हिंदू धर्म में नागपंचमी पर्व का विशेष महत्व होता है। श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा-आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन नागों की पूजा-अर्चना करने से सर्प भय, कालसर्प दोष और सर्पदंश जैसी बाधाओं से मुक्ति मिलती है। वहीं आज लोग नाग देवता को दूध अर्पित करते हैं और उनको स्नान कराकर पूजा आदि करते हैं। साथ ही नाग देवता से सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं। तो आइए जानते हैं नाग पंचमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...
तिथि और मुहूर्त
वैदिक पंचांग के मुताबिक 16 अगस्त की शाम 04:51 मिनट से पंचमी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं 17 अगस्त ती शाम 05:00 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से आज यानी की 17 अगस्त को नागपंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त 06:15 मिनट से लेकर 08:31 मिनट तक है।
क्यों की जाती है नाग देवता की पूजा
भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों से नागों का संबंध जुड़ा माना गया है। जहां भगवान शिव के गले में वासुकी नाग सुशोभित होते हैं। तो वहीं शेषनाग भगवान विष्णु की शैया हैं। श्रीकृष्ण के जन्म के बाद शेषनाग ने उनको और वासुदेव को यमुना पार कराने में मदद की थी। इसके अलावा समुद्र मंथन में भी वासुकी नाग की अहम भूमिका मानी जाती है। यह दिन नाग देवताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने का पर्व है।
पूजन विधि
इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद गाय के गोबर से नाग देवता का चित्र बनाएं और उनका आह्वान करें। अगर आपको व्रत करना हो, तो व्रत का संकल्प करें और फिर गुलाल, अबीर, मेहंदी, मेवा, फूल और दूध आदि अर्पित करें। इसके बाद मंत्रों का जाप करें और पूजा के बाद मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।
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भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व का अपना विशेष महत्व है। इन्हीं पावन पर्वों में हरियाली तीज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। वर्षा ऋतु के आगमन से जब धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब प्रकृति का यह अनुपम सौंदर्य हरियाली तीज के उत्सव को और भी मनोहारी बना देता है। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए सौभाग्य, प्रेम, समृद्धि और आनंद का प्रतीक माना जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी दिव्य मिलन की स्मृति में हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु एवं सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएँ योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं और माता पार्वती तथा भगवान शिव की पूजा करती हैं।
हरियाली तीज का उत्सव पूरे देश में उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है। महिलाएँ हरे रंग के वस्त्र धारण करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं, चूड़ियाँ पहनती हैं और पारंपरिक आभूषणों से श्रृंगार करती हैं। बाग-बगीचों में झूले डाले जाते हैं, लोकगीत गाए जाते हैं और नृत्य के माध्यम से उत्सव की खुशी व्यक्त की जाती है। विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में इस पर्व की भव्यता देखने योग्य होती है। अनेक स्थानों पर भगवान शिव और माता पार्वती की शोभायात्राएँ भी निकाली जाती हैं।
यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। वर्षा ऋतु में चारों ओर फैली हरियाली हमें वृक्षों और वनस्पतियों के महत्व का स्मरण कराती है। हरियाली तीज हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा देती है।
आज के आधुनिक जीवन में भी हरियाली तीज की प्रासंगिकता बनी हुई है। यह पर्व परिवार में प्रेम, विश्वास और सौहार्द को मजबूत करता है तथा हमारी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। नई पीढ़ी को भी इस पर्व के सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराना आवश्यक है। हरियाली तीज भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं, प्रकृति-प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का अनुपम उत्सव है। यह पर्व जीवन में उल्लास, प्रेम, आस्था और हरियाली का संदेश देता है।
- शुभा दुबे
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