Nepal Floods: नेपाल की तबाही.. भारत तक आ गई ?। Shorts #shorts
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Explainer: होर्मुज संकट और महंगे तेल के बीच भी भारत की GDP 7.8%, आखिर कैसे अर्थव्यवस्था ने शानदार प्रदर्शन किया?
GDP Growth: मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका के बीच जंग, होर्मुज स्ट्रेट पर संकट, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और दुनिया भर में आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारत की अर्थव्यवस्था ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून में भारत की रियल GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही. यह आंकड़ा इसलिए खास है क्योंकि भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े संघर्ष का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
वित्त मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही की 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ RBI के 7 फीसदी के अनुमान से काफी ज्यादा है. अर्थशास्त्रियों का अनुमान भी करीब 7.1 से 7.5 फीसदी के बीच था. यानी भारत ने उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया. हालांकि जनवरी-मार्च तिमाही में GDP ग्रोथ संशोधित होकर 8.6 फीसदी रही थी, लेकिन वैश्विक संकट के बीच 7.8 फीसदी की रफ्तार को भी मजबूत माना जा रहा है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब दुनिया महंगे तेल और युद्ध के खतरे से परेशान है तो भारत की अर्थव्यवस्था इतनी तेज रफ्तार से कैसे बढ़ रही है?
महंगे तेल का असर कहां गया?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने पर भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा तेल की सप्लाई और उसकी कीमत को लेकर होता है.
अगर होर्मुज स्ट्रेट से तेल की आवाजाही बाधित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत तेजी से बढ़ सकती है. इससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा. पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं और परिवहन लागत बढ़ने का असर लगभग हर क्षेत्र पर पड़ सकता है.
तेल सिर्फ गाड़ियों के लिए ईंधन नहीं है. एविएशन फ्यूल, प्लास्टिक, केमिकल, बिजली और कई औद्योगिक उत्पादों की लागत भी ऊर्जा कीमतों से प्रभावित होती है. इसलिए महंगा तेल महंगाई बढ़ाने के साथ कंपनियों के मुनाफे और निवेश पर भी असर डाल सकता है.
यही वजह थी कि मिडिल ईस्ट में संघर्ष शुरू होने के बाद भारत की GDP ग्रोथ को लेकर चिंता बढ़ गई थी. लेकिन फिलहाल घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती ने इस बाहरी झटके का काफी असर कम कर दिया है.
भारत की अर्थव्यवस्था को किन चीजों से मिला सहारा?
- घरेलू खपत: देश के भीतर लोगों की खरीदारी और सेवाओं की मांग मजबूत बनी रही.
- मैन्युफैक्चरिंग: अप्रैल-जून तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ 9.2 फीसदी रही.
- निजी निवेश: कंपनियों ने वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद निवेश और क्षमता विस्तार जारी रखा.
- सर्विस सेक्टर: बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, IT और दूसरे सेवा क्षेत्रों ने आर्थिक गतिविधियों को सहारा दिया.
- सरकारी Capex: सड़क, रेलवे, डिफेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च से मांग और उत्पादन को बढ़ावा मिला.
- तेल आयात में विविधता: भारत ने अलग-अलग स्रोतों से कच्चा तेल खरीदकर किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता का जोखिम कम करने की कोशिश की.
- नीतिगत समर्थन: टैक्स और दूसरे आर्थिक फैसलों ने खपत तथा निवेश को सहारा दिया.
घरेलू खपत बनी सबसे बड़ी ताकत
भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल घरेलू खपत है. अमेरिका, चीन या कुछ यूरोपीय देशों की तरह भारत पूरी तरह निर्यात पर निर्भर नहीं है. इसलिए जब वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ती है तो देश के भीतर की मांग अर्थव्यवस्था को संभाल सकती है.
अप्रैल-जून तिमाही में कारों की बिक्री, FMCG यानी रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले सामान और विभिन्न सेवाओं की मांग बनी रही. लोगों की खपत जारी रहने से कंपनियों की बिक्री और उत्पादन पर बड़ा नकारात्मक असर नहीं पड़ा.
यही घरेलू मांग भारत के लिए एक तरह के सुरक्षा कवच की तरह काम करती है. विदेशों में संकट के बावजूद अगर भारत में करोड़ों लोग सामान और सेवाएं खरीदते रहते हैं तो आर्थिक गतिविधियां चलती रहती हैं.
मैन्युफैक्चरिंग ने पकड़ी रफ्तार
GDP आंकड़ों की सबसे महत्वपूर्ण बात मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की मजबूती है. अप्रैल-जून तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ 9.2 फीसदी रही. पिछले साल इसी अवधि में यह करीब 8.3 फीसदी थी.
यानी वैश्विक सप्लाई चेन और भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की फैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ा. मैन्युफैक्चरिंग की मजबूती का असर सिर्फ GDP पर नहीं पड़ता. इससे रोजगार, कच्चे माल की मांग, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और निवेश जैसे कई क्षेत्रों को भी फायदा मिलता है.
अगर उत्पादन बढ़ता है तो कंपनियों को नई मशीनरी और क्षमता में निवेश की जरूरत पड़ती है. इससे निजी निवेश को भी गति मिल सकती है. इस लिहाज से मैन्युफैक्चरिंग का मजबूत प्रदर्शन भारत की GDP ग्रोथ की गुणवत्ता के लिए भी सकारात्मक संकेत है.
निजी निवेश ने बढ़ाया भरोसा
इस तिमाही में निजी निवेश की तेजी भी महत्वपूर्ण रही. उपलब्ध विश्लेषणों के मुताबिक निजी निवेश की वृद्धि पिछली अवधि के करीब 5.8 फीसदी से बढ़कर लगभग 12 फीसदी तक पहुंची.
इसका मतलब है कि कंपनियों ने वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद निवेश को पूरी तरह रोकने के बजाय कारोबार बढ़ाने और उत्पादन क्षमता मजबूत करने की कोशिश की.
निजी निवेश में तेजी को अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत के तौर पर देखा जाता है. इसका मतलब है कि कंपनियों को भविष्य में मांग और कारोबार की संभावनाओं पर भरोसा बना हुआ है.
अगर सिर्फ सरकार खर्च करती और निजी कंपनियां निवेश से पीछे हट जातीं तो GDP ग्रोथ की मजबूती को लेकर सवाल खड़े हो सकते थे. लेकिन निजी निवेश में बढ़ोतरी बताती है कि आर्थिक गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ रही है.
सर्विस सेक्टर ने भी दिया बड़ा सहारा
भारत की अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. IT, बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट, कम्युनिकेशन और कई अन्य सेवाएं देश की GDP में बड़ा योगदान देती हैं.
अप्रैल-जून तिमाही में वित्तीय सेवाओं में करीब 12.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. बैंकिंग और फाइनेंस के साथ घरेलू सेवाओं की मांग ने भी अर्थव्यवस्था को मजबूत रखा.
भारत का सर्विस सेक्टर वैश्विक बाजार से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा घरेलू मांग पर निर्भर करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर पूरे सर्विस सेक्टर को एक साथ प्रभावित नहीं कर पाया.
सरकारी Capex भी बना मजबूत सहारा
सरकार की ओर से इंफ्रास्ट्रक्चर और पूंजीगत खर्च यानी Capex पर लगातार जोर दिया जा रहा है. सड़क, रेलवे, डिफेंस, बिजली और दूसरी बड़ी परियोजनाओं पर सरकारी खर्च से आर्थिक गतिविधियों को सीधा फायदा मिलता है.
जब सरकार किसी सड़क, रेलवे लाइन या दूसरी परियोजना पर खर्च करती है तो इसका फायदा केवल निर्माण कंपनी को नहीं मिलता. सीमेंट, स्टील, इंजीनियरिंग, परिवहन और लॉजिस्टिक्स जैसे कई सेक्टरों में मांग पैदा होती है.
इसलिए सरकारी Capex ने घरेलू खपत और निजी निवेश के साथ मिलकर GDP को अतिरिक्त मजबूती दी.
टैक्स और नीतिगत फैसलों का भी असर
घरेलू मांग को मजबूत करने में सरकार की ओर से किए गए टैक्स बदलावों और दूसरे नीतिगत उपायों की भी भूमिका रही है. अगर लोगों के हाथ में खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा रहता है तो खपत बढ़ सकती है.
इसी तरह कंपनियों की वित्तीय स्थिति बेहतर होने पर वे निवेश और क्षमता विस्तार के फैसले ले सकती हैं. इन नीतियों का पूरा असर तुरंत एक तिमाही में नहीं दिखता, लेकिन समय के साथ ये आर्थिक गतिविधियों को मजबूत कर सकते हैं.
RBI की रिपोर्टिंग में भी संकेत मिले हैं कि वैश्विक जोखिमों के बावजूद भारत में घरेलू आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के कई हाई-फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स भी सकारात्मक रहे हैं.
होर्मुज संकट के बीच भारत ने कैसे संभाला तेल मोर्चा?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है. यहां से तेल और गैस की बड़ी मात्रा गुजरती है. इसलिए इस समुद्री रास्ते में लंबे समय तक रुकावट आने पर पूरी दुनिया में ऊर्जा की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है.
भारत के लिए यह खतरा और बड़ा है क्योंकि देश तेल का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में भारत ने तेल खरीद के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है.
पश्चिम एशिया से सप्लाई में जोखिम बढ़ने पर रूस जैसे दूसरे स्रोतों से खरीद बढ़ाना भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण विकल्प रहा है. इससे भारतीय रिफाइनरियों को कच्चे तेल की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिली.
हालांकि यह रणनीति पूरी तरह जोखिम खत्म नहीं करती. अगर होर्मुज में लंबे समय तक बड़ी बाधा आती है तो तेल की कीमत, शिपिंग और बीमा लागत पर बड़ा असर पड़ सकता है.
आगे भारत के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं?
7.8 फीसदी की GDP ग्रोथ निश्चित रूप से राहत देने वाली है, लेकिन इसे यह संकेत नहीं माना जा सकता कि भारत की आर्थिक चुनौतियां खत्म हो गई हैं.
सबसे बड़ा खतरा कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा है. अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध लंबा खिंचता है और तेल लगातार महंगा रहता है तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा. इससे रुपये पर दबाव आ सकता है और चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है.
महंगाई भी एक बड़ी चुनौती है. महंगा ईंधन परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ा सकता है. अगर इसके साथ खाद्य महंगाई भी बढ़ती है तो आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ेगा.
ऐसे माहौल में RBI के सामने भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं. केंद्रीय बैंक को महंगाई और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन बनाना होगा. ब्याज दरों में बदलाव का असर कर्ज, निवेश और खपत पर पड़ सकता है.
क्या 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ टिकाऊ है?
यही आने वाले महीनों का सबसे बड़ा सवाल होगा. पहली तिमाही के आंकड़े मजबूत हैं, लेकिन सिर्फ एक तिमाही के आधार पर पूरी अर्थव्यवस्था की भविष्य की दिशा तय नहीं की जा सकती.
अगर घरेलू खपत मजबूत बनी रहती है, निजी निवेश बढ़ता है, मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार जारी रहती है और सरकारी Capex बना रहता है तो भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत रह सकती है.
लेकिन अगर तेल की कीमतों में बहुत तेज उछाल आता है, होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बाधित रहता है या वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी मंदी आती है तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा.
दुनिया को भारत ने क्या संदेश दिया?
भारत की 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ का सबसे बड़ा संदेश यह है कि देश की अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता पहले की तुलना में मजबूत हुई है.
मिडिल ईस्ट संकट और महंगे तेल जैसे जोखिमों के बावजूद घरेलू खपत, मैन्युफैक्चरिंग, निजी निवेश, सर्विस सेक्टर और सरकारी Capex ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया.
हालांकि असली परीक्षा अभी बाकी है. अगर मिडिल ईस्ट का संकट लंबा चलता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो भारत के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.
फिलहाल 7.8 फीसदी की GDP ग्रोथ भारत के लिए बड़ी राहत और मजबूत संकेत है. इसने दिखाया है कि वैश्विक संकट के बीच भी भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था में पर्याप्त ताकत मौजूद है. आने वाली तिमाहियां यह तय करेंगी कि यह मजबूती कितनी टिकाऊ है और भारत इस वैश्विक संकट को अपनी आर्थिक क्षमता और आत्मनिर्भरता साबित करने के अवसर में कितना बदल पाता है.
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