बाल अपराधियों का सुधार और पुनर्वास किशोर न्याय कानून का मुख्य मकसद: इलाहाबाद हाईकोर्ट
प्रयागराज, एक सितंबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम का उद्देश्य केवल बाल अपराधियों को दंडित करना नहीं बल्कि उनका पुनर्वास, विकास और समाज में पुनः एकीकरण सुनिश्चित करना है। न्यायमूर्ति अजय भनोट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 ने कठोर दंड की व्यवस्था से हटकर सुधारात्मक न्याय की अवधारणा को अपनाया है। अदालत ने कहा कि किशोर न्याय बोर्ड और बाल अदालतों को अपनी न्यायिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ बाल अपराधियों के पुनर्वास व उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।
अदालत ने 31 अगस्त को कासगंज और जालौन के दो बाल अपराधियों की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। अदालत ने कहा कि भारत ने 11 दिसंबर, 1992 को बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की पुष्टि की थी और इसके परिणामस्वरूप बच्चों के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखते हुए किशोर न्याय अधिनियम में व्यापक प्रावधान शामिल किए गए। अदालत ने कहा कि अधिनियम का उद्देश्य कानून के साथ संघर्ष में आए बच्चों तथा देखभाल और संरक्षण की जरूरत वाले बच्चों, दोनों के हितों की रक्षा करना है।
अदालत ने अधिनियम की धारा-3 में निहित प्रमुख सिद्धांतों पर जोर दिया, जिनमें बच्चे का सर्वोत्तम हित, सकारात्मक उपाय, संस्थागत देखभाल को अंतिम विकल्प के रूप में अपनाना और गैर-न्यायिक वैकल्पिक उपाय शामिल हैं। अदालत ने कहा कि हर फैसले में बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और उसकी क्षमताओं के पूर्ण विकास के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध कराया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि अधिनियम का उद्देश्य सजा देकर बच्चों को समाज से अलग करना नहीं, बल्कि उन्हें सशक्त बनाना और मुख्यधारा में वापस लाना है।
अदालत ने कहा, “किशोर न्याय बोर्ड और बाल अदालतों को बच्चे के अभिभावक के रूप में भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए तथा संरक्षक के सिद्धांत के तहत जिम्मेदारियां पूरी करनी चाहिए।” उच्च न्यायालय ने कहा कि किशोर न्याय बोर्ड को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रक्रिया के हर चरण में बच्चे और उसके माता-पिता या अभिभावक को जानकारी देकर उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी से लेकर जांच, देखभाल और पुनर्वास तक बच्चे के अधिकारों की लगातार रक्षा की जानी चाहिए। अदालत ने किशोर न्याय नियमों का हवाला देते हुए कहा कि जरूरत पड़ने पर बोर्ड बच्चे की प्रगति पर नजर रखने के लिए पुनर्वास कार्ड जारी कर सकता है और अगर लंबित जांच के कारण बच्चे की शिक्षा प्रभावित हो रही हो तो उचित आदेश देकर उसका स्कूल में पुनः नामांकन कराया जाना चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पुनर्वास और सामाजिक एकीकरण की प्रक्रिया बच्चे की रिहाई के साथ समाप्त नहीं होती और किशोर न्याय बोर्ड को बच्चे की प्रगति पर लगातार नजर रखनी चाहिए। अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा 14 के तहत मामले की सुनवाई अनुकूल माहौल में होनी चाहिए और प्रक्रिया को यथासंभव सरल रखा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया से बच्चे में भय, दबाव या सामाजिक बहिष्कार की भावना उत्पन्न नहीं होनी चाहिए।
नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज प्राथमिकी रद्द होने पर कॉजपा ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बताया बड़ी जीत
नयी दिल्ली, एक सितंबर कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) ने नीट प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले को मंगलवार को ‘‘बड़ी जीत’’ बताया। कॉजपा ने कहा कि केंद्र की ओर से तीन महीने के भीतर देशव्यापी मुआवजा नीति बनाने की प्रतिबद्धता अब प्रभावित परिवारों तक राहत के रूप में पहुंचनी चाहिए। कॉजपा ने एक बयान में कहा कि अदालत के आदेश से नीट-यूजी (राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातक) प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर हुए प्रदर्शनों में शामिल उन प्रदर्शनकारियों को राहत मिली है, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे।
उसने कहा कि इसमें अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज मामले भी शामिल हैं। कॉजपा ने कहा कि बाद में यदि केंद्र और राज्यों की ओर से सौंपी गई सूची में कोई अन्य प्राथमिकी छूटी हुई पाई जाती है तो वे भी इस आदेश के दायरे में आएंगी। कॉजपा संस्थापक एवं राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने कहा, ‘‘आज का फैसला हर उस छात्र की जीत है, जिसे यह बताया गया था कि अपनी आवाज उठाना अपराध है।
हमने प्रदर्शन इसलिए किया क्योंकि सरकार सुनने को तैयार नहीं थी। छात्रों को जवाब देने के बजाय सरकार ने प्राथमिकी और पुलिस कार्रवाई का सहारा लिया।’’ उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अब उन लोगों को राहत दी है, जिन्हें ‘‘लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए आपराधिक मामलों में फंसा दिया गया था।’’ दीपके ने कहा कि इस फैसले से यह संदेश जाना चाहिए कि डर दिखाकर असहमति की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा, ‘‘छात्रों को कक्षाओं में होना चाहिए, थानों में नहीं।
उन्हें अपनी सरकार से जवाबदेही की मांग करने के लिए सड़कों पर नहीं उतरना चाहिए। यह फैसला सत्ता में बैठे लोगों के लिए एक सबक होना चाहिए कि डर के जरिए असहमति को दबाया नहीं जा सकता।’’ कॉजपा ने नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक मामले से जुड़े कारणों से आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों के लिए मुआवजे को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता पर उच्चतम न्यायालय द्वारा संज्ञान लिए जाने का भी स्वागत किया। कॉजपा के सह-संयोजक सौरव दास ने कहा कि यह प्रतिबद्धता उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है, जो पहचान, जवाबदेही और आर्थिक सहायता की मांग कर रहे हैं।
दास ने कहा, ‘‘किसी बच्चे को खोने की भरपाई कोई मुआवजा नहीं कर सकता। इन परिवारों ने जो कुछ झेला है, उसे कोई वापस नहीं बदल सकता। लेकिन सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती।’’ उन्होंने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय के समक्ष की गई प्रतिबद्धता अब ऐसी निष्पक्ष और पारदर्शी नीति में बदलनी चाहिए, जो हर पात्र परिवार तक पहुंचे।’’ दास ने कहा कि परिवार काफी समय से इंतजार कर रहे हैं और उन्हें पहचान तथा राहत के लिए आगे भी संघर्ष नहीं करना चाहिए।
कॉजपा ने कहा कि वह उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के कार्यान्वयन और मुआवजे को लेकर सरकार की तीन महीने की प्रतिबद्धता पर नजर रखेगा। उसने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय में हुई घटनाओं के बाद पांच सितंबर को प्रस्तावित उसका मार्च वापस लिया जा रहा है। उच्चतम न्यायालय ने देशभर में 20 से 25 जुलाई के बीच कॉजपा के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी प्राथमिकी रद्द कर दी और कहा कि इन मामलों का उनके भविष्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने नीट प्रश्नपत्र लीक मामले के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को तीन महीने के भीतर मुआवजा देने का भी केंद्र को निर्देश दिया। हालांकि, केंद्र के आग्रह को स्वीकार करते हुए अदालत ने दिल्ली पुलिस को जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल 2,873 ऐसे लोगों के खिलाफ नयी प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति दी, जिनका गंभीर आपराधिक इतिहास रहा है।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
prabhasakshi






