स्मृति मंधाना ने रचा इतिहास, एक साथ तोड़ा मिताली राज और मेग लैनिंग का वर्ल्ड रिकॉर्ड, 2 मामलों में बनीं नंबर-1 बल्लेबाज
Smriti Mandhana: भारतीय महिला क्रिकेट टीम के उप-कप्तान स्मृति मंधाना ने महिला एशिया कप 2026 में शतक जड़ इतिहास रच दिया है. मंधाना ने एक साथ भारत की पूर्व कप्तान मिताली राज और ऑस्ट्रेलिया की मेग लैनिंग का वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ दिया है.
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Explainer: क्या जंतर-मंतर और GenZ के विरोध-प्रदर्शन इस साल DUSU चुनावों में राजनीतिक समीकरण बदलेंगे?
DUSU Election 2026: इतिहास गवाह है कि जब युवा अपनी ताकत को पहचानकर संगठित होते हैं, तो बड़े से बड़े बदलाव की शुरुआत होती है. युवाओं की ऊर्जा, उनका आदर्शवाद और व्यवस्था में बदलाव की इच्छा किसी भी देश की दिशा बदलने की ताकत रखती है. यही वजह है कि जब युवा किसी मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतरते हैं या अपनी आवाज बुलंद करते हैं, तो उसका असर राजनीति तक जरूर पहुंचता है.
हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन ने Gen Z यानी नई युवा पीढ़ी से जुड़े मुद्दों को मुख्य राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है. शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, फीस, प्रशासनिक जवाबदेही और युवाओं के भविष्य जैसे सवाल अब केवल सोशल मीडिया की बहस नहीं रह गए हैं. इनका असर छात्र राजनीति में भी दिखाई देने लगा है.
इसी माहौल के बीच दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन यानी DUSU चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है. 18 सितंबर को होने वाले चुनाव और 19 सितंबर को आने वाले नतीजों को लेकर विश्वविद्यालय कैंपस में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है. इस बार चुनाव इसलिए भी अहम माने जा रहे हैं क्योंकि मुकाबला सिर्फ ABVP और NSUI जैसे पारंपरिक छात्र संगठनों के बीच नहीं है, बल्कि बदलती युवा सोच भी इस चुनाव की दिशा तय कर सकती है.
DUSU चुनाव इस बार क्यों है खास?
दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति का असर लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति तक दिखाई देता रहा है. यहां के छात्रसंघ चुनाव में जीतने वाले कई छात्र नेता आगे चलकर मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बने हैं. इसलिए DUSU चुनाव को अक्सर देश की युवा राजनीति का एक महत्वपूर्ण संकेतक भी माना जाता है.
1970 के दशक से ही DUSU में मुख्य मुकाबला ABVP और NSUI के बीच देखने को मिलता रहा है. इनके अलावा AISA और दूसरे छात्र संगठन भी चुनाव में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं. लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ अलग नजर आ रही हैं.
जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन के बाद युवाओं के बीच जिस तरह शिक्षा, रोजगार और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे सवाल उठे हैं, उसने छात्र राजनीति के पुराने मुद्दों को चुनौती दी है. अब सवाल यह है कि क्या छात्र इस बार सिर्फ संगठन की ताकत, राजनीतिक पहचान और प्रभाव देखकर वोट करेंगे या फिर अपने वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता देंगे?
Gen Z की राजनीति आखिर कैसी है?
Gen Z को उस पीढ़ी के रूप में देखा जाता है, जिसने इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में अपनी राजनीतिक समझ विकसित की है. यह पीढ़ी किसी नेता या संगठन की बात को सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करती कि वह लंबे समय से राजनीति में है. सवाल पूछना, जानकारी हासिल करना और अलग-अलग दावों की तुलना करना इसकी राजनीतिक शैली का हिस्सा बनता जा रहा है.
इसका असर DUSU चुनाव प्रचार पर भी पड़ सकता है. पारंपरिक भाषणों, पोस्टर और पर्चों के साथ अब Instagram Live, छोटे वीडियो और सोशल मीडिया कैंपेन भी छात्रों तक पहुंचने के बड़े माध्यम बन गए हैं.
युवा अब यह पूछ रहे हैं कि एडमिशन प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, फीस क्यों बढ़ रही है, हॉस्टल की कमी कब दूर होगी, कैंपस में बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं सुधर रहीं और मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर विश्वविद्यालय प्रशासन की क्या जिम्मेदारी है. यानी छात्र राजनीति में सवाल अब केवल यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह भी है कि जीतने के बाद छात्रों के मुद्दों पर कौन काम करेगा.
जंतर-मंतर आंदोलन का कितना असर?
इस चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन का असर छात्रों के वोट पर कितना पड़ेगा. राजनीतिक विश्लेषक नवीन गौतम के मुताबिक, जंतर-मंतर पर हुए धरने और प्रदर्शनों ने छात्रों को पारंपरिक राजनीति के बारे में दोबारा सोचने पर मजबूर किया है. उनका कहना है कि प्रदर्शन में सक्रिय रहे युवा अब DUSU चुनाव में मुद्दा आधारित राजनीति चाहते हैं. वे सिर्फ नारे और पर्चों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि प्रशासन से सीधे सवालों के जवाब मांग रहे हैं.
अगर यह बदलाव छात्रों के मतदान व्यवहार में दिखाई देता है, तो इस बार ABVP, NSUI और दूसरे छात्र संगठनों के लिए चुनावी रणनीति बनाना आसान नहीं होगा.
CJP ने भी युवाओं के समर्थन का किया दावा
जंतर-मंतर आंदोलन से जुड़े होने का दावा करने वाले Cockroach Janta Party यानी CJP ने भी युवाओं के मुद्दों को लेकर अपनी बात रखी है. CJP के प्रवक्ता दीपक बालियान ने कहा कि CJP कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है, बल्कि छात्रों और युवाओं का आंदोलन है.
बालियान के मुताबिक, युवा खुद तय करेंगे कि उनके भविष्य के लिए कौन सही है और किसे आगे बढ़ाना है. उन्होंने 20 जुलाई की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि उस दिन युवाओं के साथ जो हुआ, उसे भुलाया नहीं गया है. उनका दावा है कि इस बार युवा बदलाव की दिशा में बड़ा फैसला ले सकते हैं.
CJP का यह बयान बताता है कि जंतर-मंतर से जुड़े घटनाक्रम को DUSU चुनाव के राजनीतिक विमर्श में भी लाने की कोशिश की जा रही है.
NSUI ने पुलिस कार्रवाई को बनाया चुनावी मुद्दा
NSUI के DUSU चुनाव प्रभारी अखिलेश यादव ने भी जंतर-मंतर प्रदर्शन को चुनाव से जोड़ते हुए कहा है कि छात्र इस घटना का जवाब अपने वोट से देंगे. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बल प्रयोग किया, लाठीचार्ज हुआ और पेलेट गन का इस्तेमाल किया गया. उन्होंने DU छात्र साहिल लोचव का भी जिक्र किया और दावा किया कि पेलेट गन की चोट से उनकी आंखों की रोशनी चली गई.
NSUI का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाएं छात्रों की याद में हैं और चुनाव में इसका असर दिखाई दे सकता है. हालांकि, पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों को संबंधित पक्षों के जवाब और उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर ही देखा जाना चाहिए.
DU प्रशासन पर भी सवाल
छात्र संगठनों ने विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए हैं. NSUI का आरोप है कि जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने वाले छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देने वाली एडवाइजरी जारी की गई थी. इसके अलावा विश्वविद्यालय में पेयजल, कैंटीन की गुणवत्ता, हॉस्टल की कमी और बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दे भी चुनाव में उठाए जा रहे हैं.
फीस बढ़ोतरी को लेकर भी छात्रों में सवाल हैं. छात्र संगठनों का कहना है कि अगर फीस लगातार बढ़ाई जा रही है तो विश्वविद्यालय की सुविधाओं में उसी अनुपात में सुधार क्यों नहीं दिखाई देता? यही वजह है कि इस बार DUSU चुनाव में कैंपस से जुड़े छोटे-छोटे मुद्दे भी बड़े राजनीतिक सवाल बन सकते हैं.
पेपर लीक और NTA विवाद का भी असर?
DUSU चुनाव की राजनीति सिर्फ दिल्ली यूनिवर्सिटी के मुद्दों तक सीमित नहीं है. देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक से जुड़े विवादों ने भी युवाओं के बीच चिंता बढ़ाई है.
NSUI ने NTA से जुड़े विवादों और परीक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवालों को भी छात्रों के भविष्य से जोड़कर उठाया है. संगठन का कहना है कि लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मेहनत करते हैं और जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं तो इसका सीधा असर उनके करियर पर पड़ता है.
Gen Z के लिए शिक्षा और रोजगार सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हैं. इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों का असर DUSU चुनाव में भी दिखाई दे सकता है.
ABVP के सामने क्या चुनौती?
ABVP दिल्ली यूनिवर्सिटी में लंबे समय से मजबूत छात्र संगठन रहा है. कॉलेज स्तर तक उसका संगठनात्मक नेटवर्क और जमीनी पकड़ उसकी बड़ी ताकत मानी जाती है. लेकिन इस बार उसके सामने चुनौती बदलती युवा सोच की है. अगर छात्र संगठन की पहचान और राजनीतिक प्रभाव से ज्यादा अपने स्थानीय मुद्दों को महत्व देते हैं, तो ABVP को भी अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है.
ABVP के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे युवा मतदाताओं के बदलते मूड की परीक्षा के तौर पर देखा जा सकता है.
NSUI के पास कितना बड़ा मौका?
कांग्रेस समर्थित NSUI के लिए भी इस बार चुनाव महत्वपूर्ण है. संगठन जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े मुद्दों और छात्रों की समस्याओं को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है.
अगर छात्रों के बीच मौजूदा व्यवस्था और प्रशासन को लेकर नाराजगी है, तो NSUI इसे अपने पक्ष में बदलने की कोशिश करेगी. लेकिन सिर्फ विरोध के मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं होगा. छात्रों को यह भी बताना होगा कि जीतने के बाद वह फीस, हॉस्टल, शिक्षा, रोजगार और कैंपस सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर क्या करेगी. यानी NSUI के सामने मौका भी है और चुनौती भी.
AISA और दूसरे वामपंथी संगठनों की भूमिका
AISA समेत दूसरे वामपंथी छात्र संगठन भी DUSU चुनाव में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं. इन संगठनों की राजनीति लंबे समय से शिक्षा, रोजगार और छात्र अधिकारों जैसे मुद्दों के आसपास रही है.
जंतर-मंतर आंदोलन से जुड़े मुद्दों के कारण इन्हें Gen Z के उस वर्ग का समर्थन मिलने की उम्मीद हो सकती है, जो पारंपरिक राजनीति के बजाय मुद्दा आधारित राजनीति की बात कर रहा है. लेकिन इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मुद्दों को व्यापक छात्र समुदाय तक पहुंचाने की होगी. सिर्फ एक छोटे समूह में समर्थन होना और पूरे विश्वविद्यालय में वोट हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं.
चुनाव प्रचार का भी बदल रहा है तरीका
Gen Z की राजनीति का असर चुनाव प्रचार के तरीके पर भी दिखाई दे रहा है. लंबे भाषणों के बजाय अब छोटे वीडियो, Instagram Live और सोशल मीडिया पोस्ट ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं.
उम्मीदवारों को छात्रों के सवालों का सीधा जवाब देना पड़ रहा है. सोशल मीडिया पर छात्र किसी बयान पर तुरंत सवाल उठा सकते हैं और उम्मीदवारों से जवाब मांग सकते हैं. इससे छात्र नेताओं के सामने नई चुनौती पैदा हुई है. अब सिर्फ भीड़ जुटाना या बड़े-बड़े नारे देना पर्याप्त नहीं हो सकता. छात्रों को यह समझाना होगा कि उनके पास कैंपस की समस्याओं को लेकर ठोस योजना क्या है.
एक नजर में समझिए
- 18 सितंबर: दिल्ली यूनिवर्सिटी में DUSU चुनाव होंगे.
- 19 सितंबर: चुनाव के नतीजे घोषित किए जाएंगे.
- मुख्य मुकाबला: लंबे समय से ABVP और NSUI के बीच मुकाबला रहा है.
- नए मुद्दे: शिक्षा, रोजगार, फीस, हॉस्टल, मानसिक स्वास्थ्य और प्रशासनिक जवाबदेही इस बार चर्चा में हैं.
- बड़ी चुनौती: यह देखना होगा कि Gen Z पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों से हटकर मुद्दों के आधार पर मतदान करती है या नहीं.
क्या प्रशासन की सख्ती बदल पाएगी चुनाव?
दिल्ली यूनिवर्सिटी प्रशासन ने चुनाव में पैसे के इस्तेमाल और शक्ति प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम लागू किए हैं. इसका उद्देश्य चुनाव को ज्यादा पारदर्शी और व्यवस्थित बनाना है. लेकिन छात्रों के बीच सवाल यह है कि क्या सिर्फ नियम लागू करने से कैंपस की राजनीति बदल सकती है?
असल बदलाव तब दिखाई देगा, जब छात्र भी पैसे, प्रभाव और शक्ति प्रदर्शन की राजनीति को नकारकर मुद्दों के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनेंगे. अगर Gen Z वास्तव में अपने मुद्दों को प्राथमिकता देती है, तो DUSU चुनाव का परिणाम छात्र राजनीति के लिए एक बड़ा संकेत हो सकता है.
18 सितंबर को वोट, 19 सितंबर को फैसला
18 सितंबर को छात्र अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे और 19 सितंबर को तस्वीर साफ हो जाएगी. इसके बाद पता चलेगा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों ने इस बार किस तरह की राजनीति को प्राथमिकता दी.
क्या ABVP अपनी संगठनात्मक ताकत के दम पर फिर बढ़त बनाएगी? क्या NSUI जंतर-मंतर और युवाओं से जुड़े मुद्दों को वोट में बदल पाएगी? क्या AISA और दूसरे छात्र संगठनों को Gen Z के एक हिस्से का समर्थन मिलेगा? या फिर छात्र किसी नए विकल्प की ओर बढ़ेंगे? इन सवालों का जवाब चुनाव परिणाम में मिलेगा.
क्या Gen Z लिखेगी छात्र राजनीति की नई कहानी?
DUSU चुनाव इस बार सिर्फ दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ का चुनाव नहीं है. यह बदलती युवा राजनीति और Gen Z की राजनीतिक सोच की भी परीक्षा है.
अगर छात्र शिक्षा, रोजगार, फीस, हॉस्टल, मानसिक स्वास्थ्य, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को वोट का आधार बनाते हैं, तो यह छात्र राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत होगा. लेकिन अगर चुनाव पुराने राजनीतिक समीकरणों, संगठन की ताकत और प्रभाव के आधार पर ही तय होता है, तो इसका मतलब होगा कि Gen Z की मुखरता अभी पूरी तरह मतदान के फैसले में नहीं बदली है.
इसलिए 18 सितंबर की वोटिंग और 19 सितंबर का नतीजा सिर्फ यह तय नहीं करेगा कि DUSU की कमान किस संगठन के हाथ में जाती है. यह इस बात का भी संकेत देगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय का युवा मतदाता आने वाले समय में छात्र राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहता है.
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