकलन करना हो और यह तय करना हो कि अभियोजन ने संदेह से परे अपना मामला साबित किया या नहीं, तब पक्षों का व्यवहार और आसपास की परिस्थितियां पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं मानी जा सकतीं। गवाही में कई विरोधाभास मिले हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने किसी एक परिस्थिति को निर्णायक मानने के बजाय सभी सबूतों का मिलाकर आकलन किया था। हाईकोर्ट के मुताबिक, ट्रायल कोर्ट ने महिला के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास पाए। ये विरोधाभास नशीला पदार्थ दिए जाने, पहली कथित घटना के समय महिला के होश में होने, उसकी प्रेग्नेंसी की परिस्थितियों और उसके पति के बच्चे के पितृत्व पर शक से जुड़े थे। कोर्ट ने उस कथित पुलिस कॉल को लेकर भी बयानों में असंगति का जिक्र किया, जो पति के महिला और आरोपी को आपत्तिजनक स्थिति में देखने के बाद किए जाने की बात कही गई थी। महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसकी नग्न तस्वीरें और वीडियो बनाए थे और उन्हें प्रसारित करने की धमकी दी थी। कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों को इलेक्ट्रॉनिक सबूतों का समर्थन नहीं मिला। कथित तस्वीरें, वीडियो और चैट पेश नहीं किए गए। आरोपी के मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच के दौरान भी इन्हें बरामद नहीं किया गया। ‘झूठा फंसाने की वजह नहीं थी’ तर्क पर कोर्ट का जवाब महिला ने दलील दी थी कि उसके पास आरोपी को झूठा फंसाने और खुद को सामाजिक बदनामी के सामने लाने की कोई वजह नहीं थी। इस पर जस्टिस मधु जैन ने कहा, “ऐसी दलील सबूत की जगह नहीं ले सकती।” कोर्ट ने कहा कि आपराधिक आरोप का फैसला अदालत में पेश किए गए सबूतों के आधार पर होना चाहिए, न कि इस धारणा पर कि शिकायत करने के पीछे किसी व्यक्ति को क्या वजह हो सकती है या नहीं हो सकती। बरी किए जाने के खिलाफ अपील पर सिद्धांत दोहराया हाईकोर्ट ने बरी किए जाने के खिलाफ अपील से जुड़े स्थापित सिद्धांत को भी दोहराया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए अपीलीय अदालत दखल नहीं दे सकती, क्योंकि सबूतों की कोई दूसरी व्याख्या भी संभव है। कोर्ट के मुताबिक, बरी किए जाने का फैसला तभी पलटा जा सकता है, जब ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष पूरी तरह गलत हों, साफ तौर पर गैरकानूनी हों, महत्वपूर्ण सबूतों को गलत समझने पर आधारित हों या जब आरोपी का दोषी होना ही एकमात्र संभव निष्कर्ष हो। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर उचित और संभव था। “सिर्फ यह तथ्य कि कोई दूसरा निष्कर्ष भी संभव है, बरी किए जाने के खिलाफ अपील में दखल देने के लिए पर्याप्त नहीं है।” कोर्ट ने यह भी कहा कि बरी किए जा चुके आरोपी के पक्ष में बेगुनाही की मजबूत धारणा काम करती है। ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई गंभीर गलती या गैरकानूनी बात नहीं मिलने पर हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और आरोपी को बरी किए जाने का फैसला बरकरार रखा।
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