मूवी रिव्यू- जीवन या भीमा कॉन:2 करोड़ के इंश्योरेंस के लिए रची मौत की साजिश, अरशद वारसी की कॉमेडी हंसाती है या उलझाती है?
कास्ट- अरशद वारसी, विजय राज, संजीदा शेख डायरेक्टर- अभिषेक डोगरा ड्यूरेशन: 1 घंटा 55 मिनट रेटिंग- 3/ 5 एक आदमी अपनी मौत का झूठा नाटक रचता है, करोड़ों का इंश्योरेंस पाने का सपना देखता है और फिर उसकी जिंदगी में ऐसा बवाल शुरू होता है कि संभालना मुश्किल हो जाता है। ‘जीवन या भीमा कॉन?’ का आइडिया पहली नजर में काफी मजेदार लगता है और फिल्म की शुरुआत भी इसी वजह से उम्मीद जगाती है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, कॉमेडी के साथ उलझन भी बढ़ती जाती है। कुछ सीन खूब हंसाते हैं, कलाकारों की टाइमिंग भी अच्छी है, लेकिन कहानी हर बार अपने ही सेटअप का पूरा फायदा नहीं उठा पाती। कैसी है फिल्म की कहानी? कहानी है जीवन (अरशद वारसी) की, जो एक आम आदमी है और अपनी जमा-पूंजी एक रेस्टोरेंट खोलने में लगा देता है। हालात बिगड़ते हैं, कर्ज बढ़ता है और पैसे की जरूरत ऐसी आती है कि जीवन अपनी मौत का नाटक करने की खतरनाक योजना बना लेता है। किस्मत उसका साथ कुछ इस तरह देती है कि उसे अपने हमशक्ल भीमा (अरशद वारसी) के बारे में पता चलता है। भीमा एक डायमंड स्मगलर है, जिसका संबंध गैंगस्टर विनायक (विजय राज) से है। जीवन और उसकी पत्नी योजना (संजीदा शेख) मिलकर भीमा की पहचान का फायदा उठाकर दो करोड़ रुपए का इंश्योरेंस हासिल करने की कोशिश करते हैं। लेकिन प्लान यहां से बिगड़ना शुरू होता है। भीमा के पीछे पड़े विनायक और उसका साथी मनु (बृजेंद्र काला) उनके घर तक पहुंच जाते हैं। दूसरी तरफ इंश्योरेंस इंस्पेक्टर (अतुल परचुरे) भी क्लेम की जांच में लग जाता है। घर की मालकिन याशिका (पूजा चोपड़ा) की अपनी अलग दिलचस्पी है। इसके बाद हर किरदार दूसरे को शक की नजर से देखने लगता है और शुरू होती है गलत पहचान, झूठ और पैसों के पीछे भागने की कॉमेडी। कैसी है स्टारकास्ट की एक्टिंग? अरशद वारसी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। एक तरफ वह परेशान, कर्ज में डूबे जीवान बने हैं और दूसरी तरफ शराबी डायमंड स्मगलर भीमा। दोनों किरदारों के हाव-भाव, बोलने के तरीके और बॉडी लैंग्वेज में फर्क दिखाना आसान नहीं था, लेकिन अरशद इसे अच्छी तरह संभालते हैं। खासकर भीमा वाले हिस्सों में उनका कॉमिक टाइमिंग फिल्म को कई बार बचाता है। संजीदा शेख, योजना के किरदार में अच्छी लगती हैं और अरशद के साथ उनकी केमिस्ट्री भी सहज लगती है। विजय राज अपने अंदाज में फिल्म में क्राइम और कॉमेडी का अच्छा बैलेंस बनाते हैं। बृजेंद्र काला भी अपने किरदार में फिट बैठते हैं और कुछ सीन में अच्छी हंसी निकालते हैं। पूजा चोपड़ा को याशिका के रूप में कुछ मजेदार मौके मिलते हैं, हालांकि उनके किरदार को थोड़ा और इस्तेमाल किया जा सकता था। दिवंगत अतुल परचुरे इंश्योरेंस इंस्पेक्टर के छोटे लेकिन असरदार रोल में अपनी स्वाभाविक कॉमिक टाइमिंग दिखाते हैं। कैसा है डायरेक्शन, स्क्रीनप्ले और टेक्निकल एस्पेक्ट्स? डायरेक्टर अभिषेक डोगरा ने कहानी को ज्यादातर एक ही घर के अंदर रखा है। इससे फिल्म का सेटअप एक तरह की कमरे में बंद कॉमेडी जैसा बन जाता है, जहां कलाकारों और स्क्रीनप्ले पर पूरा दारोमदार रहता है। शुरुआत में यह तरीका काम करता है, लेकिन बाद में यही सीमित लोकेशन कहानी पर भारी पड़ने लगती है। स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी समस्या यह है कि फिल्म के पास एक अच्छा आइडिया होने के बावजूद उसके साथ लगातार नए और मजेदार खेल नहीं किए जाते। कुछ स्थितियां बार-बार दोहराई जाती हैं। गलत पहचान से पैदा होने वाली कॉमेडी में काफी गुंजाइश थी, लेकिन कहानी उस संभावनाओं को पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाती। फिल्म में कुछ वन-लाइनर्स हंसाते हैं, लेकिन कई जगह हास्य जरूरत से ज्यादा साधारण और जबरदस्ती का लगता है। खासकर फार्ट जोक्स और टॉयलेट ह्यूमर हर दर्शक को पसंद आए, यह जरूरी नहीं। फिल्म का दूसरा हिस्सा कुछ जगह खिंचता हुआ महसूस होता है और क्लाइमैक्स भी बहुत ज्यादा चौंकाता नहीं है। टेक्निकल तौर पर फिल्म ठीक-ठाक है। सिनेमैटोग्राफी कहानी के हिसाब से काम करती है और प्रोडक्शन डिजाइन फिल्म के मिडिल क्लास माहौल को सपोर्ट करता है। एडिटिंग पहले हिस्से में ठीक रहती है, लेकिन बाद के हिस्से में कुछ सीन और छोटे किए जा सकते थे। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? फिल्म का म्यूजिक कहानी पर हावी नहीं होता और ज्यादातर बैकग्राउंड तक ही सीमित रहता है। कोई ऐसा गाना नहीं है जो फिल्म देखने के बाद लंबे समय तक याद रह जाए। हालांकि बैकग्राउंड स्कोर कॉमेडी और क्राइम वाले हिस्सों को सपोर्ट करता है और फिल्म के माहौल के हिसाब से ठीक बैठता है। फाइनल वर्डिक्ट: फिल्म देखें या नहीं? ‘जीवन या भीमा कॉन?’ के पास एक ऐसा आइडिया है, जिससे एक शानदार कॉमेडी ऑफ एरर्स बनाई जा सकती थी। कलाकार भी अच्छे हैं और अरशद वारसी फिल्म को लगातार संभालते नजर आते हैं। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, दोहराए गए मजाक, कुछ जबरदस्ती के जोक्स और अनुमान लगाने लायक क्लाइमैक्स फिल्म को उस स्तर तक नहीं पहुंचने देते, जहां यह यादगार कॉमेडी बन सके। फिर भी अगर आप बिना ज्यादा उम्मीद के हल्की-फुल्की कॉमेडी देखना चाहते हैं, तो फिल्म एक बार मनोरंजन कर सकती है। मसाला मौजूद है, कलाकार भी दमदार हैं, बस कहानी की आंच थोड़ी और तेज होती तो स्वाद काफी बेहतर होता।
मर्चेंट री-केवाईसी की डेडलाइन बढ़ाने की मांग:पेमेंट एग्रीगेटर्स ने RBI को पत्र लिखा, 30% से ज्यादा छोटे ऑफलाइन व्यापारियों पर असर की आशंका
पेमेंट एग्रीगेटर्स (PAs) ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से मर्चेंट्स के रीयू-केवाईसी (Re-KYC) को पूरा करने की 15 सितंबर की समयसीमा को आगे बढ़ाने का अनुरोध किया है। ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों क्षेत्रों में हजारों व्यापारियों का केवाईसी काम अटका पड़ा है। समयसीमा न बढ़ने पर देश में डिजिटल भुगतान सेवाएं प्रभावित होने का खतरा मंडरा रहा है। लाखों छोटे कारोबारियों पर बंद होने का खतरा रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूपीआई भुगतान के लिए क्यूआर (QR) कोड इस्तेमाल करने वाले करीब 30 से 35 प्रतिशत छोटे और अनौपचारिक ऑफलाइन व्यापारी तय समय में प्रक्रिया पूरी करने में असमर्थ रह सकते हैं। इसके अलावा, लगभग 10 लाख (1 मिलियन) छोटी ऑनलाइन व्यावसायिक इकाइयों के भी सत्यापन समयसीमा से चूकने की आशंका है। पेटीएम, फोनपे और गूगल पे के सामने बड़ी चुनौती पेटीएम, फोनपे और गूगल पे जैसी ऑफलाइन मर्चेंट एक्वायरिंग कंपनियों के पास छोटे शहरों और गांवों में लाखों छोटे मर्चेंट्स हैं, जो इनके क्यूआर स्टैंडीज और साउंडबॉक्स का इस्तेमाल करते हैं। सख्त केवाईसी मानकों और भौतिक (फिजिकल) सत्यापन में इन कंपनियों को काफी दिक्कतें आ रही हैं, क्योंकि कई छोटे व्यापारियों के पास पूरे कागजात मौजूद नहीं हैं। नियमों के कड़े होने से बढ़ीं व्यावहारिक मुश्किलें एक पेमेंट एग्रीगेटर के संस्थापक और सीईओ ने बताया, "आरबीआई ने हमेशा क्रियान्वयन की व्यावहारिक चुनौतियों को समझा है और जहां भी रुकावट का जोखिम दिखता है, वहां उद्योग के साथ सक्रिय रूप से चर्चा की है।" पेमेंट एग्रीगेटर्स का मानना है कि छोटे मर्चेंट्स वित्तीय समावेशन के लक्ष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, इसलिए नियामक द्वारा राहत दिए जाने की पूरी संभावना है। कर्मचारियों की कमी और इन-पर्सन वेरिफिकेशन की शर्त केवाईसी की यह समस्या आरबीआई द्वारा सितंबर 2025 में जारी किए गए मास्टर डायरेक्शंस के बाद सामने आई है। नए नियमों के तहत पेमेंट एग्रीगेटर्स को तीन श्रेणियों—PA-ऑनलाइन, PA-फिजिकल और PA-क्रॉस बॉर्डर में बांटा गया था। आरबीआई के नियमों के अनुसार, इन-पर्सन केवाईसी केवल पेमेंट एग्रीगेटर के अपने कर्मचारियों द्वारा ही किया जा सकता है, किसी थर्ड-पार्टी एजेंसी से नहीं। इसके चलते कंपनियों को अतिरिक्त कर्मचारी तैनात करने पड़ रहे हैं और उनके पास क्षमता की कमी (कैपेसिटी कंस्ट्रेंट) पैदा हो गई है। डिजिटल भुगतान पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर हालांकि यह मर्चेंट्स संख्या में काफी ज्यादा हैं, लेकिन कुल भुगतान वैल्यू और वॉल्यूम में इनका योगदान बहुत कम है। इस वजह से ओवरऑल पेमेंट इकोसिस्टम पर कोई बड़ा वित्तीय प्रभाव नहीं पड़ेगा। ज्यादातर पेमेंट एग्रीगेटर्स अंतिम तिथि तक करीब 80 प्रतिशत री-केवाईसी पूरा कर लेने की स्थिति में हैं। क्या होता है केवाईसी (KYC)? केवाईसी यानी 'नो योर कस्टमर' (Know Your Customer) एक सत्यापन प्रक्रिया है। इसके जरिए बैंक और वित्तीय संस्थान अपने ग्राहकों या व्यापारियों की पहचान और पते की पुष्टि करते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में धोखाधड़ी, मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों को रोकना होता है।
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