Explainer: अगर सितंबर में भी कमजोर रहा मानसून तो आपकी रसोई तक दिखेगा ये बदलाव
Explainer: मानसून का महीना भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए काफी अहम होता है. मानसूनी बारिश के आधार पर ही देश की अर्थव्यवस्था का हिसाब-किताब किया होता है. लेकिन इस बार मानसून में बारिश भले ही हो रही है, लेकिन ये उम्मीद से कम हुई है. जिसका असर ग्रामीण भारत की अर्थव्यस्था से लेकर शहरी क्षेत्रों तक देखने को मिल सकता है. अगर सितंबर के महीने में भी कम बारिश हुई तो इसका आपकी किचन और थाली पर भी दिखाई देगा.
अगस्त में सामान्य से 16 फीसदी कम हुई बारिश
मौसम विभाग ने सोमवार (31 अगस्त) को बताया कि अगस्त में सामान्य से 16 फीसदी कम बारिश हुई है. ऐसे में सितंबर में भी भारत में औसत से कम मानसूनी बारिश होने की संभावना है. इससे एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में फसल की पैदावार और आर्थिक विकास को लेकर चिंता बढ़ गई है. दरअसल, सितंबर का महीना फसल पकने के लिए अहम होता है. इस दौरान कम बारिश होने से कपास, सोयाबीन, मक्का और दालों जैसी गर्मियों में बोई जाने वाली फसलों की पैदावार पर बुरा असर पड़ सकता है.
सालभर की बारिश का मानसून में 70 फीसदी हिस्सा
साथ ही, इससे गेहूं और रेपसीड जैसी सर्दियों में बोई जाने वाली फसलों के लिए जरूरी मिट्टी की नमी भी कम हो सकती है. भारत मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि सितंबर में बारिश लंबे समय के औसत के 91 प्रतिशत से कम रहने का अनुमान है. महापात्र ने कहा कि बारिश की कमी के कारण सितंबर में औसत अधिकतम और न्यूनतम तापमान भी सामान्य से ज्यादा रहने की उम्मीद है. मानसून से भारत में सालाना बारिश का लगभग 70 प्रतिशथ हिस्सा मिलता है और इससे जलाशयों, नदियों और भूजल का स्तर फिर से बढ़ जाता है.
अल-नीनो ने बिगाड़ा बारिश का खेल
भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की है, जहां लगभग आधी खेती वाली जमीन पर सिंचाई की सुविधा नहीं है और लगभग आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है. महापात्रा ने कहा कि अल नीनो मौसम पैटर्न, जिसकी वजह से अगस्त में कम बारिश हुई थी, और मजबूत हो गया है.
- अल नीनो की पहचान मध्य और पूर्वी इक्वेटोरियल प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म तापमान से होती है. यह दुनिया भर में मौसम के पैटर्न को बिगाड़ता है और अक्सर एशिया के कुछ हिस्सों में सूखे जैसे हालात पैदा करता है.
- भारत में अल नीनो वाले कई पिछले सालों में औसत से कम बारिश हुई है. कई बार इससे भयंकर सूखा पड़ा, जिससे फसलें बर्बाद हुईं और कुछ अनाजों के निर्यात पर रोक लगानी पड़ी.
- मुंबई स्थित ब्रोकरेज फर्म 'फिलिप कैपिटल इंडिया' में कमोडिटीज़ रिसर्च की वाइस प्रेसिडेंट अश्विनी बंसोड़ ने कहा कि अगस्त में औसत से कम बारिश से पहले ही प्रभावित फसलें अब फलियों के बनने और विकास के अहम दौर में हैं, जिससे पैदावार घटने का खतरा बढ़ गया है.
- बंसोड़ ने कहा, "सितंबर की बारिश सर्दियों की फसल की बुआई के लिए भी बहुत जरूरी है. अगर मिट्टी में नमी का स्तर कम होता है, तो गेहूं, चना और रेपसीड की बुआई में दिक्कतें आ सकती हैं."
खरीफ की फसल के लिए अहम है सितंबर में होने वाली बारिश
बता दें कि खरीफ के मौसम में भारत में खासतौर पर कपास, सोयाबीन, मक्का और अरहस जैसी दलहन की फसलें होती हैं. जो सितंबर के महीने में अपने विकास के चरण में होती हैं. ऐसे में अगर सितंबर के महीने में बारिश कम होती है उससे उनकी पैदावार भी कम हो जाती है.
- सितंबर के महीने में जहां मक्का की फसल पककर तैयार हो जाती है तो वहीं अरहर की फसल में फली बनने और पकने जैसे अहम चरण होते हैं. ऐसे में कम बारिश होने से पैदावार के प्रभावित होने का भी खतरा बढ़ जाता है.
- इसका मतलब है कि अगर सितंबर के महीने में बारिश नहीं होती या कम होती तो इसका असर फसल की पैदावार पर होता है. इससे सबसे ज्यादा नुकसान उन किसानों को ज्यादा होता है जिनके पास अपनी फसलों की सिंचाई की सुविधा नहीं होती.
- लेकिन जिनके पास सिंचाई का इंतजाम होता है उनकी कुछ हद तक भरपाई हो सकती है. बावजूद इसके बारिश की सभी को जरूरत रहती है.
रबी की फसल पर भी होगा इसका असर
सितंबर में होने वाली बारिश का असर खरीफ की फसलों पर ही नहीं बल्कि ये रबी की फसलों को भी प्रभावित करता है. क्योंकि ये बारिश मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी होती है. जो अक्टूबर और नवंबर में बोई जाने वाली रबी की फसलों के लिए बेहद जरूरी होता है.
- बता दें कि गेहूं, चना और सरसों और मटर जैसी रबी फसलों की बुवाई के समय अगर खेतों में पर्याप्त नमी नहीं होती तो किसानों को सिंचाई पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है. इसका मतलब है कि अगर सितंबर में बारिश कम होती है तो उसका असर सिर्फ खरीफ की फसलों पर ही नहीं होता बल्कि इससे रबी की फसलें भी प्रभावित होती हैं.
आपके थाली को कैसे प्रभावित करती है बारिश?
अब चलिए जानते हैं बारिश का असर आपकी थाली पर कैसे पड़ता है और इससे आपकी किचन से लेकर देश की अर्थव्यवस्था कैसे प्रभावित होती है. दरअसल, अगर बारिश कम होती तो उस सीजन में फसल भी कमजोरी होती है, ऐसे में बाजार में उस फसल की उपलब्धता भी कम होगी. ऐसे में उस फसल की कीमतों में उछाल होने की भी संभावना होती है हालांकि इस बात की पूरी गारंटी नहीं होती कि कीमतें बढ़ेंगी.
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कम बारिश का असर दालों, तिलहनों और कुछ सब्जियों पर भी दिखाई देता है. अगर ये महंगी होती हैं तो इससे आपकी किचन और थाली भी प्रभावित होती है. हालांकि किसान की फसल सिंचाई के आधार पर बढ़ती है और पैदावार भी कम होती तो ग्रामीण आय पर इसका दोहरा प्रभाव पड़ता है. क्योंकि सिंचाई के खर्च के साथ फसल का कम उत्पादन किसानों की आमदनी को प्रभावित करता है.
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झारखंड में 30 दिनों में स्वाइन फ्लू के 36 मामले, स्वास्थ्य विभाग अलर्ट
रांची, 2 सितंबर (आईएएनएस)। झारखंड मे स्वाइन फ्लू एच1एन1 संक्रमण के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी ने स्वास्थ्य महकमे की चिंता बढ़ा दी है। पिछले 30 दिनों में राज्यभर से एच1एन1 संक्रमण के कुल 36 मामले सामने आए हैं। चिंताजनक बात यह है कि कुल मरीजों में से आधे यानी 18 मरीज बच्चे और किशोर हैं। बढ़ते खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह मुस्तैद हो गया है और राज्य के सभी प्रमुख अस्पतालों को अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए गए हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, दूसरे राज्यों से यात्रा कर झारखंड लौटने वाले लोगों के कारण भी संक्रमण का प्रसार देखा जा रहा है। दिल्ली, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और राजस्थान में मौसमी फ्लू के बढ़ते प्रकोप को ध्यान में रखते हुए झारखंड में भी अंतरराज्यीय आवाजाही पर सतर्कता बढ़ा दी गई है। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशनों और अंतरराज्यीय बस स्टैंडों जैसे उच्च आवाजाही वाले स्थानों पर निगरानी बढ़ाने के साथ ही जिला स्तर से रोजाना रिपोर्ट तलब की जा रही है।
राज्य में संक्रमण की सटीक पहचान के लिए रांची स्थित रिम्स और जमशेदपुर स्थित एमजीएम) में एच1एन1 तथा एच3एन2 वायरस की जांच की आधुनिक व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है। राज्य स्वास्थ्य निदेशालय ने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा पदाधिकारियों को संदिग्ध मरीजों की त्वरित पहचान, जांच और समुचित इलाज सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं। राज्य के तमाम मेडिकल कॉलेज अस्पतालों और सदर अस्पतालों में कम से कम 10-10 अतिरिक्त बेड आरक्षित रखने का आदेश दिया गया है।
इसके अलावा, अस्पतालों में पर्याप्त ऑक्सीजन सप्लाई, आवश्यक दवाइयों का स्टॉक, आईसीयू , एचडीयू तथा विशेषज्ञ डॉक्टरों एवं पैरामेडिकल स्टाफ की 24 घंटे उपलब्धता अनिवार्य कर दी गई है। विभाग द्वारा इन्फ्लुएंजा जैसे लक्षणों वाली बीमारियों और गंभीर श्वसन संक्रमण के मामलों पर भी पैनी नजर रखी जा रही है। रिम्स के क्रिटिकल केयर विभागाध्यक्ष डॉ. प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया कि एच1एन1 एक इन्फ्लुएंजा वायरस है, जिसे लेकर पैनिक होने की आवश्यकता नहीं है।
हालांकि, बुजुर्गों, छोटे बच्चों और पहले से गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर से ग्रस्त मरीजों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। चिकित्सकों के मुताबिक तेज बुखार, ठंड लगना, खांसी, गले में खराश, शरीर दर्द और बच्चों में उल्टी-दस्त इसके प्रमुख लक्षण हैं। लक्षण दिखने पर खुद से दवा लेने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करने की सलाह दी गई है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है और समय पर इलाज से मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो रहे हैं।
--आईएएनएस
एसएनसी/पीएम
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