पेरेंटिंग– हमारे झगड़ों से परेशान है बेटा:वो चुप, उदास रहने लगा है, क्या पेरेंट्स की लड़ाई से बच्चे डिप्रेशन में जा सकते हैं
सवाल- मैं 37 साल की गृहिणी हूं। मेरे पति प्राइवेट नौकरी करते हैं और अक्सर काम का तनाव घर लेकर आते हैं। पिछले दो साल से हमारे बीच लगभग रोज किसी–न–किसी बात पर बहस, झगड़ा हो जाता है। हमारा 8 साल का बेटा झगड़ा शुरू होते ही अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लेता है। पहले वह बहुत हंसमुख था, लेकिन अब छोटी-छोटी बात पर डर जाता है और स्कूल जाने से भी कतराने लगा है। कभी-कभी कहता है, "आप लोग फिर लड़ोगे क्या?" मुझे लगता है कि वह तनाव में रहने लगा है। क्या हमारे झगड़े उसकी मेंटल हेल्थ पर लॉन्ग टर्म असर डाल सकते हैं? अब हमें क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर पति-पत्नी के बीच कभी-कभार मतभेद होना सामान्य बात है। लेकिन अगर घर में रोज झगड़े होने लगें, आवाज ऊंची होने लगे और बच्चा बार-बार इन सबका गवाह बने, तब यह सिर्फ पति-पत्नी के बीच का मामला नहीं रह जाता। इसका असर पूरे परिवार और खासतौर से बच्चे की मेंटल–इमोशनल हेल्थ पर पड़ता है। बच्चे में दिख रहे बदलाव आपके बेटे के व्यवहार में ये बदलाव दिख रहे हैं- ये सारे संकेत बताते हैं कि वह घर के तनाव को महसूस कर रहा है। बच्चे अक्सर अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। अपने डर, चिंता और असुरक्षा को वे अपने व्यवहार के जरिए दिखाते हैं। माता- पिता हैं बच्चे का सेफ्टी नेट चाइल्ड साइकोलॉजी के अनुसार, बच्चे के लिए माता-पिता उसका सबसे सुरक्षित संसार होते हैं। जब वह संसार अस्थिर और तनावपूर्ण दिखने लगता है तो उसके भीतर ‘सेफ्टी’ की भावना कमजोर होने लगती है। वह हर समय सतर्क रहने लगता है कि अगला झगड़ा कब होगा। क्या हर झगड़ा बच्चे को नुकसान पहुंचाता है? नहीं। यह समझना बहुत जरूरी है। अगर पति-पत्नी किसी बात पर शांत तरीके से असहमति जताते हैं, एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और बाद में समस्या का समाधान भी बच्चे के सामने दिखता है, तो बच्चा सीखता है कि मतभेद रिश्तों का सामान्य हिस्सा हैं। समस्या तब होती है, जब- ऐसे माहौल में बच्चा ‘इमोशनल सर्वाइवल मोड’ में रहने लगता है। उसका दिमाग पढ़ाई, खेल और सीखने की बजाय अपनी सुरक्षा पर ज्यादा फोकस हो जाता है। झगड़े को कैसे समझता बच्चे का ब्रेन? 8 साल की उम्र में बच्चा दुनिया को अभी भी काफी हद तक माता-पिता के नजरिए से देखता है। अगर वह रोज लड़ाई देखता है तो उसके मन में कई तरह के सवाल आते हैं- ये स्ट्रेस बच्चे के भीतर डर पैदा कर सकता है। ये डर बच्चे शब्दों में नहीं बोल पाते। इसलिए उनके व्यवहार और कुछ संकेतों पर गौर करने की जरूरत है- माता-पिता के लिए सबसे जरूरी बात अक्सर माता-पिता कहते हैं, "हम बच्चे के सामने नहीं लड़ते" या "उसे कुछ समझ नहीं आता।" असलियत यह है कि बच्चे सिर्फ शब्द नहीं सुनतेञ। वे चेहरे के भाव, आवाज का उतार-चढ़ाव, कमरे का माहौल और शरीर की भाषा भी पढ़ लेते हैं। इसलिए अगर बच्चा डर रहा है तो उसकी भावना को ‘ओवररिएक्शन’ कहकर खारिज न करें। उसके डर को स्वीकार करना ही समाधान की शुरुआत है। इस स्थिति को कैसे संभालें? 1. झगड़े का तरीका बदलें 2. बच्चे को भरोसा दें 3. बच्चे की दिनचर्या सामान्य रखें तनाव के समय नियमित दिनचर्या बच्चे को सुरक्षा का एहसास देती है। रूटीन जितना स्थिर रहेगा, बच्चा उतना सुरक्षित महसूस करेगा। इसलिए इन बातों का ध्यान रखें- 4. रोज 15-20 मिनट सिर्फ बच्चे के लिए रखें इसे बच्चे का ‘स्पेशल टाइम’ मानें। इस दौरान- 5. अगर माफी मांगी है तो उसे दिखाएं भी बच्चे आप दोनों के बीच सिर्फ झगड़ा नहीं, बल्कि प्यार, दोस्ती और ख्याल भी देखें। अगर आकोप दोनों के बीच बहस हुई थी और बाद में आपने एक-दूसरे से सम्मानपूर्वक बात की या सामान्य व्यवहार किया, तो बच्चा सीखता है कि बहस से रिश्ते टूटते नहीं हैं। उन्हें बेहतर भी किया जा सकता है। चाइल्ड काउंसिलर की मदद कब जरूरी? अगर बच्चे में नीचे दिए बदलाव 4-6 हफ्तों से बने हुए हैं या बढ़ रहे हैं तो चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से मिलना बेहतर होगा- इसी तरह अगर पति-पत्नी के झगड़े लगातार बढ़ रहे हैं और दोनों उन्हें नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं, तो मैरिज या फैमिली काउंसलिंग लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। अंतिम बात बच्चों को ऐसे माता-पिता नहीं चाहिए, जो कभी गलती न करें। उन्हें ऐसे माता-पिता चाहिए, जो गलती होने पर उसे स्वीकार करें, सम्मानपूर्वक सुलझाएं और बच्चे को यह भरोसा दिलाएं कि परिवार उसके लिए सुरक्षित जगह है। जब घर का भावनात्मक माहौल बेहतर होता है, तो अधिकांश बच्चों में डर, चिंता और असुरक्षा भी धीरे-धीरे कम होने लगती है। ********************* ग्राफिक्स– अंकुर बंसल …………………… ये खबर भी पढ़ें…. पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता:हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। पूरी खबर पढ़ें…
जरूरत की खबर- बारिश के मौसम में घुटनों–जोड़ों में दर्द:इन 7 कारणों से बढ़ता पेन, सावधानी जरूरी, डाइट बदलें, ये 6 चीजें न खाएं
मानसून के दौरान जोड़ों के दर्द की शिकायत बढ़ जाती है। इस मौसम में कुछ लोगों को घुटनों, पीठ और कंधों में दर्द या जकड़न की समस्या होती है। खासकर आर्थराइटिस, पुरानी चोट या हड्डियों से जुड़ी समस्याओं से पीड़ित लोगों में यह परेशानी बढ़ जाती है। 'द जर्नल ऑफ रुमेटोलॉजी' में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, कम तापमान और ज्यादा नमी, कुछ लोगों में जॉइंट पेन बढ़ा सकते हैं। हालांकि इसका असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। उम्र, स्वास्थ्य और पहले से मौजूद बीमारियां इसमें अहम भूमिका निभाती हैं। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में मानसून में जॉइंट पेन की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट- डॉ. गौरव प्रकाश भारद्वाज, डायरेक्टर और सीनियर कंसल्टेंट- स्पोर्ट्स इंजरी, जॉइंट प्रिजर्वेशन एंड रिप्लेसमेंट सर्जन, पीएसआरआई हॉस्पिटल, नई दिल्ली सवाल- मानसून में बॉडी पेन और जॉइंट पेन क्यों बढ़ जाता है? जवाब- मानसून में बढ़ी हुई नमी, तापमान में उतार-चढ़ाव और एयर प्रेशर में बदलाव जोड़ों और मांसपेशियों को प्रभावित करते हैं। इससे कुछ लोगों में दर्द, सूजन और जकड़न की समस्या बढ़ जाती है। ग्राफिक में इसके सभी कारण देखिए- सवाल- बारिश का मौसम जॉइंट्स को कैसे प्रभावित करता है? जवाब- हां, इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- किन लोगों को इसका रिस्क ज्यादा होता है? जवाब- जिनके जॉइंट्स या मसल्स सेंसिटिव होते हैं या शरीर की रिकवरी क्षमता कम होती है, उन्हें रिस्क ज्यादा होता है। ग्राफिक में देखिए- सवाल- किन बॉडी पार्ट्स में ज्यादा दर्द बढ़ सकता है? जवाब- जहां पहले से कमजोरी, चोट या सूजन हो, उन बॉडी पार्ट्स में मानसून के दौरान दर्द ट्रिगर होता है, जैसेकि- सवाल- क्या कम धूप मिलने से दर्द बढ़ सकता है? जवाब- हां, मानसून में धूप कम निकलने से शरीर में विटामिन D का लेवल कम हो सकता है। इसकी कमी से हड्डियां और मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं। सवाल- मानसून में जॉइंट पेन कम करने के लिए क्या करें? जवाब- सही लाइफस्टाइल अपनाकर इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखें- सवाल- कौन-सी एक्सरसाइज दर्द से राहत दिलाने में फायदेमंद है? जवाब- जिस एक्सरसाइज से जोड़ों पर ज्यादा प्रेशर न पड़े, वो दर्द से राहत दिलाती है, जैसेकि- सवाल- क्या गर्म सिंकाई से भी दर्द में राहत मिलती है? जवाब- हां, गर्म सिंकाई जॉइंट पेन में राहत देती है। गर्माहट से जोड़ों के आसपास की मांसपेशियां रिलैक्स होती हैं, ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और स्टिफनेस कम होती है। इससे दर्द धीरे-धीरे घटता है। अगर जॉइंट में ज्यादा सूजन और रेडनेस हो तो गर्म की बजाय ठंडी सिंकाई बेहतर है। सवाल- कब डॉक्टर के पास जाना जरूरी है? जवाब- इन स्थितियों में डॉक्टर को दिखाना जरूरी है- सवाल- क्या खानपान की आदतें भी दर्द बढ़ा सकती हैं? जवाब- हां, गलत खानपान से शरीर में सूजन बढ़ सकती है। इससे जॉइंट पेन बढ़ता है। ग्राफिक में ऐसी ही कुछ खराब आदतों की लिस्ट देखिए- सवाल- जिन्हें पहले से जॉइंट पेन की समस्या है, मानसून में उनकी डाइट कैसी होनी चाहिए? जवाब- ऐसे लोगों की डाइट में एंटी-इंफ्लेमेटरी और कैल्शियम रिच फूड होने चाहिए, जो हड्डियों को मजबूत बनाएं और मसल्स को सपोर्ट दें। ग्राफिक में फूड्स की लिस्ट देखिए- बॉडी पेन से जुड़े कुछ कॉमन सवाल–जवाब सवाल- क्या ज्यादा सोने या देर तक एक ही पोजिशन में रहने से दर्द बढ़ता है? जवाब- हां, इससे जोड़ों में फ्लूइड मूवमेंट कम हो जाता है और आसपास की मांसपेशियां सख्त होने लगती हैं। इससे स्टिफनेस और दर्द बढ़ता है। सवाल- क्या पानी कम पीने से भी शरीर दर्द हो सकता है? जवाब- हां, इससे जोड़ों के बीच मौजूद लुब्रिकेटिंग फ्लूइड का प्रभाव कम हो जाता है। साथ ही घर्षण, स्टिफनेस और दर्द बढ़ सकता है। डिहाइड्रेशन मांसपेशियों में ऐंठन और थकान भी बढ़ाता है। सवाल- क्या नींद की कमी से दर्द बढ़ सकता है? जवाब- हां, पर्याप्त नींद न मिलने पर शरीर की रिपेयर और रिकवरी प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे मसल्स और जोड़ों में सूजन बढ़ सकती है। नींद की कमी दर्द सहने की क्षमता भी कम कर देती है। इसलिए हल्का दर्द भी ज्यादा ज्यादा महसूस होने लगता है। सवाल- क्या लंबे समय तक डेस्क जॉब से दर्द बढ़ता है? जवाब- हां, इससे जोड़ों में स्टिफनेस आती है और मांसपेशियां टाइट होने लगती हैं। गलत पोस्चर इस समस्या को बढ़ा देता है। इससे धीरे-धीरे क्रॉनिक दर्द की स्थिति बन सकती है। सवाल- किस तरह के गद्दा/तकिया बेहतर हैं? जवाब- मीडियम-फर्म ऑर्थोपेडिक गद्दा बेहतर माना जाता है। यह रीढ़ (स्पाइन/रीढ़ की हड्डी) को सही सपोर्ट देता है। साथ ही कंधे, कूल्हे व घुटनों जैसे दबाव वाले हिस्सों पर भार कम करता है। तकिए के लिए ऐसा विकल्प चुनें, जो गर्दन को सीधी और न्यूट्रल पोजिशन में रखे। सवाल- क्या हर बार पेनकिलर लेना सही है? जवाब- नहीं, इसके बजाय दर्द की वजह समझना जरूरी है। साथ ही हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लें। सवाल- क्या गलत फुटवियर से दर्द बढ़ सकता है? जवाब- हां, बहुत फ्लैट, बहुत सख्त या बिना कुशन वाले जूते पैरों के शॉक को ठीक से एब्जॉर्ब नहीं करते। इसका असर सीधे एड़ी, घुटनों और कूल्हों तक जाता है। इसी तरह हाई हील्स शरीर का संतुलन बिगाड़ती हैं और घुटनों व पीठ पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं। इससे दर्द बढ़ सकता है। ********************* ये खबर भी पढ़ें…. जरूरत की खबर- मानसून में बढ़ते सांप काटने के केस:सांप काटे तो तुरंत करें ये 6 काम, ये 10 गलतियां न करें, बता रहे हैं डॉक्टर पिछले दिनों महाराष्ट्र पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट ने सांप के काटने (स्नेक बाइट) को ‘नोटिफाएबल डिजीज’ घोषित किया। यानी अब स्वास्थ्य विभाग को स्नेक बाइट के मामलों और इससे होने वाली मौतों की जानकारी देना अनिवार्य होगा। पूरी खबर पढ़ें…
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