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Vanakkam Poorvottar: हिमालय पर बढ़ते खतरे और पहाड़ों के फूटते गुस्से के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने की बैठक, India ने शुरू कर दी बड़ी तैयारी

नई दिल्ली में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की अध्यक्षता में हुई हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की उच्चस्तरीय बैठक ऐसे समय में हुई है, जब नेपाल में हाल में आई भीषण हिमालयी आपदा ने पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर चेतावनी पैदा कर दी है। हम आपको बता दें कि नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में अगस्त के अंत में ग्लेशियर और चट्टानी हिस्से के विशाल ढहाव के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने हजारों लोगों को प्रभावित किया है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार मृतकों की संख्या एक हजार से अधिक हो चुकी है और हजारों लोग अब भी लापता हैं।

इस पृष्ठभूमि में भारत द्वारा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और हिमस्खलन के खतरों पर की गई यह समीक्षा बदलते हिमालयी पर्यावरण के सामने एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय रणनीतिक पहल है। हम आपको बता दें कि बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिवों तथा राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के प्रतिनिधियों के साथ गृह मंत्रालय, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, केंद्रीय जल आयोग, भारत मौसम विज्ञान विभाग और रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। केंद्रीय गृह सचिव ने विशेष रूप से संवेदनशील ग्लेशियल झीलों, हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों और संभावित जल-प्रवाह मार्गों की निरंतर एवं सक्रिय निगरानी पर जोर दिया।

इसे भी पढ़ें: भावी संकट की पूर्व चेतावनी है नेपाल त्रासदी

देखा जाये तो नेपाल की ताजा त्रासदी ने इस आवश्यकता को और स्पष्ट कर दिया है। वैज्ञानिक अध्ययनों और उपग्रह विश्लेषणों के अनुसार यह घटना सामान्य नदी-बाढ़ नहीं थी। नेपाल के लांगटांग क्षेत्र के निकट ग्लेशियर और चट्टान का एक बड़ा हिस्सा ढहा, जिसके बाद बर्फ, पानी, चट्टानों और मलबे का विशाल प्रवाह संकरी हिमालयी घाटियों से नीचे आया और विनाशकारी फ्लैश फ्लड में बदल गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने से ऊंचाई वाले पर्वतीय ढलान अधिक अस्थिर हो रहे हैं। हालांकि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक जांच आवश्यक होती है, लेकिन गर्म होते हिमालय में ऐसी घटनाओं की संभावना बढ़ने पर व्यापक वैज्ञानिक सहमति है।

नेपाल पहले भी ऐसे खतरों का सामना कर चुका है। वर्ष 2024 में थामे घाटी में ग्लेशियल झीलों के टूटने से भारी तबाही हुई थी। ICIMOD की जांच में पाया गया कि एक विशाल रॉक एवलांच ने ग्लेशियल झील में गिरकर घटनाओं की श्रृंखला शुरू की, जिसके बाद झीलों से भारी मात्रा में पानी निकला और मलबा लगभग 80 किलोमीटर नीचे तक पहुंचा। यही कारण है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की बैठक में केवल राहत और बचाव नहीं, बल्कि Risk-informed Planning, निवारक शमन और सामुदायिक तैयारी पर जोर दिया गया। राज्यों को संवेदनशील झीलों की निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली मजबूत करने, चेतावनी को अंतिम व्यक्ति तक समय पर पहुंचाने, जल-प्रवाह मार्गों की पहचान करने और निकासी योजनाओं को व्यावहारिक बनाने की सलाह दी गई।

वैसे यह चिंता केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक शोध बताता है कि तथाकथित ‘थर्ड पोल’ यानि तिब्बती पठार और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में GLOF गतिविधियां बढ़ी हैं। एक अध्ययन के अनुसार दक्षिण-पूर्वी तिब्बत और चीन-नेपाल सीमा क्षेत्र में पिछले दशक में जोखिम विशेष रूप से बढ़ा है और संभावित GLOF से हजारों इमारतों, सड़कों, पुलों तथा 100 से अधिक जलविद्युत परियोजनाओं को खतरा हो सकता है।

चीन के तिब्बती क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा विशाल बुनियादी ढांचा और जलविद्युत विकास भी इस बहस को महत्वपूर्ण बनाता है। चीन ने निचले यारलुंग जांगबो पर दुनिया की सबसे बड़ी प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना का निर्माण शुरू किया है। यह नदी आगे भारत में ब्रह्मपुत्र के रूप में प्रवेश करती है। परियोजना के पर्यावरणीय, पारिस्थितिक और सीमा-पार प्रभावों को लेकर भारत सहित डाउनस्ट्रीम देशों में चिंताएं व्यक्त की गई हैं। इसे सीधे नेपाल की आपदा का कारण कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा, लेकिन तेजी से गर्म होते, भूकंपीय रूप से सक्रिय और भूगर्भीय रूप से नाजुक हिमालय में बड़े पैमाने पर निर्माण और जलविद्युत विस्तार के लिए अत्यंत कठोर पर्यावरणीय तथा आपदा-जोखिम आकलन आवश्यक हैं।

भारत के लिए यह खतरा काल्पनिक नहीं है। 2023 की सिक्किम आपदा ने दिखाया कि हिमालयी झीलों में अस्थिरता कितनी तेजी से विनाशकारी रूप ले सकती है। ICIMOD के वैज्ञानिक अध्ययन में जलवायु परिवर्तन, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और मोरेन की अस्थिरता को उस आपदा के महत्वपूर्ण कारकों में शामिल किया गया था।

इसी संदर्भ में केंद्र सरकार ने 2024 में अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तराखंड के लिए 150 करोड़ रुपये की राष्ट्रीय GLOF जोखिम शमन परियोजना को मंजूरी दी थी। केंद्र का हिस्सा 135 करोड़ रुपये है। गृह सचिव ने अब राज्यों को इस परियोजना के क्रियान्वयन में तेजी लाने का स्पष्ट निर्देश दिया है।

बैठक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि हिमालयी आपदाओं से मुकाबला केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाकर नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक निगरानी, उपग्रह और जमीनी आंकड़ों का समन्वय, समयबद्ध चेतावनी, जिला प्रशासन की तत्परता, सुरक्षित निकासी मार्ग और प्रशिक्षित स्थानीय समुदाय, ये सभी एक ही सुरक्षा श्रृंखला के हिस्से हैं।

बहरहाल, नेपाल की त्रासदी ने दिखा दिया है कि हिमालय में आपदा की शुरुआत ऊंचे, दूरस्थ और कभी-कभी सीमा-पार क्षेत्रों से होती है, लेकिन उसका असर सैकड़ों किलोमीटर दूर बसे लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए भारत की यह बैठक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रतिक्रिया-केंद्रित व्यवस्था से आगे बढ़कर पूर्वानुमान, रोकथाम, जोखिम आधारित विकास और अंतर-एजेंसी समन्वय की दिशा में संकेत देती है। हिमालय अब केवल प्राकृतिक सौंदर्य और जलस्रोत का प्रश्न नहीं है, वह भारत और पूरे दक्षिण एशिया की जल, ऊर्जा, पर्यावरण और मानव सुरक्षा का केंद्रीय प्रश्न बन चुका है।

-नीरज कुमार दुबे

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UP Election 2027: वाराणसी की की 8 सीटों पर बिछी चुनावी बिसात...

UP Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में सभी पार्टियों ने इसकी तैयारियां भी शुरू कर दी हैं. राज्य की सभी सीटों पर चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. इस चुनाव में यूपी का बनारस यानी वाराणसी जिला बेहद खास है. क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी सीट से ही सांसद हैं. वह 2014 से लगातार तीन बार से इस सीट पर चुनाव जीतते रहे हैं. यह काशी की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान और भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुकी है. PM नरेंद्र मोदी वाराणसी लोकसभा सीट से 2014 से लगातार सांसद हैं. उन्होंने पहली बार 2014 में यहां से चुनाव लड़कर जीत हासिल की और इसके बाद 2019 और 2024 में भी वाराणसी से जीत दर्ज की.

काशी का आध्यात्मिक महत्व- हिंदू मान्यताओं में काशी को भगवान शिव की नगरी कहा गया है. मान्यता है कि काशी की धरती पर मृत्यु पाने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है. गंगा के पवित्र जल को पापों का नाश करने वाला माना जाता है. प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने बनारस की प्राचीनता से प्रभावित होकर कहा था- 'बनारस इतिहास, परंपरा और किंवदंतियों से भी पुराना है.'

वाराणसी की कुल जनसंख्या और जाति प्रतिशत

भौगोलिक तौर पर वाराणसी की स्थिति इसे खास बनाती है. वाराणसी की सीमाएं पांच जिलों से जुड़ती हैं- उत्तर में जौनपुर, उत्तर-पूर्व में गाजीपुर, पूर्व में चंदौली, दक्षिण में मिर्जापुर और पश्चिम में भदोही. इसके अलावा जिले में 8 ब्लॉक, 1327 गांव और 25 पुलिस स्टेशन हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक जिले की आबादी करीब 36.76 लाख थी. इसमें करीब 52.3 प्रतिशत पुरुष और 47.7 प्रतिशत महिलाएं थीं.

जिले की साक्षरता दर करीब 75.60 प्रतिशत है. करीब 56.6 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है और अनुसूचित जाती करीब 13.2 प्रतिशत है. वाराणसी की आबादी में करीब 84.5 फीसदी हिंदू हैं, जबकि 14.9 फीसदी मुस्लिम आबादी है. इसके अलावा ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन समुदायों की आबादी अपेक्षाकृत कम है. यानी वाराणसी का धार्मिक समीकरण मुख्य रूप से हिंदू और मुस्लिम आबादी के इर्द-गिर्द ही केंद्रित है.

वाराणसी में विधानसभा की कुल 8 सीटें

वाराणसी जिले की 8 विधानसभा सीटों में से 6 विधानसभा क्षेत्र वाराणसी लोकसभा (77) सीट में आते हैं, जबकि 2 विधानसभा क्षेत्र चंदौली लोकसभा (76) सीट में जाते हैं. उनमें वाराणसी लोकसभा में रोहनिया, वाराणसी उत्तर, वाराणसी दक्षिण, वाराणसी कैंट, सेवापुरी, पिंडरा शामिल हैं. जबकि चंदौली लोकसभा में अजगरा (SC), शिवपुर सीट आती हैं. वाराणसी की अंतिम SIR 2026 मतदाता सूची 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित हुई. इस सूची के मुताबिक, जिले की 8 विधानसभा सीटों में कुल 27,30,603 मतदाता हैं.

वाराणसी की विधानसभा और जनसंख्या

384    पिंडरा    3.33 लाख
385    अजगरा (SC) 3.44 लाख
386    शिवपुर    3.58 लाख
387    रोहनिया    3.67 लाख
388    वाराणसी उत्तर     3.65 लाख
389    वाराणसी दक्षिण 2.68 लाख
390    वाराणसी कैंट 3.78 लाख
391    सेवापुरी    3.18 लाख

वाराणसी की सभी सीटों पर पिछले तीन विधानसभा चुनाव का गणित

बता दें कि वाराणसी की विधानसभा राजनीति पिछले तीन चुनावों में लगातार बदलती रही है. वाराणसी की 8 विधानसभा सीटों के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो पिछले तीन चुनावों में जिले की राजनीति में BJP का लगातार मजबूत होता दबदबा साफ दिखाई देता है.

2012 में मुकाबला काफी बिखरा हुआ था. BJP ने 3 सीटें जीतीं, जबकि BSP को 2 और SP, अपना दल तथा कांग्रेस को 1-1 सीट मिली थी. यानी उस समय वाराणसी में कोई एक पार्टी पूरी तरह हावी नहीं थी.

2017 में सियासी तस्वीर पूरी तरह बदल गई. BJP ने सीधे 6 सीटों पर कब्जा जमाया. अपना दल ने 1 सीट जीती, जबकि सपा-बसपा  SBSP ने भी 1 सीट हासिल की. खास बात यह रही कि BSP, SP और कांग्रेस का वाराणसी में खाता तक नहीं खुला. यह चुनाव वाराणसी में BJP के बड़े राजनीतिक विस्तार का संकेत बना.

2022 में BJP ने अपना प्रदर्शन और बेहतर किया. पार्टी ने जिले की 8 में से 7 विधानसभा सीटें जीत लीं. अपना दल ने 1 सीट बरकरार रखी, जबकि SP, BSP, कांग्रेस और SBSP एक भी सीट नहीं जीत सके.

सभी सीटों के 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े

पिंडरा 

पिंडरा विधानसभा सीट का नंबर है 384 और यह एक सामान्य सीट है. यहां अनुसूचित जाति की आबादी करीब 18.7 प्रतिशत है. मुस्लिम आबादी 7 प्रतिशत से ज्यादा है और पिंडरा की सबसे बड़ी खासियत है इसका ग्रामीण स्वरूप. इस सीट पर करीब 98.2 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है. 2022 के विधानसभा चुनाव में पिंडरा से बीजेपी के अवधेश कुमार सिंह ने जीत दर्ज की. उन्हें कुल 84,325 वोट मिले थे, यानी करीब 38.23 प्रतिशत. दूसरे नंबर पर रहे बीएसपी के बाबूलाल, जिन्हें 48,766 वोट प्राप्त हुए यानी उन्हें कुल 22.11 प्रतिशत वोट मिले. जबकि कांग्रेस के अजय को 48,248 वोट मिले जो 21.88 प्रतिशत थे. यानी 2022 में बीजेपी उम्मीदवार ने करीब 16 प्रतिशत से ज्यादा के वोट अंतर के साथ जीत हासिल की.

अजगरा (SC)

वाराणसी की अजगरा एक SC आरक्षित सीट है और यहां का सामाजिक समीकरण चुनावी नतीजों में बेहद अहम भूमिका निभाता है. सीट की आबादी में SC समुदाय की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत से ज्यादा है. जबकि मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से ऊपर है. अजगरा की 95 प्रतिशत से ज्यादा आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है. इसलिए यहां चुनावी मुद्दों में खेती, रोजगार, सड़क, बिजली, आवास और सरकारी योजनाओं का असर खासा महत्वपूर्ण हो सकता है.

2022 के चुनाव में अजगरा विधानसभा सीट पर बीजेपी के त्रिभुवन राम ने जीत दर्ज की. उन्हें मिले 1 लाख 1 हजार 88 वोट, यानी 41.25 प्रतिशत वोट मिले. वहीं सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के सुनील सोनकर को 91 हजार 928 वोट प्राप्त हुए, यानी 37.51 प्रतिशत वोट मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे. जबकि बहुजन समाज पार्टी के रघुनाथ चौधरी को 42 हजार 301 वोट मिले यानी 17.26 प्रतिशत वोट मिले. यानी अजगरा में मुकाबला बेहद करीबी रहा. बीजेपी ने SBSP के मुकाबले करीब 3.74 प्रतिशत वोट की बढ़त के साथ सीट अपने नाम की.

शिवपुर

शिवपुर विधानसभा क्षेत्र (386) वाराणसी जिले की 8 विधानसभा सीटों में से एक है. यह सीट 2008 के परिसीमन के बाद नए स्वरूप में अस्तित्व में आई और यहां पहली बार 2012 में विधानसभा चुनाव हुआ. वर्तमान में शिवपुर विधानसभा क्षेत्र संख्या 386 है और चंदौली लोकसभा क्षेत्र संख्या 76 का हिस्सा है. शिवपुर एक सामान्य सीट है और यहां का सामाजिक समीकरण चुनावी नतीजों में बेहद अहम भूमिका निभाता है.

सीट की आबादी में SC समुदाय की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत से ऊपर है. जबकि मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 13 प्रतिशत से ज्यादा होने का अनुमान है. शिवपुर मुख तौर पर ग्रामीण  विधान सभा क्षेत्र है इसलिए आसपास के क्षेत्र में खेती, ग्रामीण बाजार और कृषि आधारित गतिविधियां लंबे समय से स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार रही हैं. यहां चुनावी मुद्दों में रोजगार, सड़क, बिजली, आवास और सरकारी योजनाओं का असर खासा महत्वपूर्ण हो सकता है.

2022 के विधानसभा चुनाव में शिवपुर में कैसा रहा मुकाबला

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के अनिल राजभर ने 1 लाख 15 हजार 231 वोट, यानी 45.76 फीसदी वोट हासिल कर जीत दर्ज की. वहीं SBSP के अरविंद राजभर को 87 हजार 544 वोट, यानी 34.77 फीसदी वोट मिले. तीसरे स्थान पर रहे BSP के रवि मौर्य, जिन्हें 40 हजार 601 वोट, यानी 16.12 फीसदी वोट प्राप्त हुए. यानी अनिल राजभर ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी अरविंद राजभर को 27,687 वोटों के अंतर से हराया.

शिवपुर की राजनीति का सबसे बड़ा संकेत यही है कि राजभर वोट यहां बेहद महत्वपूर्ण है. 2022 में अनिल राजभर और अरविंद राजभर के बीच सीधी टक्कर ने इस सामाजिक समीकरण को चुनाव के केंद्र में ला दिया था. इसके अलावा बड़ी ग्रामीण आबादी, SC और मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव मुकाबले को बहुकोणीय बनाने की क्षमता रखता है. 2017 में भाजपा के अनिल राजभर की जीत के बाद 2022 में भी भाजपा ने शिवपुर पर अपना कब्जा बरकरार रखा. अब सवाल यह है कि 2027 में भाजपा अपनी इस मजबूत पकड़ को कायम रख पाएगी या विपक्ष सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से साधकर शिवपुर की तस्वीर बदल पाएगा?

रोहनिया

रोहनिया का इलाका वाराणसी को प्रयागराज और मिर्जापुर की दिशा से जोड़ने वाले पुराने मार्गों के बीच स्थित रहा है. वाराणसी की रोहनिया विधानसभा सीट, नंबर 387, सामान्य वर्ग की सीट है. यह मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र वाली विधानसभा है, जहां 70 फीसदी से ज्यादा आबादी ग्रामीण है. वहीं SC आबादी 13 फीसदी से ज्यादा और मुस्लिम आबादी 8 फीसदी से ज्यादा है. यानी रोहनिया का चुनावी गणित मुख्य रूप से ग्रामीण वोटरों के साथ पिछड़े, दलित और मुस्लिम मतदाताओं के समीकरण पर टिका है.

2022 के विधानसभा चुनाव में कैसा रहा इस सीट पर मुकाबल

2022 के चुनाव में अपना दल (सोनेलाल) के डॉ. सुनील पटेल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 1,18,663 वोट, यानी 48.08 फीसदी वोट हासिल किए. उनके मुकाबले अपना दल (कमेरावादी) के अभय पटेल को 72,191 वोट, यानी 29.25 फीसदी वोट मिले. वहीं बसपा के अरुण सिंह पटेल को 26,356 वोट, यानी 10.68 फीसदी वोट मिले. इस तरह डॉ. सुनील पटेल ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी अभय पटेल को 46,472 वोटों के बड़े अंतर से हराया.

2022 के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि रोहनिया में मुकाबला केवल पार्टी बनाम पार्टी नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों और गठबंधन की राजनीति का भी मुकाबला है. 2027 में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या अपना दल (सोनेलाल) अपना मजबूत आधार बरकरार रख पाएगा, या विपक्ष पटेल वोट और ग्रामीण मतदाताओं के बीच सेंध लगाकर इस सीट का समीकरण बदल पाएगा?

सेवापुरी

2012 में अस्तित्व में आई इस विधानसभा सीट को पहले गंगापुर के नाम से जाना जाता था. वाराणसी की सेवापुरी विधानसभा सीट, नंबर 391, सामान्य वर्ग की सीट है और इसका सबसे बड़ा राजनीतिक चरित्र है पूरी तरह ग्रामीण वोटरों का प्रभाव. यहां 90 फीसदी से ज्यादा आबादी ग्रामीण है, जबकि शहरी आबादी 10 फीसदी से भी कम है. इसके साथ SC आबादी 15 फीसदी से ज्यादा और मुस्लिम आबादी 5 फीसदी से अधिक है. इसलिए सेवापुरी का चुनावी गणित मुख्य रूप से ग्रामीण पिछड़े वर्ग, दलित और अन्य सामाजिक समूहों के बीच बनने वाले गठजोड़ पर निर्भर करता है.

2022 के विधानसभा चुनाव में कैसा रहा रोहनिया में मुकाबला

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के नील रतन सिंह ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए 1,05,163 वोट, यानी 47.60 फीसदी वोट हासिल कर चुनाव जीते. जबकि उनके सामने समाजवादी पार्टी के सुरेंद्र सिंह पटेल ने 82,632 वोट, यानी 37.41 फीसदी वोट ही हासिल कर पाए. वहीं बसपा के अरविंद कुमार त्रिपाठी को 24,065 वोट, यानी 10.89 फीसदी वोट मिले. भाजपा और सपा के बीच अंतर 22,531 वोट रहा. यानी करीब 10.19 प्रतिशत वोट का अंतर जो बताता है कि मुकाबला एकतरफा नहीं था, लेकिन भाजपा उम्मीदवार ने स्पष्ट बढ़त बनाई.

वाराणसी- नॉर्थ, साउथ और कैंट

जैसे-जैसे वाराणसी शहर का विस्तार हुआ और मतदाताओं की संख्या बढ़ी, पूरे शहरी क्षेत्र को एक ही विधानसभा क्षेत्र में रखना व्यावहारिक नहीं रहा. इसलिए चुनावी प्रतिनिधित्व को बेहतर बनाने के लिए शहर को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में बांटा गया. 
1. वाराणसी दक्षिण- यह वाराणसी का सबसे पुराना और ऐतिहासिक शहरी राजनीतिक क्षेत्र है. इसमें काशी का पुराना शहर, प्रमुख बाजार और कई ऐतिहासिक धार्मिक क्षेत्र आते हैं.
2. वाराणसी उत्तर- शहर के उत्तरी और तेजी से विकसित होते हिस्सों को प्रतिनिधित्व देने के लिए वाराणसी उत्तर विधानसभा क्षेत्र बनाया गया. इसमें पुराने शहर के साथ-साथ शहर के विस्तार वाले इलाके भी शामिल होते गए.
3. वाराणसी कैंट- कैंटोनमेंट और उसके आसपास के विकसित शहरी क्षेत्र को अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए कैंट विधानसभा क्षेत्र महत्वपूर्ण बना. इसका स्वरूप अन्य दो शहरी सीटों से कुछ अलग है क्योंकि यहां सैन्य क्षेत्र, पुराने छावनी क्षेत्र और उनसे जुड़े नागरिक इलाके हैं.

अब समझते हैं वाराणसी विधानसभा क्षेत्र के अहम आंकड़े

वाराणसी उत्तर, वाराणसी दक्षिण और वाराणसी कैंट— तीनों विधानसभा सीटें वाराणसी की शहरी राजनीति की तस्वीर पेश करती हैं. तीनों ही सामान्य सीटें हैं और इनकी सबसे बड़ी समानता यह है कि 95 फीसदी से ज्यादा आबादी शहरी है. लेकिन सामाजिक समीकरणों और चुनावी व्यवहार में तीनों सीटों के बीच काफी अंतर दिखाई देता है.
वाराणसी उत्तर- इस सीट पर मुस्लिम आबादी 15 फीसदी से ज्यादा और SC आबादी 8 फीसदी से ज्यादा है. इस सीट पर 2022 में भाजपा के रविंद्र जायसवाल 1,34,471 वोट यानी 54.61 फीसदी मत हासिल कर जीत दर्ज की. जबकि समाजवादी पार्टी के अशफाक को 93,695 वोट यानी 38.05 फीसदी मिले. दोनों के बीच अंतर 40,776 वोट का रहा. 

वाराणसी दक्षिण- इस सीट पर सामाजिक समीकरण और भी दिलचस्प है. यहां मुस्लिम आबादी 16 फीसदी से ज्यादा है. 2022 में भाजपा के डॉ. नीलकंठ तिवारी को 99,622 वोट यानी 50.88 फीसदी वोट मिले, जबकि सपा के अशफाक को 88,900 वोट यानी 45.41 फीसदी वोट हासिल हुए. यहां भाजपा और सपा के बीच अंतर सिर्फ 10,722 वोट रहा. इसलिए तीनों सीटों में वाराणसी दक्षिण सबसे करीबी मुकाबले वाली सीट रही. यह सीट पुरानी काशी, धार्मिक-व्यावसायिक क्षेत्र और घनी आबादी वाले इलाकों के कारण राजनीतिक रूप से विशेष महत्व रखती है.

वाराणसी कैंट- ये सीट वाराणसी की तीनों सीटों में भाजपा के लिए सबसे मजबूत सीट के रूप में सामने आई. यहां मुस्लिम आबादी 5 फीसदी से ज्यादा है, जबकि शहरी आबादी 95 फीसदी से अधिक है. 2022 में भाजपा के सौरभ श्रीवास्तव ने 1,47,833 वोट, यानी 60.63 फीसदी वोट हासिल किए. जबकि सपा के अशफाक को 60,989 वोट यानी 25.01 फीसदी वोट मिले. इस सीट पर भाजपा की जीत का अंतर 86,844 रहा. जो इन तीनों सीटों में सबसे बड़ा अंतर है.
अगर तीनों सीटों को एक साथ देखें तो तस्वीर काफी स्पष्ट है. भाजपा ने 2022 में तीनों शहरी सीटों पर जीत दर्ज की, लेकिन उसकी पकड़ समान नहीं रही. कैंट भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ दिखाई देता है, उत्तर में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिली, जबकि दक्षिण में मुकाबला सबसे ज्यादा कड़ा रहा.

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64 गेंद 124 रन, स्मृति मंधाना के शतक से भारत की एकतरफा जीत, सेमीफाइन में बनाई जगह

India become the first team to qualify for the semi final womens asia cup: भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने हांगकांग को 137 रनों से करारी शिकस्त देकर टी20 इंटरनेशनल में अपनी दूसरी सबसे बड़ी जीत दर्ज की. भारत ने इस जीत से महिला एशिया कप के सेमीफाइनल में भी अपनी जगह पक्की कर ली. स्मृति मंधाना की 64 गेंदों में 124 रनों की आक्रामक पारी के दम पर भारत ने 193/5 का विशाल स्कोर बनाया. जवाब में हांगकांग की टीम लक्ष्य से काफी दूर रह गई. दीप्ति शर्मा के 3, जबकि नंदनी शर्मा, श्री चरणी और प्रेमा रावत के 2-2 विकेटों की बदौलत भारत ने एकतरफा जीत हासिल की. Thu, 3 Sep 2026 23:22:46 +0530

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