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भावी संकट की पूर्व चेतावनी है नेपाल त्रासदी

एक बात साफ हो जानी चाहिए कि दुनिया के देशों के लिए नेपाल त्रासदी को हल्के में लेना बड़ी भूल होगी। 2020 की कनाड़ा की रॉक स्लाइड और 2023 की सिक्किम में साउथ ल्होनक झील की ग्लेशियल फटने की घटना हमारे सामने हैं। यह कोई पहली या अंतिम घटनाएं नहीं हैं अपितु देखा जाएं तो यह समय रहते प्रयास नहीं किये गये तो ऐसी घटनाओं की आवृति जल्दी जल्दी और अतिविनाशकारी होगी, इससे नकारा नहीं जा सकता। जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले सालों में जिस तरह से प्रकृति का विकराल रुप देखने को मिल रहा है वह चाहे तूफानों के रुप में हो, चाहे जंगलों में लगती आग के कारण हो, ग्लेशियरों के पिघलने की हो, ग्लेशियलों के फटने की हो, भूकंपों की हो, बैमौसम आंधी बरसात की हो, अतिवृष्टि या अनावृष्टि की हो, मौसम चक्र में भले ही आंशिक परिवर्तन की हो या समुद्र्री तूफानों की बढती फ्रिक्वेंसी की हो बेहद गंभीर हो जाती है। वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों की लगातार चेतावनी को नजरअंदाज करने का ही परिणाम है कि नेपाल जैसी त्रासदियां आम होती जा रही है। यह केवल नेपाल या इससे जुड़े क्षेत्र के लिए ही गंभीर हालात नहीं हैं अपितु अमेरिका, चीन, भारत सहित दुनिया के दस देश नेपाल जैसी त्रासदी के मुहाने पर खड़े हैं। ग्लेशियल के फटने या यों कहें किग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी कि ग्लोफ जैसे हालात कभी भी इनके दायरें में आने वाले देशों में हो सकते हैं। यह भी सही है कि अभी तक भारत-नेपाल ही नहीं दुनिया के इस दायरें में आने वाला कोई भी देश इन आपदाओं से निपटने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो सके हैं। जानकारों की मानें तो भारत, चीन, पाकिस्तान, पेरु के एक करोड़ 50 लाख लोग इनके दायरें में सीधे सीधे आ रहे हैं। यह वह लोग है जो इन ग्लेशियलों के एक किलोमीटर से 10 किलोमीटर के दायरें में रह रहे हैं। आज ग्लोफ खतरें के दायरें में भारत, पाकिस्तान, कनाड़ा, पेरु, अमेरिका, चिली, इटली, नेपाल और कोलंबिया आए हुए हैं।

उत्तराखंड त्रासदी हमारे सामने हैं और उस त्रासदी के परिणाम सामने होने के बावजूद लगभग साल दर साल भूस्खलन के मामले हर सीजन में सामने आ रहे हैं। यह साफ हो जाना चाहिए कि प्रकृति से एक सीमा से अधिक खिलवाड़ किया जाता है तो विकृति का सामना हमें करना ही पड़ेगा। जीवनदायी यही प्रकृति अपने विकराल रुप में पलटवार करती है। ऐसे में समय के साथ सबक लेना जरुरी हो जाता है। आज सारी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण की बात तो की जाती है पर उस पर अमल पूरी तरह से हो नहीं पा रहा है। विशेषज्ञों की माने तो हालात यही रहे तो सदी के अंत तक समुद्र का जलस्तर दो मीटर तक बढ़ सकता है। तो दूसरी और अभी से समुद्र तटीय कई शहर डूबने की जद में आने की चेतावनियां दी जा रही है। 

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नेपाल की हालिया त्रासदी का कारण ग्लेशियल का फटना माना जा रहा है। दरअसल ग्लेशियर और ग्लेशियल में हमें भेद करके चलना होगा। ग्लेशियर भौगोलिक संरचना होती है। यह पहाड़ों और ध्रुवों पर लंबे समय से जमा बर्फ खण्ड होते हैं। यह अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण जमे रहते हैं पर जलवायु परिवर्तन और तापमान के बढने के कारण आज बड़ी मात्रा में ग्लेशियर के पिघलने की गति तेज होती जा रही है। दरअसल ग्लेशियरों के बड़े खण्डों के पिघल कर गिरने से ग्लेशियल झील बनती हैं। ग्लेशियल झील बन जाती है इसे हिमनदी झील भी कह सकते हैं। नेपाल की हालिया त्रासदी ग्लेशियल झील के फटने के कारण ही हुई है। वैज्ञानिकों की माने तो ग्लेशियलों के निर्माण की गति में काफी तेजी आई है। यदि हम हिमालय क्षेत्र की ही बात करें तो सतलुज बेसिन में 2019 में 560 ग्लेशियल झीलें थी जो चार साल यानी की 2023 तक 1048 हो गई हैं। नेपाल त्रासदी ग्लेशियल लेक आदटबर्स्ट फ्लड यानी की ग्लोफ का परिणाम है। साधारण शब्दों में कहा जाएं तो यह ग्लेशियल झील के फटने का परिणाम है। ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिक इन हालातों पर नजर नहीं रख रहे हो बल्कि देखा जाएं तो लीड्स विश्वविद्यालय के ग्लेशियल फ्लडिंग के विशेषज्ञ डॉ. जानाथन कारीविक पहले ही चेता चुके हैं। हमारे देश के ही राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एनडीएमए के विशेषज्ञों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी को रिपोर्ट प्रस्तुत कर हालात से रुबरु कराने के साथ ही ठोस सुझाव भी दिए हैं। दरअसल एक सीमा से अधिक प्रकृति से छेड़छाड़ का ही परिणाम इस तरह की त्रासदियां होती हैं। आज लाख चेतानें के बावजूद सतलुज बेसिन में बांधों के साथ साथ विद्युत परियोजनाओं सहित विकास परियोजनाओं का दखल बढ़ा है। एक सीमा से अधिक मानवीय दखल बढ़ी है। इससे तापमान में स्वाभाविक रुप से बढ़ोतरी होने के साथ ही अपशिष्ट भी फैल रहा है। दरअसल प्रकृति से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रुप से छेडछाड़ बढ़ रही है। एनडीएमए ने साफ साफ कहा है कि सतलुज बेसिन में नए निर्माण कार्यां या नई परियोजनाओं की स्वीकृति से पहले उनके परिणामों का भली प्रकार से अध्ययन और विश्लेषण किया जाएं। परिणामों का आंकलन कर गुणावगुण के आधार पर निर्णय लिए जाए। पर्यावरणीय परिणामों को देखकर ही कोई निर्णय लिया जाएं। यह भी देखा जाएं कि ऐसे स्थानों में मानवीय दखल को एक सीमित दायरें तक ही रखा जाएं। इसके साथ ही जलवायु व पर्यावरण विशेषज्ञों का दायित्व अधिक हो जाता है और आवश्यकता होने पर प्रकृति को बचाने के लिए इस क्षेत्र में कार्य कर रहे गैरसरकारी संगठनों को भी आगे आना होगा। आपदा प्रबंधन को भी ऐसा सिस्टम विकसित करना होगा जिससे इस तरह की घटनाओं की समय रहते चेतावनी मिल सके ताकि कम से कम जन हानि को तो बचाया जा सके। 

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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नेपाल-तिब्बत सीमा के समुदाय संकट की घड़ी में थाम रहे एक दूसरे का हाथ

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64 गेंद 124 रन, स्मृति मंधाना के शतक से भारत की एकतरफा जीत, सेमीफाइन में बनाई जगह

India become the first team to qualify for the semi final womens asia cup: भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने हांगकांग को 137 रनों से करारी शिकस्त देकर टी20 इंटरनेशनल में अपनी दूसरी सबसे बड़ी जीत दर्ज की. भारत ने इस जीत से महिला एशिया कप के सेमीफाइनल में भी अपनी जगह पक्की कर ली. स्मृति मंधाना की 64 गेंदों में 124 रनों की आक्रामक पारी के दम पर भारत ने 193/5 का विशाल स्कोर बनाया. जवाब में हांगकांग की टीम लक्ष्य से काफी दूर रह गई. दीप्ति शर्मा के 3, जबकि नंदनी शर्मा, श्री चरणी और प्रेमा रावत के 2-2 विकेटों की बदौलत भारत ने एकतरफा जीत हासिल की. Thu, 3 Sep 2026 23:22:46 +0530

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