नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ सैकड़ों जिंदगियां नहीं लील लीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और पड़ोसी देशों के रिश्तों का एक बेहद महत्वपूर्ण आईना भी सामने रख दिया है। बुधवार को नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद मलबे के साथ आए भयावह जलप्रवाह ने रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई। सड़कें, पुल, मकान और जलविद्युत परियोजनाएं बह गईं। इस आपदा ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को भी ऐसा झटका दिया कि अब वही नेपाल, जो मानसून में भारत को बिजली बेचता है, जरूरत पड़ने पर भारत से बिजली मांग सकता है।
यही इस त्रासदी का सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण पहलू है। नेपाल की करीब 4,300 मेगावाट की स्थापित बिजली क्षमता में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी जलविद्युत की है। बाढ़ ने करीब 13 जलविद्युत संयंत्रों और एक सौर परियोजना को प्रभावित किया और लगभग 360 मेगावाट उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा। भारत को बिजली देने वाला 14 मेगावाट का देविघाट संयंत्र भी इसकी चपेट में आया। 26 अगस्त को बाढ़ के दिन भारत नेपाल से एक समय में 963.4 मेगावाट तक बिजली ले रहा था, लेकिन अगले ही दिन बिजली आपूर्ति लगभग आधी रह गई।
और अब तस्वीर उलट सकती है। आमतौर पर गर्मियों में भारत नेपाल से बिजली खरीदता है और सर्दियों में, जब नेपाल की जलविद्युत उत्पादन क्षमता घटती है, भारत नेपाल को बिजली देता है। लेकिन इस बार आपदा ने परिस्थितियां ऐसी बना दी हैं कि मानसून के इसी मौसम में भारत को नेपाल की मदद के लिए बिजली निर्यात करनी पड़ सकती है। दोनों देशों के बीच पहले से ही 1,000 मेगावाट की आयात-निर्यात क्षमता है, जिसे बढ़ाकर 1,400 मेगावाट से अधिक करने पर सहमति भी बन चुकी है।
लेकिन बिजली से बड़ी कहानी भरोसे की है। आपदा तिब्बत से लगे इलाके में शुरू हुई। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार इसका संबंध ग्लेशियर के ढहने और भारी मलबे के नदी में आने से है। चीन ने यह आपदा पैदा की या नहीं, इसका जवाब तो वैज्ञानिक ही देंगे लेकिन आम लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि हिमालय के इस संवेदनशील भूभाग में सीमा के दोनों ओर होने वाली गतिविधियों, बुनियादी ढांचे और आपदा-प्रबंधन को लेकर भारत, नेपाल और चीन के बीच पारदर्शिता कितनी है? हालात इतने गंभीर थे कि तिब्बत की ओर एक नए ‘बैरियर लेक’ के बनने और उसके टूटने की आशंका ने नेपाल में फिर खतरे की घंटी बजा दी।
इसी संकट में भारत और चीन के रवैये का फर्क नेपाल के सामने साफ दिखाई देता है। बाढ़ के कुछ ही घंटों के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बात की और हरसंभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया। उसी रात भारतीय वायुसेना का C-130J विमान हिंडन से काठमांडू पहुंचा और 10 टन राहत सामग्री तथा जरूरी दवाइयां भेजी गईं। इसके बाद राहत सामग्री की कुल मात्रा 47 टन से अधिक हो गई। भारत ने 24 घंटे काम करने वाला नियंत्रण कक्ष और हेल्पलाइन भी सक्रिय की। नेपाल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और जनता जिस तरह भारत का शुक्रिया कर रहे हैं उससे उनका भारत के प्रति विश्वास भी परिलक्षित हो रहा है।
देखा जाये तो यही अंतर है, मुसीबत में कौन आपके साथ खड़ा होता है और कौन सिर्फ सीमा के उस पार मौजूद रहता है।
नेपाल के लिए यह समय किसी देश के पक्ष में राजनीतिक नारा लगाने का नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हित को ठंडे दिमाग से देखने का है। भारत से नेपाल का रिश्ता सिर्फ बिजली खरीदने-बेचने का नहीं है। खुली सीमा, गहरे सामाजिक रिश्ते, व्यापार, रोजगार, धार्मिक यात्राएं और रोजमर्रा की मानवीय आवाजाही दोनों देशों को असाधारण रूप से जोड़ती है। जब नेपाल में संकट आया तो भारत ने इन रिश्तों को कागज पर नहीं, जमीन और आसमान पर साबित किया।
शायद नेपाल को इस संकट में एक पुरानी बात नए सिरे से समझ आई होगी, दोस्त वही नहीं जो सामान्य दिनों में साथ दिखे, दोस्त वह है जो आपदा में सबसे पहले पहुंच जाए।
और चीन के साथ संबंधों को लेकर भी काठमांडू को यह तय करना होगा कि रणनीतिक साझेदारी का अर्थ केवल बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और निवेश नहीं है। असली साझेदारी संकट के समय दिखाई देती है। भारत और चीन के बीच नेपाल को किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन नेपाल यह जरूर देख सकता है कि उसके लिए कौन-सा पड़ोसी भरोसे का स्थायी आधार है।
बहरहाल, इस बाढ़ ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को झकझोर दिया है, लेकिन शायद इससे भी बड़ा संदेश उसकी विदेश नीति के लिए आया है। हिमालय ने एक बार फिर याद दिलाया है कि नक्शे पर सबसे नजदीक पड़ोसी ही संकट की घड़ी में सबसे उपयोगी पड़ोसी भी साबित हो सकता है।
नीरज कुमार दुबे
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राष्ट्रीय खेल दिवस केवल एक महान खिलाड़ी की स्मृति को नमन करने का अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्र की खेल-चेतना को जगाने एवं खेल आयामों को नये शिखर देने का दिन है। 29 अगस्त को मनाया जाने वाला यह दिवस हॉकी के महानायक मेजर ध्यानचंद की जयंती से जुड़ा है। खेल किसी राष्ट्र की शक्ति का केवल प्रदर्शन नहीं होते, वे उसके आत्मविश्वास, अनुशासन, सामूहिकता और वैश्विक प्रतिष्ठा के दर्पण भी होते हैं। आज जब भारत 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी तक विकसित राष्ट्र बनने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तब खेलों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ना समय की अनिवार्यता है। स्वस्थ नागरिक, अनुशासित युवा, विश्वस्तरीय खिलाड़ी और खेल-संस्कृति से संपन्न समाज-ये विकसित भारत की आधारशिलाएं हैं।
29 अगस्त 1905 को जन्मे मेजर ध्यानचंद भारतीय हॉकी के ऐसे जादूगर थे, जिन्होंने अपनी स्टिक से केवल गोल नहीं किए, बल्कि दुनिया के खेल मानचित्र पर भारत की पहचान अंकित की। 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम की स्वर्णिम सफलता में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा। उनके खेल में कौशल के साथ राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और समर्पण का अद्भुत समन्वय था। उनके सम्मान में राष्ट्रीय खेल दिवस मनाना वास्तव में उस खेल-दर्शन को याद करना है जिसमें प्रतिभा से बड़ा परिश्रम और व्यक्तिगत उपलब्धि से बड़ा राष्ट्र का गौरव होता है। ध्यानचंद की विरासत आज के खिलाड़ियों को यह संदेश देती है कि खेल का अंतिम लक्ष्य केवल पदक नहीं, बल्कि देश के लिए सम्मान अर्जित करना है। निश्चित तौर पर खेल अब मनोरंजन नहीं, राष्ट्रीय शक्ति हैं। एक समय भारत में खेलों को पढ़ाई या रोजगार के विकल्प के रूप में गंभीरता से नहीं देखा जाता था। आज परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। क्रिकेट से आगे बढ़कर एथलेटिक्स, बैडमिंटन, कुश्ती, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, भारोत्तोलन, हॉकी, टेबल टेनिस, तीरंदाजी, शतरंज और अनेक अन्य खेलों में भारतीय खिलाड़ी विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं। नीरज चोपड़ा ने एथलेटिक्स में ओलंपिक स्वर्ण जीतकर भारतीय युवाओं को बताया कि ट्रैक और फील्ड में भी भारत विश्व विजेता बन सकता है। पी. वी. सिंधु ने बैडमिंटन में लगातार दो ओलंपिक पदक जीतकर नई पीढ़ी के लिए आदर्श स्थापित किया। मनु भाकर, डी. गुकेश, मीराबाई चानू, निकहत जरीन, लवलीना बोरगोहेन, अवनि लेखरा, हरमनप्रीत सिंह और अनेक खिलाड़ियों ने अलग-अलग खेलों में भारतीय प्रतिभा की व्यापकता सिद्ध की है। यह बदलाव किसी एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि बदलती हुई राष्ट्रीय खेल-संस्कृति का संकेत है।
टोक्यो 2020 में भारत ने सात पदक जीते और पेरिस 2024 में छह पदक हासिल किए। पदकों की संख्या भले ही अभी विकसित खेल राष्ट्रों के बराबर न हो, लेकिन भारतीय खेलों की चौड़ाई और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता लगातार बढ़ी है। पैरालंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन तो विशेष रूप से प्रेरणादायी रहा है। उन्होंने यह मिथक तोड़ा है कि शारीरिक सीमाएं सफलता की सीमा निर्धारित करती हैं। भारत की वास्तविक उपलब्धि केवल पदकों में नहीं है। आज छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से निकलने वाले युवा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यह खेलों के लोकतंत्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खेलों को राष्ट्रीय विकास और युवा सशक्तीकरण के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में सामने रखा है। ‘खेलो इंडिया’ जैसी पहल ने विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान तथा खेल अवसंरचना के विकास को गति दी है। टॉप्स-टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम के माध्यम से संभावित ओलंपिक पदक विजेताओं को लक्षित सहायता दी जाती है। खेलो इंडिया यूथ गेम्स और विश्वविद्यालय खेलों ने युवाओं को प्रतिस्पर्धात्मक मंच उपलब्ध कराया है। खिलाड़ियों के प्रशिक्षण, पोषण, विदेशी प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, वैज्ञानिक सहयोग और आर्थिक सहायता पर बढ़ता ध्यान इस बात का संकेत है कि खेल नीति अब केवल प्रतियोगिता आयोजित करने तक सीमित नहीं है। प्रतिभा की खोज से लेकर उसे विश्वस्तरीय खिलाड़ी बनाने तक एक समग्र खेल-परिसंस्था तैयार करने की कोशिश हो रही है।
जब हम 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएंगे, तब विकसित भारत की तस्वीर केवल ऊंची जीडीपी, आधुनिक सड़कों, अत्याधुनिक तकनीक और विश्वस्तरीय शहरों से पूरी नहीं होगी। विकसित भारत का वास्तविक अर्थ होगा-स्वस्थ नागरिक, ऊर्जावान युवा, मानसिक रूप से मजबूत समाज और विश्व मंच पर आत्मविश्वास से खड़ा राष्ट्र। इस लक्ष्य में खेलों की भूमिका निर्णायक है। खेल युवाओं को नशे, निष्क्रिय जीवनशैली और दिशाहीनता से दूर रख सकते हैं। वे समयबद्धता, लक्ष्य-निर्धारण, हार को स्वीकार कर पुनः प्रयास करने की क्षमता और नेतृत्व सिखाते हैं। खेल मैदान लोकतंत्र की तरह हैं-यहां प्रदर्शन, अनुशासन और योग्यता ही निर्णायक होते हैं। आज देश में फिटनेस और सक्रिय जीवनशैली को बढ़ावा देने की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि आर्थिक विकास तभी सार्थक होगा जब उसकी ऊर्जा स्वस्थ मानव संसाधन में परिवर्तित हो। फिट भारत ही उत्पादक भारत और शक्तिशाली भारत का आधार बन सकता है।
खेलों की एक और बड़ी शक्ति है-वे सीमाओं के पार संवाद स्थापित करते हैं। मैदान में प्रतिद्वंद्वी देश आमने-सामने होते हैं, लेकिन खेल के बाद वही खिलाड़ी एक-दूसरे के अनुभव, संस्कृति और मानवीय भावनाओं को समझते हैं। ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं देशों के बीच संवाद और सद्भाव का माध्यम बनती हैं। भारत की खेल उपलब्धियां उसकी सॉफ्ट पावर को मजबूत करती हैं। जब भारतीय खिलाड़ी विश्व मंच पर तिरंगा फहराते हैं और राष्ट्रगान गूंजता है, तो करोड़ों भारतीयों में एक साथ गर्व और एकता की अनुभूति पैदा होती है। खेलों ने भारत को दुनिया के सामने एक युवा, आत्मविश्वासी और प्रतिभाशाली राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन उपलब्धियों के बावजूद भारत को खेल महाशक्ति बनने के लिए लंबा रास्ता तय करना है। गांव-गांव तक अच्छे मैदान, प्रशिक्षित कोच, खेल विज्ञान केंद्र, पोषण सुविधाएं और आधुनिक उपकरण पहुंचाने होंगे। खेलों को केवल कुछ लोकप्रिय खेलों तक सीमित रखने के बजाय ओलंपिक और पारंपरिक भारतीय खेलों की व्यापक श्रृंखला को बढ़ावा देना होगा। स्कूलों में खेल का समय बढ़ाना, प्रतिभाशाली बच्चों की प्रारंभिक उम्र में पहचान करना और उन्हें शिक्षा के साथ खेल का समान अवसर देना आवश्यक है। महिला खिलाड़ियों, दिव्यांग खिलाड़ियों और आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाओं के लिए विशेष अवसर और सुरक्षित वातावरण भी सुनिश्चित करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन मानसिकता में होना चाहिए। खेल में हार असफलता नहीं, अगली जीत की तैयारी है। यह भावना यदि शिक्षा और जीवन में भी उतर जाए तो भारत की युवा शक्ति असाधारण परिणाम दे सकती है।
खेल केवल पदक नहीं देते, वे रोजगार और अर्थव्यवस्था भी बनाते हैं। स्टेडियम, खेल उपकरण, स्पोर्ट्स टेक्नोलॉजी, फिटनेस उद्योग, खेल प्रसारण, पर्यटन, कोचिंग, स्पोर्ट्स मेडिसिन और डेटा एनालिटिक्स जैसे अनेक क्षेत्रों में नए अवसर पैदा हो रहे हैं। भारत में खेल-आधारित स्टार्टअप और तकनीकी नवाचारों की संभावनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। अर्थात खेलों में निवेश केवल खिलाड़ियों पर खर्च नहीं, बल्कि भविष्य की मानव पूंजी और नई अर्थव्यवस्था में निवेश है। इसलिये राष्ट्रीय खेल दिवस हमें एक महत्वपूर्ण संकल्प लेने का अवसर देता है-हर बच्चा खेले, हर युवा फिट रहे और हर प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर मिले। हमें ऐसी खेल संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें अभिभावक खेल को समय की बर्बादी न समझें, विद्यालय खेल को अतिरिक्त गतिविधि न मानें और समाज खिलाड़ी को केवल पदक जीतने के बाद सम्मान न दे।
2047 का विकसित भारत यदि दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होना चाहता है तो उसे खेलों में भी अग्रणी राष्ट्र बनना होगा। आर्थिक शक्ति और खेल शक्ति एक-दूसरे की पूरक हैं। जिस देश के युवा मैदान में लक्ष्य साधना सीखते हैं, वे जीवन में भी बड़े लक्ष्य हासिल करने की क्षमता रखते हैं। राष्ट्रीय खेल दिवस इसलिए केवल ध्यानचंद को श्रद्धांजलि का दिवस नहीं; यह भारत की युवा शक्ति को जगाने, खेल को जीवन का हिस्सा बनाने और विकसित भारत के निर्माण में खेलों को राष्ट्रीय अभियान बनाने का दिवस है। आज आवश्यकता है कि हम ध्यानचंद की खेल-प्रतिभा, नीरज की दृढ़ता, सिंधु के संघर्ष, मनु भाकर के आत्मविश्वास और हमारे हजारों उभरते खिलाड़ियों के सपनों को एक राष्ट्रीय संकल्प में बदलें। 2047 का भारत केवल आर्थिक रूप से समृद्ध न हो, बल्कि शरीर से स्वस्थ, मन से मजबूत, चरित्र से अनुशासित और खेल के मैदान में विश्वविजयी भारत बने-यही राष्ट्रीय खेल दिवस का सबसे सार्थक संदेश है।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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