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राम मंदिर ट्रस्ट के पहले CEO बनने पर आया एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा का रिएक्शन, देखिए Video

अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को बुधवार को अपना पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मिल गया. भारतीय वायुसेना के पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए चुना गया है. नियुक्ति के बाद मिश्रा ने इसे अपने लिए बेहद सौभाग्य की बात बताते हुए कहा कि वह भगवान राम का आशीर्वाद मानते हैं कि देश की सेवा के बाद उन्हें श्रीराम मंदिर और राम भक्तों की सेवा करने का अवसर मिला है.

पहली प्रतिक्रिया में जताया आभार

CEO बनाए जाने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में जितेंद्र मिश्रा ने चयन समिति का आभार जताया. उन्होंने कहा कि इतने उम्मीदवारों के बीच उनका चयन होना उनके लिए सौभाग्य की बात है. उन्होंने यह भी कहा कि वह मंदिर के लिए अपनी पूरी क्षमता के साथ बेहतर काम करने का प्रयास करेंगे.

मिश्रा ने अपने बयान में वायुसेना में बिताए करीब 43 वर्षों के सेवाकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि देश की सेवा के बाद अब उन्हें श्रीराम मंदिर और श्रद्धालुओं की सेवा का अवसर मिला है. उन्होंने इसे भगवान राम का आशीर्वाद बताया.

ऑपरेशन सिंदूर से भी रहा खास संबंध

जितेंद्र मिश्रा का नाम हाल के वर्षों में भारतीय वायुसेना की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के कारण चर्चा में रहा है. वह वेस्टर्न एयर कमांड के प्रमुख रह चुके हैं. इसी दौरान उन्हें ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी अहम सैन्य जिम्मेदारी संभालने का अनुभव मिला. ताजा रिपोर्टों में उन्हें इस अभियान के दौरान पश्चिमी वायु क्षेत्र की कमान संभालने वाले अधिकारी के तौर पर बताया गया है.

उनका लंबा सैन्य अनुभव अब राम मंदिर ट्रस्ट के प्रशासनिक कामकाज में इस्तेमाल होने की उम्मीद है. CEO की भूमिका मंदिर परिसर की व्यवस्थाओं, प्रशासन और विभिन्न संचालन से जुड़े कामों को अधिक व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण हो सकती है.

देवरिया के गांव में खुशी का माहौल

जितेंद्र मिश्रा का संबंध उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के भोपतपुरा गांव से बताया जाता है. राम मंदिर ट्रस्ट के पहले CEO के रूप में उनके चयन की खबर सामने आने के बाद गांव में भी खुशी का माहौल बन गया. स्थानीय लोगों ने इसे गांव और पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बताया.

एक छोटे से गांव से निकलकर भारतीय वायुसेना के शीर्ष पद तक पहुंचने और अब राम मंदिर ट्रस्ट की जिम्मेदारी संभालने तक का उनका सफर खासा उल्लेखनीय माना जा रहा है.

सैन्य अनुशासन से मंदिर प्रशासन तक

जितेंद्र मिश्रा की नई भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उनके सैन्य करियर से बिल्कुल अलग क्षेत्र है. हालांकि सैन्य सेवा के दौरान नेतृत्व, रणनीतिक योजना, संगठन और बड़े स्तर पर संचालन का जो अनुभव उन्होंने हासिल किया, उसका उपयोग मंदिर ट्रस्ट की प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने में किया जा सकता है.

राम मंदिर के निर्माण के साथ अब मंदिर परिसर और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं का विस्तार भी लगातार हो रहा है. ऐसे में एक पूर्णकालिक CEO की नियुक्ति को ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे को और मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.

ट्रस्ट में हुए कई अहम बदलाव

CEO की नियुक्ति के साथ श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में अन्य महत्वपूर्ण बदलाव भी किए गए हैं. पूर्व कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि को नए महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि महेश भागचन्दका को नया कोषाध्यक्ष बनाया गया है. इस तरह ट्रस्ट में प्रशासनिक और वित्तीय जिम्मेदारियों के स्तर पर भी नए चेहरों को जिम्मेदारी मिली है.

अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जितेंद्र मिश्रा अपने सैन्य अनुभव और प्रशासनिक क्षमता का इस्तेमाल राम मंदिर ट्रस्ट की भविष्य की व्यवस्थाओं को किस तरह दिशा देते हैं.

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क्या सिस्टम से उठ चुका है भरोसा? मेघना गुलज़ार की 'दायरा' के वो 5 सीन जिन्होंने हिला दी न्याय की नींव

Daayra Trailer: सिनेमा जब समाज के कड़वे सच से आंखें मिलाने लगे, तो परदे पर पैदा होने वाला सन्नाटा चीख से ज्यादा भारी लगने लगता है. अपनी फिल्मों में हमेशा यथार्थ की परतें उधेड़ने वाली निर्देशक मेघना गुलजार एक बार फिर ऐसा ही संवेदनशील विषय लेकर लौटी हैं. तलवार और राजी के जरिए दर्शकों के दिलों में अलग छाप छोड़ने के बाद अब उनकी नई फिल्म 'दायरा' का ट्रेलर सामने आ चुका है. यह ट्रेलर केवल किसी अपराध की तफ्तीश भर नहीं दिखाता, बल्कि सीधे उस न्याय प्रणाली पर उंगली उठाता है जिस पर आम आदमी आंख मूंदकर भरोसा करता है. फिल्म में पहली बार करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन एक साथ नजर आ रहे हैं. दोनों ही कलाकार पुलिस अधिकारियों के रोल में हैं, जिनका मकसद एक होने के बाद भी सोच की दिशा बिल्कुल अलग है.

कानून की चौखट और एनकाउंटर का शॉर्टकट

ट्रेलर की शुरुआत जिस तरह के सवालों के साथ होती है, वह किसी को भी सोचने पर मजबूर कर दे. समाज में जब भी कोई भयानक जुर्म होता है, तो जनता तुरंत इंसाफ की मांग करती है. ऐसे में न्याय की लंबी लड़ाई और अदालती तारीखों से बचने के लिए क्या पुलिस एनकाउंटर को सही ठहराया जा सकता है. ट्रेलर का प्रेस कॉन्फ्रेंस वाला दृश्य इसी उधेड़बुन को बहुत बेबाकी से पेश करता है. जब खाकी वर्दी पहनने वाले ही आत्मरक्षा के नाम पर फैसला खुद करने लगें, तो व्यवस्था के वजूद पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है. यह कहानी साफ तौर पर पूछती है कि इंसाफ और प्रतिशोध की सीमा कहां खत्म होती है. फिल्म दर्शकों को आसान जवाब देने की जगह उन्हें उस मोड़ पर लाकर खड़ा करती है जहां हर कोई असहज हो उठे.

आंकड़ों की आड़ में छिपी जिंदगी की त्रासदी

ट्रेलर के संवाद सीधे सीने में उतरते हैं. एक दृश्य में जब एक पुलिसकर्मी कहता है कि सौ में से निन्यानवे बार बेटियां सुरक्षित घर लौट आती हैं, तभी पृथ्वीराज सुकुमारन का किरदार पलटकर पूछता है कि उस बची हुई एक लड़की का क्या. यह छोटा सा संवाद पूरे मामले का रुख मोड़ देता है. पुलिस और प्रशासन के लिए वह एक संख्या या मामूली आंकड़ा हो सकती है, लेकिन जिस परिवार ने अपनी मासूम बच्ची को खोया है, उसके लिए वह पूरी दुनिया उजड़ जाने जैसा है. आंकड़ों का खेल सिस्टम को राहत दे सकता है, मगर उस घर के आंसू कभी नहीं सूखते जहां से कोई हमेशा के लिए चला गया हो. यह दृश्य सीधे तौर पर दर्शकों की अंतरात्मा को झकझोर देता है.

एक बेबस मां की चीख और मिट्टी के नीचे दबे राज

शब्दों से परे भी कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जो रूह कंपा देते हैं. ट्रेलर में अभिनेत्री क्षिति जोग का अपने बच्चे के बेजान शरीर को देखकर बिलखना ऐसा ही एक क्षण है. यह बिना किसी लंबे भाषण के समझा देता है कि किसी अपराध की सबसे भारी कीमत कौन चुकाता है. वहीं दूसरी तरफ जांच के दौरान आने वाला संवाद कि यहां धूल नहीं बल्कि कड़क मिट्टी है, एनकाउंटर की कहानियों की बनावट की ओर इशारा करता है. अक्सर कानूनी खामियों और प्रशासनिक दबाव के बीच कई सच दफना दिए जाते हैं. फिल्म किसी एक का पक्ष लेने के बजाय यह दिखाती है कि कैसे सिस्टम की असफलता इंसाफ के पूरे मायने को ही बदल कर रख देती है.

नाबालिग अपराधियों की ढाल बना कानून

फिल्म का सबसे धारदार प्रहार जुवेनाइल जस्टिस सिस्टम पर किया गया है. ट्रेलर में एक किरदार सवाल दागता है कि जो नाबालिग बलात्कार और हत्या जैसा जघन्य अपराध कर सकता है, उसे कानून से सुरक्षा क्यों मिलनी चाहिए. यह ऐसा मुद्दा है जिस पर पूरे देश में लंबे समय से तीखी बहस चल रही है. क्या उम्र की सीमा किसी संगीन जुर्म की सजा को कम कर सकती है. 'दायरा' ऐसे सवालों से बचती नहीं बल्कि उन्हें केंद्र में लाकर खड़ा करती है. 18 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही यह फिल्म यह साबित करती है कि कई बार न्याय का रास्ता तय करने के लिए खुद के बनाए कायदों से भी लड़ना पड़ता है.

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