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बुक रिव्यू- आर्थिक फैसलों में हिस्सेदारी:औरतें कैसे सीखें पैसा कमाना, पैसे से पैसा बनाना, आर्थिक आजादी के सबक सिखाती किताब

किताब- मैं हूं अपनी धनलक्ष्मी (‘आई एम माय ओन लक्ष्मी’ का हिंदी अनुवाद) लेखिका- आरती गुप्ता अनुवाद- यामिनी रामपल्लीवार प्रकाशक- पेंगुइन मूल्य- 350 रुपए बेटियों को पढ़ाया जाता है, नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन निवेश, बीमा और बड़े वित्तीय फैसलों की बारी आते ही जिम्मेदारी पिता, पति या भाई संभाल लेते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ज्यादातर महिलाएं खुद को आर्थिक फैसले लेने में सक्षम मानती हैं, फिर भी वे उन फैसलों का हिस्सा नहीं बन पातीं। आरती गुप्ता की किताब ‘मैं हूं अपनी धनलक्ष्मी’ इसी विरोधाभास को समझने और तोड़ने की कोशिश करती है। आरती गुप्ता खुद इंवेस्टमेंट मैनेजमेंट की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं। लेकिन किताब में वे एक ऐसी महिला की तरह सामने आती हैं, जिसने सीखते-सीखते अपना रास्ता बनाया, गलतियां कीं, सवाल पूछे और धीरे-धीरे समझा कि आर्थिक सशक्तिकरण का असली अर्थ क्या है। किताब में क्या है? यह किताब महिलाओं और पैसे के बीच मौजूद उस दूरी की कहानी है, जो अक्सर घर की चारदीवारी के भीतर बनती है। किताब पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि आर्थिक आजादी का मतलब सिर्फ कमाई नहीं है। असली सवाल यह है कि कमाए गए पैसे पर निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है। किताब की असरदार बात किताब बड़े सिद्धांतों से नहीं, छोटे सवालों से शुरू होती है। आरती गुप्ता लिखती हैं कि बचपन से हमें बताया जाता है कि लक्ष्मी समृद्धि की देवी हैं। हम नारी शक्ति का सम्मान करने की बातें करते हैं। महिला पायलट, सीईओ, राष्ट्रपति और ओलंपिक पदक विजेताओं पर गर्व करते हैं। लेकिन घर के भीतर, जहां रोजमर्रा की आर्थिक ताकत तय होती है, वहां तस्वीर बदल जाती है। पैसों पर भरोसा अक्सर पुरुषों को सौंप दिया जाता है। यहीं किताब का सबसे महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है कि अगर महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में नेतृत्व कर सकती हैं तो आर्थिक फैसलों से उन्हें दूर क्यों रखा जाता है? किताब इस सवाल का जवाब भावनात्मक नारों से नहीं देती। इसके लिए लेखक ने महिलाओं से बातचीत की, उनके अनुभव सुने और आंकड़ों के जरिए एक तस्वीर सामने रखी। किताब के सबसे चौंकाने वाले आंकड़े किताब का एक हिस्सा ऐसा है, जो पढ़ते समय लंबे समय तक दिमाग में बना रहता है। लेखिका ने महिलाओं से पूछा कि वे क्या मानती हैं और वास्तव में क्या करती हैं। दोनों के बीच का अंतर हैरान करता है। डिटेल ग्राफिक में देखिए- इन आंकड़ों का असर इसलिए ज्यादा है क्योंकि वे एक गहरे विरोधाभास को सामने रखते हैं। महिलाएं अपनी क्षमता पर भरोसा करती हैं, लेकिन निर्णय की मेज तक नहीं पहुंच पातीं। सीखने का सफर, जो किताब को भरोसेमंद बनाता है किताब का एक सुंदर हिस्सा लेखिका की अपनी यात्रा है। विवाह के बाद घर, बच्चों और जिम्मेदारियों के बीच उनकी जिंदगी आगे बढ़ रही थी। फिर 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट आया। बाजारों में अफरा-तफरी थी। परिवार के निवेश को लेकर चिंताएं थीं। उसी दौर में उन्होंने निवेश की दुनिया को करीब से समझना शुरू किया। आरती गुप्ता बताती हैं कि शुरुआत में उनके पास भी अनुभव नहीं था। उन्होंने बैठकों में हिस्सा लिया, विशेषज्ञों को सुना, गलतियां कीं, नुकसान भी देखा और धीरे-धीरे फैसले लेने का आत्मविश्वास विकसित किया। यही ईमानदारी किताब को मजबूत बनाती है। लेखक हर जगह खुद को विजेता की तरह पेश नहीं करतीं। वे बताती हैं कि आर्थिक समझ एक दिन में नहीं आती। यह लगातार सीखने और अभ्यास का परिणाम होती है। वित्तीय दुनिया का अदृश्य भेदभाव आर्थिक आजादी का असली मतलब किताब की सबसे बड़ी ताकत कुछ बातें जो लंबे समय तक याद रहती हैं किताब खत्म होने के बाद भी कुछ विचार मन में बने रहते हैं। यह किताब किसे पढ़नी चाहिए? अगर कोई महिला अपने पैसों को बेहतर समझना चाहती है, निवेश की दुनिया में पहला कदम रखना चाहती है या सिर्फ यह जानना चाहती है कि आर्थिक आजादी वास्तव में क्या होती है, तो यह किताब उसके लिए एक अच्छी शुरुआत साबित हो सकती है। लेखिका पहले डर कम करती हैं, फिर समझ बढ़ाती हैं और आखिर में निवेश की तरफ ले जाती हैं। किताब के बारे में मेरी राय किताब पढ़ते हुए कई बार महसूस होता है कि आर्थिक असमानता की सबसे बड़ी वजह संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि भागीदारी की कमी है। यही बात इसे साधारण फाइनेंस किताबों से अलग बनाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि किताब यह भरोसा पैदा करती है कि आर्थिक समझ कोई जन्मजात प्रतिभा नहीं, बल्कि सीखा जाने वाली कौशल है। सीखने की शुरुआत किसी भी उम्र में की जा सकती है। ****************** ग्राफिक- विपुल शर्मा ……………………… ये खबर भी पढ़ें… बुक रिव्यू- पीपल की छांव में:एक आदमी, एक पेड़ और एक ऐसी मुहिम की कहानी, जो धीरे-धीरे आंदोलन बन गई हम अक्सर पर्यावरण की बात तब करते हैं, जब गर्मी बढ़ जाती है, बारिश का मौसम बदल जाता है या किसी शहर की हवा जहरीली हो जाती है। लेकिन पेड़, मिट्टी, पक्षी और प्रकृति हमारे जीवन को हर दिन कैसे प्रभावित करते हैं, इस पर कम ही सोचते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

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  Sports

ICC ने भारत को सौंपी Women's Champions Trophy 2027 की मेजबानी

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने 2027 में होने वाली पहली महिला चैंपियंस ट्रॉफी की मेजबानी श्रीलंका से छीनकर बुधवार को इसे भारत में आयोजित करने को फैसला किया। छह टीम का यह टूर्नामेंट 14 से 28 फरवरी 2027 तक मुंबई और वडोदरा में खेला जाएगा। श्रीलंका में क्रिकेट से जुड़े प्रशासनिक विवादों के कारण उससे मेजबानी वापस ले ली गई।

आईसीसी बोर्ड ने बुधवार को भारत को नया मेजबान चुना। आईसीसी ने बयान में कहा, ‘‘यह टूर्नामेंट पहले श्रीलंका में होना था, लेकिन अब इसे भारत में आयोजित किया जाएगा क्योंकि श्रीलंका क्रिकेट आईसीसी की जुलाई में हुई वार्षिक बैठक में बताए गए जरूरी सुधारों को अभी पूरा कर रहा है। ’’ बयान में कहा गया, ‘‘आईसीसी ने नए मेजबान के लिए बांग्लादेश, भारत और दक्षिण अफ्रीका के नाम पर विचार किया।

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तय नियमों और मानकों के आधार पर आईसीसी ने भारत को श्रीलंका की जगह नया मेजबान बनाने की सिफारिश की। आईसीसी बोर्ड ने दो सितंबर को इस फैसले को मंजूरी दे दी। ’’ टूर्नामेंट के मैच मुंबई के क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया और वडोदरा इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में खेले जाएंगे।

इस टूर्नामेंट में दुनिया की छह प्रमुख महिला क्रिकेट टीम ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, भारत, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और श्रीलंका हिस्सा लेंगी। इन टीम का चयन छह जुलाई की आईसीसी महिला टी20 अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग के आधार पर किया गया है। सभी छह टीम पहले राउंड-रॉबिन लीग में एक-दूसरे के खिलाफ खेलेंगी।

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इसके बाद शीर्ष दो टीम 28 फरवरी को फाइनल खेलेंगी। पुरुषों की चैंपियंस ट्रॉफी 50 ओवर के प्रारूप में खेली जाती है। भारत ने पिछले साल महिला वनडे विश्व कप की मेजबानी भी की थी और भारतीय महिला टीम ने पहली बार यह खिताब जीता था।

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आईसीसी के चेयरमैन जय शाह ने कहा, ‘‘आईसीसी महिला चैंपियंस ट्रॉफी 2027 महिला क्रिकेट के लिए एक नए और रोमांचक दौर की शुरुआत होगी। यह इस टूर्नामेंट का पहला टूर्नामेंट होगा जिसमें दुनिया की बेहतरीन टीम एक बड़े और कड़े मुकाबले में हिस्सा लेंगी। इससे इन टीम को अपनी रैंकिंग बेहतर करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जगह बनाने के लिए और अधिक प्रेरणा मिलेगी।

’’ उन्होंने कहा, ‘‘अब हर साल एक बड़ा आईसीसी महिला टूर्नामेंट आयोजित होगा। इससे महिला क्रिकेट को और बढ़ावा देने, प्रतियोगिताओं में निरंतरता लाने और दुनिया भर की महिला खिलाड़ियों तथा प्रशंसकों के लिए क्रिकेट को और मजबूत बनाने का अच्छा मौका मिलेगा।

Thu, 03 Sep 2026 10:13:43 +0530

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