भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही की शुरुआत में अब तक मजबूती के संकेत दिए हैं, लेकिन तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं है। एक तरफ कर संग्रह, डिजिटल भुगतान और वाहन बिक्री में तेजी दिखी है, वहीं कारखानों की गतिविधियों और रोजगार से जुड़े आंकड़ों ने चिंता बढ़ाई है। यानी घरेलू मांग फिलहाल अर्थव्यवस्था को सहारा दे रही है, लेकिन औद्योगिक क्षेत्र पर दबाव के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं।
मौजूद जानकारी के अनुसार अगस्त में सकल वस्तु एवं सेवा कर संग्रह करीब 15 प्रतिशत बढ़कर लगभग दो लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया। यह लगातार तीसरा महीना है जब कर संग्रह में दो अंकों की वृद्धि दर्ज हुई है। जुलाई में इसमें 15.4 प्रतिशत और जून में 13.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। हालांकि अगस्त की मजबूती में आयात से मिलने वाले कर का बड़ा योगदान रहा।
आयात से प्राप्त कर 29 प्रतिशत बढ़कर 62,604 करोड़ रुपये हो गया, जबकि घरेलू कारोबार से मिलने वाला संग्रह 9.3 प्रतिशत बढ़कर 1.37 लाख करोड़ रुपये रहा। अप्रैल से अगस्त के बीच कुल कर संग्रह 10.43 लाख करोड़ रुपये पहुंचा, जिसमें 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। डेलॉयट इंडिया के महेश जयसिंग के मुताबिक मजबूत घरेलू कर संग्रह हालिया आर्थिक गतिविधियों में बनी मजबूती से मेल खाता है।
डिजिटल भुगतान के मोर्चे पर भी तस्वीर उत्साहजनक रही। अगस्त में एकीकृत भुगतान प्रणाली के जरिये रिकॉर्ड 24.5 अरब लेनदेन हुए, जबकि जुलाई में यह आंकड़ा 23.7 अरब था। सालाना आधार पर लेनदेन में 22.5 प्रतिशत वृद्धि हुई। इन लेनदेन का कुल मूल्य करीब 29.8 लाख करोड़ रुपये रहा। पे नियरबाय के संस्थापक और प्रबंध निदेशक आनंद कुमार बजाज ने कहा कि त्योहारों के मौसम में छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान की गतिविधियां और बढ़ सकती हैं।
वाहन बिक्री ने भी घरेलू खपत की मजबूती का संकेत दिया। मारुति सुजुकी की कुल बिक्री 21.3 प्रतिशत बढ़कर 2,19,220 वाहन रही। महिंद्रा की यात्री वाहन बिक्री 50.4 प्रतिशत बढ़ी। हुंडई की कुल बिक्री में 8.8 प्रतिशत और घरेलू बिक्री में 23.6 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई। बजाज की बिक्री 10 प्रतिशत, होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया की बिक्री 8 प्रतिशत और एस्कॉर्ट्स कुबोटा की ट्रैक्टर बिक्री 20.5 प्रतिशत बढ़ी।
लेकिन विनिर्माण क्षेत्र ने चिंता बढ़ाई है। एचएसबीसी का भारत मैन्युफैक्चरिंग खरीद प्रबंधक सूचकांक अगस्त में घटकर 52.8 रह गया, जो पांच साल का सबसे निचला स्तर है। हालांकि 50 से ऊपर का आंकड़ा विस्तार दर्शाता है, लेकिन नए आदेश और उत्पादन की वृद्धि अगस्त 2021 के बाद सबसे कमजोर रही। रोजगार में भी ढाई साल बाद पहली बार कमी आई। एचएसबीसी की मुख्य भारत अर्थशास्त्री प्रांजल भंडारी ने इसे दो वर्षों से अधिक समय बाद रोजगार में पहली गिरावट बताया।
वहीं कोल इंडिया का अगस्त उत्पादन 5.8 प्रतिशत घटा, हालांकि उसकी आपूर्ति 5.6 प्रतिशत बढ़ी। बता दें कि इसी दौरान पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से एक सितंबर को ब्रेंट कच्चा तेल 92 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया था। ऐसे में महंगी ऊर्जा, वैश्विक अनिश्चितता और कमजोर औद्योगिक मांग आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती है, जबकि घरेलू खपत फिलहाल मजबूती का आधार बनी हुई हैं।
Continue reading on the app
पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच फिर शुरू हुए सीधे हमलों ने दुनिया के ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के कारण क्षेत्रीय तेल कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं। इससे यह आशंका गहरा रही है कि संघर्ष लंबा खिंचा तो तेल आपूर्ति के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा दबाव पड़ सकता है।
मौजूदा जानकारी के अनुसार मंगलवार को एक महीने बाद अमेरिका और ईरान के बीच सीधे हमलों का नया दौर शुरू हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लारक द्वीप पर हमले के बाद आगे भी कार्रवाई की चेतावनी दी है। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण होर्मुज स्ट्रेट से तेल टैंकरों की आवाजाही पहले ही मुश्किल हो चुकी है। इसी बीच सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको ने फारस की खाड़ी से तेल प्रवाह बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन ईरानी ड्रोन हमलों ने इस प्रयास को प्रभावित कर दिया।
मंगलवार को सऊदी तेल लेकर जा रहे दो बड़े टैंकर सिद्र और सेनेगल प्रॉस्पेरिटी पर होर्मुज से निकलते समय प्रक्षेप्य से हमला हुआ। यह घटना ऐसे समय हुई जब अरामको ने अगस्त में खाड़ी से तेल लदान बढ़ाकर करीब सात लाख बैरल प्रतिदिन कर दिया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेंट तेल करीब 92 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि पश्चिम एशिया के कुछ प्रमुख तेल मानक 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गए।
तेल की बढ़ती कीमतों के बीच एक और चिंता वैश्विक बांड बाजार से जुड़ी है। प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में दीर्घकालिक बांड पर ब्याज दरें 2008 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। अमेरिकी केंद्रीय बैंक के नए प्रमुख केविन वॉल्श द्वारा महंगाई पर कड़ा रुख अपनाने के संकेत के बाद दस वर्षीय अमेरिकी सरकारी बांड की दर 4.76 प्रतिशत तक पहुंच गई। जापान में यह दर 3 प्रतिशत से ऊपर और 30 साल के उच्च स्तर पर पहुंची, जबकि ब्रिटेन में दस वर्षीय बांड की दर 5.2 प्रतिशत तक चली गई।
गौरतलब है कि महंगा कर्ज अर्थव्यवस्था में मांग को कमजोर कर सकता है। वाहन खरीद, हवाई यात्रा, निर्माण, कारखानों और माल ढुलाई पर इसका असर पड़ सकता है। वहीं तेल निकालने, पाइपलाइन बनाने और नई परियोजनाओं की लागत भी बढ़ती है। बाजार में इस महीने अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत बढ़ोतरी की करीब 60 प्रतिशत संभावना मानी जा रही है।
इस बीच ऊर्जा क्षेत्र में कई बड़े सौदे भी हुए हैं। वनओक ने ब्राजोस मिडस्ट्रीम की पश्चिम टेक्सास स्थित प्राकृतिक गैस परिसंपत्तियां 4.4 अरब डॉलर में खरीदी हैं। शेल और शेवरॉन ने घाना के साउथ डीपवाटर टानो तेल क्षेत्र में प्रवेश के लिए प्रारंभिक समझौता किया है। इक्विनोर और स्टैंडर्ड लिथियम ने अर्कांसस की लिथियम परियोजना के लिए एलजी एनर्जी सॉल्यूशन के साथ दूसरा बाध्यकारी खरीद समझौता किया है।
मौजूद जानकारी के अनुसार एनर्जियन मिस्र में बीपी की कुछ तेल परिसंपत्तियां करीब एक अरब डॉलर में खरीदने के लिए बातचीत कर रही है, जबकि डीएनओ करीब 40 करोड़ डॉलर में कैप्रिकॉर्न एनर्जी को खरीदने जा रही है। दूसरी ओर रूस ने प्रतिबंधों के बीच आर्कटिक एलएनजी-2 परियोजना के लिए इस्तेमाल होने वाले जहाजों का बेड़ा बढ़ाकर 20 कर दिया है।
चीन में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता पहली बार कोयले से आगे निकल गई है। वहीं जस्ता की कीमत चार साल के उच्च स्तर पर पहुंची और चिली में खराब मौसम के कारण तांबे का उत्पादन 2011 के बाद जुलाई में सबसे निचले स्तर पर रहा है। इन घटनाओं से साफ है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष अब केवल तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा, धातु, व्यापार और वैश्विक मांग पर भी असर डालने वाला है।
Continue reading on the app