जापान: 11 साल बाद जन्मदर में मामूली सुधार, इस साल छह महीने में 3.42 लाख बच्चों का जन्म
टोक्यो, 29 अगस्त (आईएएनएस)। जापान में बुजुर्ग होती आबादी और लगातार घटती जन्म दर के बीच थोड़ी राहत की खबर सामने आई है। ये खुशखबरी एक दशक से अधिक समय बाद सुनने को मिली है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से जून 2026 के दौरान देश में 3,42,068 बच्चों का जन्म हुआ, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 0.8 प्रतिशत अधिक है। इसमें विदेशी नागरिकों के यहां जन्मे बच्चे भी शामिल हैं।
क्योडो न्यूज एजेंसी ने शनिवार को एक रिपोर्ट प्रकाशित की। बताया गया कि स्वास्थ्य, श्रम एवं कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल की पहली छमाही के मुकाबले इस साल 2,788 अधिक बच्चों का जन्म हुआ है। जनवरी-जून अवधि में यह वृद्धि 11 साल बाद पहली बार दर्ज की गई है।
जापान में जन्म दर में लंबे समय से गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 1973 में देश के दूसरे बेबी बूम के दौरान करीब 20.9 लाख बच्चों का जन्म हुआ था। इसके बाद जन्म दर में लगातार कमी आती गई।
हालिया बढ़ोतरी के पीछे विवाह की संख्या में सुधार को एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। वर्ष 2024 और 2025 में जापान में विवाहों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2025 में विदेशी नागरिकों से होने वाली शादियों को शामिल करते हुए करीब 5.05 लाख विवाह हुए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.1 प्रतिशत अधिक और लगातार दूसरी वार्षिक वृद्धि थी।
वहीं, जनवरी-जून 2026 के दौरान 2,38,979 जोड़ों ने विवाह किया, जो एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले 0.2 प्रतिशत अधिक है।
आंकड़ों के मुताबिक, देश के 47 में से 26 प्रांतों में जन्म संख्या बढ़ी। टोक्यो में सबसे बड़ी वृद्धि दर्ज की गई, जहां नवजातों की संख्या 2,278 बढ़ी। इसके बाद आइची में 517 और फुकुओका में 438 की वृद्धि हुई। दूसरी ओर, 21 प्रांतों में जन्म संख्या में गिरावट दर्ज की गई। इनमें इशिकावा में सबसे बड़ी कमी 360 की रही।
हालांकि, विशेषज्ञों और विभिन्न अनुमानों के मुताबिक जापान की जन्म दर में यह सुधार लंबे समय तक कायम रहने की संभावना सीमित है। देश में बच्चे पैदा करने की उम्र वाली आबादी लगातार घट रही है। साथ ही, विवाह में देरी करने या विवाह नहीं करने वालों की संख्या भी बढ़ रही है, जिसका सीधा असर भविष्य में जन्मों पर पड़ सकता है।
इसी बीच जनवरी-जून 2026 के दौरान जापान में 7,78,982 लोगों की मौत हुई, जो पिछले साल की समान अवधि से 6.9 प्रतिशत कम है। इसके बावजूद जन्म और मृत्यु के बीच भारी अंतर बना रहा। छह महीनों में देश की प्राकृतिक आबादी 4,36,914 कम हुई।
जापान में 2025 में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या घटकर करीब 7.05 लाख रह गई थी। यह लगातार दसवां साल था जब जन्म संख्या ने नया रिकॉर्ड निचला स्तर छुआ। इसके बाद सरकार पर उन लोगों के लिए सहायता बढ़ाने का दबाव बढ़ा है जो विवाह करना और बच्चे पैदा करना चाहते हैं।
जापान की घटती आबादी केवल जनसांख्यिकीय चुनौती नहीं है, बल्कि इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। कामकाजी आबादी कम होने से कई क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी बढ़ सकती है, जबकि उपभोक्ताओं की संख्या घटने से कारोबार और स्थानीय सेवाओं की व्यवहार्यता प्रभावित होने का खतरा है।
विशेषज्ञों के लिए एक और बड़ी चिंता सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था है। आबादी में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ने और कामकाजी लोगों की संख्या घटने से स्वास्थ्य सेवाओं और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि 2026 की पहली छमाही के आंकड़े जापान के लिए एक छोटी सकारात्मक खबर लेकर आए हैं, लेकिन फिलहाल इसे देश की दशकों पुरानी जनसंख्या गिरावट में निर्णायक बदलाव मानना जल्दबाजी होगी।
--आईएएनएस
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पिज्जा-बर्गर से लेकर पैकेज्ड फूड तक पर लगाना होगा Warning लेबल! सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दिए 2 हफ्ते
Supreme Court Order on Junk Food: बच्चों और बड़ों में मोटापे की समस्या पिछले 20 वर्षों में पांच गुना अधिक बढ़ चुकी है. साल 2000 से लेकर 2022 के बीच स्कूल जाने वाले और किशोरों में मोटापे की समस्या की दर 2% से भी अधिक बढ़ चुकी है. अब यह दर 10 प्रतिशत तक हो गई है. इस पर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि लोगों की सेहत के प्रति कोई समझौता नहीं किया जा सकता है. केंद्र सरकार ने जंक फूड के पैकेट पर सामने की ओर से वॉर्निंग लेबल लगाने के आदेश दिए हैं. इस विषय पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह का अल्टीमेटम दिया है.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने जंक फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैकेट पर चेतावनी वाले लेबल लगाना अनिवार्य रूप से लागू करने का आदेश जारी किया है.
ज्यादा नमक-चीनी खाना सेहत के लिए खतरनाक
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ज्यादा नमक, चीनी, सैचुरेटेड फैट्स और ज्यादा कैलोरी वाला खाना, खाना हमारी सेहत के लिए खतरनाक है और सेहत के लिए क्या जरूरी है और क्या नहीं, इसका फैसले लेने में मदद के लिए किसी न्यूट्रिशन जानकारी दिखाई जानी चाहिए.
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जंक फूड भी बढ़ा रहा बीमारियों का जोखिम
जंक फूड और अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बढ़ते सेवन को लेकर हेल्त एक्सपर्ट्स की चिंता लगातार बढ़ रही है. इसी मुद्दे से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके गंभीर प्रभावों को लेकर चिंता जताई है. गैर सरकारी संगठन '3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी' की ओर से दायर जनहित याचिका में कहा गया कि जंक फूड के सेवन से लोगों की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है.
याचिकाकर्ता के वकील राजीव शंकर द्विवेदी ने अदालत के समक्ष दलील दी कि इस दिशा में पहले दिए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को कई साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं. उनका कहना था कि सरकार की ओर से पर्याप्त कार्रवाई नहीं होने के बीच जंक फूड का बढ़ता सेवन लोगों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है.
मामला ऐसे समय में सामने आया है जब पैकेज्ड और जंक फूड उत्पादों पर पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने को लेकर सरकार की ओर से अपेक्षित तेजी दिखाई नहीं दे रही है. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर जोर दिया कि ज्यादा नमक, चीनी, संतृप्त वसा और कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ लंबे समय में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ा सकते हैं. ऐसे में उपभोक्ताओं को किसी खाद्य उत्पाद की पोषण संबंधी जानकारी आसानी से समझ आना जरूरी है, ताकि वे अपने लिए बेहतर और स्वस्थ विकल्प चुन सकें.
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की बढ़ती खपत
भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स का बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. इकॉनमिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक, वर्ष 2009 से 2023 के बीच देश के अति-प्रसंस्कृत खाद्य बाजार में 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई. इसी अवधि में मोटापे की समस्या में भी कई गुना बढ़ोतरी की बात सामने आई है. बाजार में पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय पदार्थ, इंस्टेंट फूड्स और अन्य अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की उपलब्धता बढ़ने से लोगों के खान-पान में भी बदलाव आया है. ऐसे खाद्य पदार्थों में अक्सर नमक, चीनी और वसा की मात्रा अधिक होती है. इनके लगातार सेवन को मोटापा समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ते जोखिम से जोड़कर देखा जाता है.
कोर्ट के ऑर्डर का पालन करना जरूरी होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि सेंटर इस निर्णय को स्वयं स्वीकार करता है तो अच्छा है नहीं तो हम आगे के लिए निर्देश जारी करेंगे. हमें केंद्र की दलीले मंजूर नहीं है जिनमें कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय मानकों, विशेष रूप से विकसित देशों के मानकों के बराबर होना संभव नहीं है. जस्टिस जे बी पारदीवाला ने कहा कि यही वह प्रश्न है जिसे हम केंद्र के विचारार्थ रख रहे हैं. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के चंद्रन की पीठ ने अपने आदेश में खाद्य सुरक्षा के मुद्दे को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जोड़ा है.
क्लियर लेबल से उपभोक्ताओं को मिलेगी जानकारी
पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने का उद्देश्य उपभोक्ताओं को किसी उत्पाद में मौजूद नमक, चीनी, वसा और कैलोरी की मात्रा के बारे में आसानी से जानकारी प्रदान करना है. इससे लोग खरीदारी के समय ज्यादा जागरूक होकर फैसला ले सकेंगे. जंक फूड की बढ़ती खपत और उससे जुड़ी स्वास्थ्य चिंताओं के बीच इस तरह की जानकारी को सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.
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