ऑस्ट्रेलियाई तेज़ गेंदबाज जोश हेजलवुड अपनी आक्रामकता कम करने के मूड में नहीं हैं। चोट के कारण लंबे समय तक बाहर रहने के बाद उन्होंने शानदार वापसी की है और अब उनके सामने टेस्ट सीज़न और कुछ व्हाइट-बॉल मैच हैं। सितंबर में ज़िम्बाब्वे और दक्षिण अफ़्रीका के वनडे दौरों के लिए हेज़लवुड को वनडे टीम में शामिल किया जाएगा। टीम का ऐलान मंगलवार को होगा और इस तेज़ गेंदबाज़ ने हर सीरीज में तीन में से दो वनडे मैच खेलने का मन बनाया है।
हेजलवुड ने डार्विन में बांग्लादेश के खिलाफ़ शानदार वापसी की; एक साल से ज़्यादा समय बाद इस फ़ॉर्मेट में अपने पहले ही मैच में उन्होंने सात विकेट लिए (जिसमें एक बार छह विकेट लेना भी शामिल था)। मैके में भी उनका प्रदर्शन प्रभावशाली रहा, हालांकि तेज़ गेंदबाज़ों के दो दिन के दबदबे के दौरान वे सिर्फ़ एक विकेट ही ले पाए। सिडनी में 'प्ले क्रिकेट वीक' के लॉन्च के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए हेज़लवुड ने क्रिकइन्फो के हवाले से कहा कि मुझे लगता है कि मेरे लिए आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि मैं जितना हो सके, उतना खेलूं।
उन्होंने आगे कहा कि उस टेस्ट सीरीज़ से पहले हमारी दो वनडे सीरीज़ हैं, इसलिए हो सकता है कि हम उनमें से हर एक में तीन में से दो मैच खेलें। मुझे लगता है कि एक बार जब आप उस इंटेंसिटी (तीव्रता) पर पहुँच जाते हैं, जिस पर हम सभी अभी हैं, तो कोशिश यही होती है कि उसे जितना हो सके बनाए रखा जाए। हेज़लवुड, जो घरेलू एशेज़ और ICC T20 वर्ल्ड कप में नहीं खेल पाए थे, अपनी मौजूदा फ़िटनेस से बहुत खुश हैं।
उन्होंने कहा कि मैं अपनी मौजूदा फ़िटनेस से बहुत खुश हूँ। मैंने काफ़ी मेहनत की है, शायद उस सीरीज़ से पहले के 10 हफ़्तों में; यह शायद आने वाले समय से पहले हमारा आखिरी बड़ा ट्रेनिंग ब्लॉक था। बिना किसी चोट के इससे बाहर निकलकर बहुत अच्छा लग रहा है। ज़िम्बाब्वे और दक्षिण अफ़्रीका के साथ होने वाली वनडे सीरीज़ के लिए ऑस्ट्रेलिया की व्हाइट-बॉल टीमें अलग-अलग होंगी, क्योंकि कप्तान पैट कमिंस के सिर्फ़ दक्षिण अफ़्रीका वाली सीरीज़ में खेलने की संभावना है। चयनकर्ता भारत के साथ होने वाले ऑस्ट्रेलिया A के रेड-बॉल टूर को लेकर भी कुछ अलग सोच सकते हैं; कुछ खिलाड़ी वनडे सीरीज़ के बजाय उस सीरीज़ में खेल सकते हैं, ताकि अगले साल जनवरी में भारत में होने वाली बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफ़ी के लिए तैयारी की जा सके।
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भारतीय संस्कृति पर्वों और उत्सवों की संस्कृति है। प्रत्येक त्योहार अपने साथ धार्मिक आस्था, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक परंपराओं का संदेश लेकर आता है। इन्हीं प्रमुख पर्वों में कजरी तीज का विशेष स्थान है। यह पर्व मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ भागों में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत विवाहित महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य तथा अविवाहित कन्याओं के लिए मनोवांछित वर की प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।
कजरी तीज का महत्व
कजरी तीज को सातूड़ी तीज या बूढ़ी तीज भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएँ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना कर वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि तथा परिवार के मंगल की कामना करती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। उसी तप, समर्पण और अटूट विश्वास की स्मृति में यह व्रत रखा जाता है।
पूजा-विधि
कजरी तीज के दिन महिलाएँ प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेती हैं। घरों और मंदिरों में भगवान शिव तथा माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। कई स्थानों पर मिट्टी से प्रतिमाएँ बनाकर उनकी आराधना की जाती है। पूजा में फल, फूल, दूर्वा, बेलपत्र तथा विशेष रूप से सत्तू का भोग लगाया जाता है। रात्रि में कथा-श्रवण और भजन-कीर्तन के साथ व्रत का समापन किया जाता है।
लोकगीत और सांस्कृतिक परंपरा
कजरी तीज का सबसे आकर्षक पक्ष कजरी लोकगीत हैं। वर्षा ऋतु की मादकता, विरह, प्रेम और प्रकृति की सुंदरता का मनोहारी चित्रण इन गीतों में मिलता है। गाँवों में महिलाएँ समूह बनाकर झूले झूलती हैं और कजरी गीत गाती हैं। इन गीतों में लोकजीवन की भावनाएँ, पारिवारिक स्नेह और भारतीय संस्कृति की आत्मीयता झलकती है।
कजरी तीज केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाला उत्सव भी है। यह पर्व पति-पत्नी के पारस्परिक विश्वास, प्रेम और समर्पण को सुदृढ़ करता है। साथ ही महिलाओं को एक-दूसरे से मिलने, लोकगीतों और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का अवसर प्रदान करता है। यह पर्व प्रकृति, वर्षा ऋतु और हरियाली के प्रति सम्मान का भी संदेश देता है।
कजरी तीज भारतीय लोकजीवन की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यह पर्व नारी की श्रद्धा, धैर्य, समर्पण और पारिवारिक मूल्यों का उत्सव है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच भी कजरी तीज हमारी परंपराओं, लोककला और सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
शुभा दुबे
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