रिलेशनशिप एडवाइज- हसबैंड अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड से बात करते हैं:क्या एक्स से दोस्ती नॉर्मल है या दोनों के बीच कुछ चल रहा है
सवाल- मेरी शादी को दो साल हुए हैं। कुछ दिन पहले मुझे पता चला कि मेरे पति आज भी अपनी एक्स-गर्लफ्रेंड से बात करते हैं। वे कहते हैं कि रिश्ता तो खत्म हो गया, लेकिन अब वो दोनों अच्छे दोस्त हैं। वो एक-दूसरे को बर्थ–डे विश करते हैं और एक-दूसरे की सोशल मीडिया पोस्ट पर कमेंट भी करते हैं। मुझे यह बात अजीब लगती है। मैं जब उनसे पूछती हूं कि कहते हैं कि अगर उन्हें कुछ गलत करना होता तो मुझसे यह बात छिपा लेते। मैं भरोसा करना चाहती हूं, लेकिन मन में डर बना रहता है। क्या शादी के बाद अपने एक्स से दोस्ती रखना नॉर्मल बात है? मैं इसे कैसे देखूं? एक्सपर्ट– डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। देखिए, शादी के बाद एक्स से दोस्ती अपने आप में गलत नहीं है। शादी के बाद किसी पुराने साथी से संपर्क में रहना अपने आप में बेवफाई नहीं है। कई बार लोग पुराने रिश्ते से भावनात्मक रूप से आगे बढ़ चुके होते हैं। इसके बाद भी सामान्य दोस्ती और संवाद बनाए रखते हैं। इसमें कुछ भी अजीब या अबनॉर्मल नहीं है। लेकिन हर रिश्ते की सीमा अलग होती है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पति एक्स से बात कर रहे हैं या नहीं। असली सवाल ये है कि वे किस तरह की बात करते हैं, कितनी बार करते हैं और उस रिश्ते की जगह उनकी शादी में कितनी है। अगर बातचीत सामान्य है, छिपाकर नहीं की जा रही है और उसमें भावनात्मक या रोमांटिक जुड़ाव नहीं है, तो इसे दोस्ती के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन अगर एक्स से बात करने के लिए पति आपसे बातें छिपाने लगें, लगातार उसी से भावनाएं साझा करें या आपकी तुलना उससे करें तो यह चिंता की बात हो सकती है। आधी–अधूरी जानकारी से निष्कर्ष न निकालें जैसाकि आपने अपने सवाल में लिखा है कि दोनों एक–दूसरे को बर्थडे विश करते हैं, सोशल मीडिया पोस्ट पर लाइक–कमेंट करते हैं। लेकिन जरा सोचिए, किसी को जन्मदिन की बधाई देना या सोशल मीडिया पर कमेंट करना भावनात्मक संबंध का प्रूफ नहीं है। मनोविज्ञान के नजरिए से कहूं तो समस्या तब बढ़ती है, जब हम अधूरी जानकारी से पूरा निष्कर्ष निकाल लेते हैं। आपके मन में यह विचार आ सकता है कि अगर वे आज भी बात करते हैं तो शायद उनके मन में अभी भी प्यार है। लेकिन ऐसा होना जरूरी नहीं है। इसलिए पहले बात को पूरी तरह समझने की कोशिश करें और इन पहलुओं पर गौर करें– रिश्ते में भरोसा एक वाक्य, एक शब्द नहीं आपके पति का यह कहना कि “अगर मुझे कुछ गलत करना होता तो मैं बात छिपा लेता,” भी एक बात की ओर इशारा करता है। संभव है कि वे इस संपर्क को सामान्य मानते हों। हालांकि केवल इस बात से भी पूरी तरह भरोसा करना जरूरी नहीं है। भरोसा एक वाक्य से नहीं बनता। यह कोई अंधा विश्वास भी नहीं है। भरोसा लगातार होने वाले व्यवहार से बनता है। आपकी फिक्र भी गैरवाजिब नहीं यह भी जरूरी है कि आप अपनी भावनाओं को सिर्फ इसलिए गलत न मानें क्योंकि पति कह रहे हैं कि कुछ गलत नहीं है। अपने डर को समझें, स्वीकार करें और फिर फैक्ट्स के आधार पर उसे परखें। कई बार पुराने रिश्ते का नाम ही मौजूदा साथी के मन में असुरक्षा पैदा कर देता है। मन में कई तरह के सवाल आने लगते हैं— ऐसे सवाल सामान्य मानवीय असुरक्षा से पैदा हो सकते हैं। इन्हें दबाने के बजाय इन्हें समझना जरूरी है। पति से सवाल-जवाब नहीं, संवाद करें इस स्थिति में सबसे जरूरी है कि कपल के बीच बातचीत आरोपों से शुरू न हो। इस तरह की बातें न कहें, जैसेकि– ऐसे सवाल सामने वाले को डिफेंसिव बना सकते हैं। इसकी बजाय अपनी भावनाएं शेयर करें। आप कह सकती हैं— “मुझे परेशानी एक्स से तुम्हारी दोस्ती से नहीं है। इस बात से है कि मुझे नहीं पता इस रिश्ते की सीमा क्या है। इससे मुझे असुरक्षा महसूस होती है। मैं चाहती हूं कि हम दोनों मिलकर ऐसी सीमाएं तय करें, जिनसे हम रिश्ते में ज्यादा सेफ महसूस करें।” शादी में बाउंड्री तय करना जरूरी हर शादी में कुछ सीमाएं होती हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि दोनों लोगों की सीमाएं एक जैसी हों। आपके लिए एक्स से निजी बातचीत असहज हो सकती है। पति के लिए यह सामान्य दोस्ती हो सकती है। इस अंतर का मतलब यह नहीं कि किसी एक की सोच गलत है। दोनों को मिलकर बीच का रास्ता निकालना होगा। उदाहरण के लिए, यह तय किया जा सकता है कि पर्सनल बातें एक्स से शेयर नहीं की जाएंगी। देर रात बात नहीं होगी। कोई ऐसी बात नहीं होगी, जिसे पार्टनर से छिपाना पड़े। बाउंड्री का मतलब साथी को कंट्रोल करना नहीं है। बाउंड्री का मतलब है कि दोनों मिलकर तय करें कि रिश्ते में कौन सा व्यवहार दोनों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक है। कब चिंता करना जरूरी? अगर पति आपकी चिंता समझने के बजाय लगातार उसे खारिज करते हैं, तो यह गंभीर बात है। खासकर तब, जब उनके व्यवहार में बदलाव भी दिखाई दे। जैसे फोन छिपाना, चैट डिलीट करना, पासवर्ड बदलना या आपके साथ भावनात्मक दूरी बढ़ना। ऐसी में समस्या सिर्फ एक्स नहीं है। समस्या विश्वास और पारदर्शिता की है। इसके उलट अगर पति खुलकर बताते हैं कि क्या बातचीत हुई, आपकी परेशानी सुनते हैं और आपको भरोसा दिलाने के लिए व्यवहार में भी पारदर्शिता रखते हैं, तो असुरक्षा की भावना धीरे–धीरे कम हो सकती है। अंत में सबसे जरूरी बात आपको न तो तुरंत यह मानने की जरूरत है कि पति आपको धोखा दे रहे हैं। न ही अपनी बेचैनी को पूरी तरह दबाने की जरूरत है। आप पहले उनके व्यवहार को देखें। फिर अपनी भावनाओं को समझें। उसके बाद दोनों मिलकर रिश्ते की सीमाएं तय करें। शादी में भरोसे का मतलब यह नहीं कि पार्टनर के जीवन में कोई पुराना व्यक्ति कभी मौजूद हो ही नहीं सकता। भरोसे का मतलब है कि पुराने रिश्तों के बावजूद वर्तमान रिश्ते को प्रिऑरिटी, सम्मान और सुरक्षा मिले। …………………………. ये खबर भी पढ़ें… रिलेशनशिप एडवाइज- शादी 3 साल बाद करनी है:अभी हम लिव-इन में रहना चाहते हैं, लेकिन मन में कई डर भी हैं, हमें क्या करना चाहिए सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आज के समय में यह सवाल बहुत से युवाओं के मन में आता है। करियर, आर्थिक जिम्मेदारियां और बदलती जीवनशैली की वजह से कई कपल शादी टालते हैं। ऐसे में कुछ लोग लिव-इन रिलेशनशिप को एक ‘ट्रायल’ की तरह देखते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
जरूरत की खबर- वाहन बीमा के नियमों में बदलाव:एक्सपर्ट से जानें जेब पर पड़ेगा कितना असर, नए इंश्योरेंस रूल्स के फायदे-नुकसान
अगर नई कार या बाइक खरीदने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए जरूरी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने नए चार पहिया वाहनों के लिए 4 साल और नए दोपहिया वाहनों के लिए 6 साल का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस अनिवार्य करने का निर्देश दिया है। पहली नजर में यह बदलाव सिर्फ बीमा से जुड़ा लग सकता है, लेकिन इसका असर जेब और फाइनेंशियल प्लानिंग दोनों पर पड़ सकता है। इससे वाहन खरीदने की कुल लागत बढ़ सकती है। साथ ही लंबे समय तक मिलने वाले बीमा कवर पर भी इसका असर पड़ सकता है। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: लोकेश माथुर, नेशनल हेड-क्लेम, स्क्वायर इंश्योरेंस ब्रोकर, जयपुर सवाल- सुप्रीम कोर्ट ने वाहन बीमा को लेकर क्या आदेश दिया है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- थर्ड पार्टी इंश्योरेंस क्या होता है? जवाब- अगर आपके वाहन से किसी व्यक्ति, उसके वाहन या उसकी संपत्ति को नुकसान पहुंचता है, तो उसकी भरपाई बीमा कंपनी करती है। इसे थर्ड पार्टी इंश्योरेंस कहते हैं। इसमें तीन पक्ष शामिल होते हैं, इसलिए इसे इसे थर्ड पार्टी इंश्योरेंस कहा जाता है। उदाहरण के लिए- आपकी कार किसी बाइक से टकरा जाती है। इससे बाइक सवार घायल हो जाता है या उसकी बाइक को नुकसान पहुंचता है। ऐसे में मुआवजा आपकी बीमा कंपनी देती है। हालांकि, इस बीमा में आपके अपने वाहन को हुए नुकसान का खर्च शामिल नहीं होता। इसके लिए अलग से कम्प्रेहेन्सिव इंश्योरेंस लेना पड़ता है। ‘मोटर वाहन अधिनियम’ के तहत भारत में सभी वाहनों के लिए थर्ड पार्टी इंश्योरेंस अनिवार्य है। सवाल- क्या पुरानी गाड़ियों पर भी यह नियम लागू होगा? जवाब- नहीं, सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश सिर्फ नए वाहनों पर लागू होगा। पुरानी गाड़ियों के लिए फिलहाल मौजूदा बीमा नियम ही लागू रहेंगे और उन्हें वैध इंश्योरेंस बनाए रखना होगा। सवाल- कोर्ट के इस फैसले का कार और बाइक मालिकों पर क्या असर पड़ेगा? जवाब- इससे नई गाड़ी खरीदने वालों को लंबी अवधि का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस लेना होगा। इससे उनकी लागत, बीमा रिन्यूअल और पॉलिसी प्रबंधन से जुड़ी स्थिति में बदलाव आएगा। दोनों पर क्या असर पड़ेगा, ग्राफिक में देखिए- सवाल- क्या इस फैसले से बीमा प्रीमियम बढ़ सकता है? जवाब- हां, वाहन खरीदते समय बीमा पर एकमुश्त खर्च बढ़ सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सालाना प्रीमियम बढ़ गया है। खर्च इसलिए बढ़ेगा क्योंकि बीमा की अवधि लंबी हो जाएगी और उसका प्रीमियम अग्रिम रूप से जमा करना होगा। सवाल- क्या इस फैसले के बाद नई कार और बाइक खरीदना महंगा हो सकता है? जवाब- हां, लेकिन यह बढ़ोतरी वाहन की बेस कीमत की वजह से नहीं होगी, बल्कि खरीद से जुड़े अनिवार्य खर्चों में बदलाव के कारण होगी। इसका वास्तविक असर वाहन के मॉडल, कीमत और इंश्योरेंस कैटेगरी के आधार पर अलग-अलग होगा। सवाल- क्या इस फैसले का असर सेकेंड-हैंड वाहनों के खरीदारों पर भी पड़ेगा? जवाब- सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश नए वाहनों के लिए है। हालांकि, सेकेंड-हैंड वाहन खरीदने वालों को यह जरूर चेक करना होगा कि वाहन का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस वैलिड है या नहीं। वाहन खरीदने के बाद बीमा पॉलिसी को नए मालिक के नाम ट्रांसफर कराना जरूरी है। अगर बीमा वैध नहीं है, तो वाहन का इस्तेमाल करने से पहले नया बीमा लेना पड़ सकता है। सवाल- लंबी अवधि का बीमा आपके फाइनेंशियल प्लान में कैसे मदद कर सकता है? जवाब- लंबी अवधि का बीमा भविष्य के एक जरूरी खर्च को पहले से तय कर देता है। इससे वाहन मालिकों को कई साल तक बीमा प्रीमियम के लिए अलग से बजट नहीं बनाना पड़ता। साथ ही हर साल प्रीमियम दरों में संभावित बदलाव का असर भी तुरंत नहीं पड़ता। इससे फाइनेंशियल गोल्स बनाना आसान हो सकता है। सवाल- 5 साल तक हर साल बीमा रिन्यू कराने और एक बार लंबी अवधि की पॉलिसी लेने में क्या फर्क है? जवाब- हर साल बीमा रिन्यू कराने पर शुरुआत में कम पैसे खर्च होते हैं, लेकिन भविष्य में प्रीमियम बढ़ने की चिंता बनी रहती है। वहीं, लंबी अवधि की पॉलिसी में शुरुआत में ज्यादा पैसा देना पड़ सकता है, लेकिन कई साल तक बीमा रिन्यू कराने की चिंता नहीं रहती। ग्राफिक में दोनों के बीच का फर्क देखिए- सवाल- अगर वाहन का बीमा लैप्स हो जाए तो क्या नुकसान हो सकता है? जवाब- इसे पाॅइंटर्स से समझिए- सवाल- बीमा की वैधता कैसे चेक करें? जवाब- समय-समय पर पॉलिसी की वैधता जांचते रहने से बीमा लैप्स होने का रिस्क कम रहता है। खासतौर पर लंबी यात्रा पर जाने, वाहन खरीदने-बेचने या बीमा एक्सपायर होने की तारीख न याद होने पर यह जानकारी जरूर चेक कर लेनी चाहिए। डिटेल ग्राफिक में देखिए- सवाल- बिना बीमा वाहन चलाना कितना महंगा पड़ सकता है? जवाब- पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- वाहन बीमा में नो-क्लेम बोनस (NCB) क्या होता है? जवाब- नो-क्लेम बोनस (NCB) वाहन बीमा में मिलने वाली एक छूट है। अगर आप पॉलिसी अवधि के दौरान कोई बीमा क्लेम नहीं करते हैं, तो बीमा कंपनी रिन्यूअल के समय प्रीमियम के ओन-डैमेज (OD) हिस्से पर छूट देती है। यह छूट आमतौर पर 20% से शुरू होती है और लगातार 5 साल तक क्लेम न करने पर 50% तक पहुंच सकती है। ध्यान रखें कि अगर आपने पॉलिसी अवधि में क्लेम लिया है, तो आमतौर पर NCB का लाभ अगले रिन्यूअल पर समाप्त हो जाता है। वहीं, पॉलिसी खत्म होने के बाद भी NCB का लाभ 90 दिनों तक सुरक्षित रहता है। यदि इस अवधि में पॉलिसी रिन्यू नहीं कराई जाती, तो यह छूट खत्म हो सकती है। सवाल- वाहन बीमा लेते समय किन बातों पर ध्यान देना चाहिए? जवाब- पॉलिसी खरीदने से पहले यह समझना जरूरी है कि उसमें क्या कवर हो रहा है और क्या नहीं। इसके अलावा, बीमा कंपनियां कई तरह के एड-ऑन कवर भी देती हैं, जो अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करते हैं। हालांकि, हर कंपनी के एड-ऑन कवर की शर्तें और सुविधाएं अलग हो सकती हैं। इसलिए कोई भी अतिरिक्त कवर लेने से पहले उसकी शर्तें जरूर पढ़नी चाहिए। सभी जरूरी सावधानियां ग्राफिक में देखिए- नई कार या बाइक खरीदते समय अब सिर्फ डाउन पेमेंट, EMI और माइलेज पर ध्यान देना काफी नहीं है। बीमा से जुड़े नियमों में हो रहे बदलावों को समझना भी उतना ही जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी कानूनी या वित्तीय परेशानी का सामना न करना पड़े। ********************** ग्राफिक्स- अंकुर बंसल …………………… ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- बारिश में बढ़ता ऑटो-कैब बुकिंग स्कैम:बुक करते हुए 11 सावधानियां बरतें, पेमेंट करते हुए 6 बातें ध्यान रखें बारिश हो रही हो, ऑफिस पहुंचने की जल्दी हो और सड़क पर कोई ऑटो या रिक्शा न दिखे, तो ज्यादातर लोग बिना ज्यादा सोचे-समझे मोबाइल निकालकर कैब बुक कर लेते हैं। उस समय बस यही चिंता होती है कि किसी तरह जल्दी गाड़ी मिल जाए। पूरी खबर पढ़ें…
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