मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन का काफिला रोकने के आरोप में कांग्रेस के एक नेता को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने शनिवार को यह जानकारी दी। घटना उस समय हुई जब मुख्यमंत्री एक कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे।
इस संबंध में मामला दर्ज होने के बाद तिरुवनंतपुरम ज़िला कांग्रेस कमेटी के नेता अनिल कुमार उर्फ चेंथी अनी को गिरफ़्तार कर लिया गया। उन पर और अन्य लोगों पर आरोप है कि उन्होंने शुक्रवार शाम समाज सुधारक श्री नारायण गुरु के जयंती कार्यक्रम में शामिल होने चेम्पाझंथी जा रहे सतीशन का काफिला रोक दिया। पुलिस ने बताया कि रास्ते में, चेंथी में श्री नारायण गुरु का एक अन्य कार्यक्रम आयोजित कर रहे लोगों के एक समूह ने मुख्यमंत्री की गाड़ी को रुकने का इशारा किया।
सतीशन उनके आग्रह पर गाड़ी से बाहर निकले और टेलीविज़न फुटेज में कांग्रेस नेता अनी के साथ कथित तौर पर बहस करते दिखे। पुलिस ने बताया कि उस जगह कुछ मिनट बिताने के बाद सतीशन अपनी गाड़ी में लौटे और चले गए। अधिकारियों ने कहा कि मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में चेंथी में किसी भी कार्यक्रम का उल्लेख नहीं था।
इस घटना के बाद, कांग्रेस कार्यकर्ताओं समेत आयोजकों ने अपनी एक तस्वीर जारी की, जिसमें वे कुछ महीने पहले सचिवालय में मुख्यमंत्री से मिलकर उन्हें चेंथी में होने वाले कार्यक्रम के लिए आमंत्रण देते नजर आते हैं। उन्होंने पत्रकारों को यह भी बताया कि पुलिस बृहस्पतिवार को कार्यक्रम स्थल पर गई थी और मंच पर बैठने की अनुमति वाले लोगों की संख्या के बारे में सुझाव दिया था। शुक्रवार देर रात अनी को हिरासत में लेकर श्रीकार्यम थाने ले जाया गया, जहाँ मामला दर्ज किया गया।
बाद में, पूछताछ के बाद उनकी गिरफ़्तारी दर्ज की गई। पुलिस ने कहा कि अनी को अदालत में पेश किया जाएगा, तथा अन्य लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। इस बीच, जिला कांग्रेस कमेटी घटना की जानकारी इकट्ठा कर रही है और अनी की गिरफ्तारी को लेकर चिंता जताई है।
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कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित संस्मरण पुस्तक ‘Belonging: A Journey of Love’ के भारत में प्रकाशन को लेकर उठा विवाद अब महज एक किताब के प्रकाशन का मामला नहीं रह गया है। यह सीधे-सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सत्ता के दबाव और राजनीतिक असहमति के सवाल तक पहुंच गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि किताब के उन हिस्सों को हटाने का दबाव बनाया गया, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और मोदी सरकार के कार्यकाल में चीन द्वारा भारतीय क्षेत्र पर कब्जे से जुड़े संदर्भ हैं। कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने तो इसे लोकतंत्र की हत्या तक करार दे दिया है।
विवाद की शुरुआत उस खबर से हुई कि Penguin Random House India (PRHI) भारत में सोनिया गांधी की इस किताब को प्रकाशित नहीं करेगा। कांग्रेस का दावा है कि प्रकाशक की ओर से कुछ हिस्सों में बदलाव या उन्हें हटाने की बात कही गई थी और सोनिया गांधी इसके लिए तैयार नहीं हुईं। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि अगर किताब का मूल संस्करण विदेश में प्रकाशित हो सकता है तो भारत में उसके लिए अलग कसौटी क्यों? यही सवाल अब इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया है।
कांग्रेस का हमला सीधे मोदी सरकार पर है। गहलोत ने सवाल किया कि आखिर ऐसी कौन-सी वजह या दबाव है जिसके चलते दुनिया में प्रकाशित होने वाली सामग्री भारत में नहीं छापी जा सकती। उनका आरोप है कि मोदी सरकार प्रकाशकों पर दबाव डालकर उन हिस्सों को हटवाना चाहती है जो सरकार या उसकी नीतियों के लिए असहज हो सकते हैं। लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गौरव गोगोई ने भी तंज कसते हुए कहा कि सरकार में बैठे कुछ लोग शायद इस बात से डर गए हैं कि लोग सोनिया गांधी की किताब पढ़ेंगे। कांग्रेस के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से लेकर सेवा दल तक ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया है।
लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। Penguin Random House India ने कांग्रेस के आरोपों को सीधे खारिज करते हुए कहा है कि वह भारत में इस पुस्तक की प्रकाशक नहीं है। प्रकाशक ने यह भी कहा कि यह कहना सही नहीं है कि लेखिका द्वारा संपादकीय बदलाव स्वीकार न किए जाने के कारण उसने किताब प्रकाशित करने से इनकार किया। साथ ही PRHI ने यह जरूर कहा कि किसी पांडुलिपि की तथ्य-जांच करना और लेखक को सुझाव देना प्रकाशक का अधिकार और जिम्मेदारी है। यानी प्रकाशक ने दबाव के कांग्रेस के आरोप की पुष्टि नहीं की है।
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस से ही पूछा जाना चाहिए। अगर Penguin Random House India साफ तौर पर कह रहा है कि वह इस किताब का भारत में प्रकाशक ही नहीं है और उसने कांग्रेस के बताए तरीके से प्रकाशन रोकने या दबाव डालने की बात से इनकार किया है, तो फिर कांग्रेस किस आधार पर सीधे मोदी सरकार पर आरोप लगा रही है? क्या सिर्फ किताब के भारतीय संस्करण को लेकर पैदा हुई प्रकाशकीय उलझन को राजनीतिक षड्यंत्र बताना उचित है? कांग्रेस को आरोप लगाने से पहले यह बताना चाहिए कि उसके पास सरकार की ओर से दबाव डाले जाने का ठोस प्रमाण क्या है।
दरअसल, सोनिया गांधी की किताब को लेकर कांग्रेस का आक्रामक रुख एक बड़े राजनीतिक सवाल को जन्म देता है। क्या पार्टी पहले से ही यह तय कर चुकी है कि हर विवाद के पीछे केंद्र सरकार को खड़ा करना है? प्रकाशक ने अगर संपादकीय प्रक्रिया और तथ्य-जांच को सामान्य प्रकाशकीय जिम्मेदारी बताया है, तो कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसने इस प्रक्रिया को सरकारी दबाव से जोड़ने का निष्कर्ष आखिर किस आधार पर निकाला। लोकतंत्र में आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोप को प्रमाणित करना राजनीतिक दल की जिम्मेदारी भी है।
यह भी कम दिलचस्प नहीं कि जिस किताब को लेकर कांग्रेस इतना बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर रही है, उसका अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन अमेरिकी प्रकाशक Alfred A. Knopf के जरिए प्रस्तावित है। ऐसे में कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि भारत में प्रकाशन को लेकर वास्तविक समस्या क्या है। क्या कोई वैकल्पिक भारतीय प्रकाशक उपलब्ध नहीं है? अगर किताब के अधिकार किसी दूसरे प्रकाशक को दिए जा सकते हैं, तो फिर इसे सीधे ‘लोकतंत्र पर हमला’ बताने की इतनी जल्दबाजी क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस एक प्रकाशकीय विवाद को राजनीतिक मुद्दे में बदलकर अपने लिए नया नैरेटिव तैयार करना चाहती है?
सवाल यह भी है कि कांग्रेस इस पूरे विवाद को सोनिया गांधी की राजनीतिक विरासत और मोदी सरकार के बीच टकराव के रूप में क्यों पेश कर रही है। किताब अभी व्यापक भारतीय पाठकों के हाथ में पहुंची भी नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने पहले ही इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले का प्रतीक बना दिया। क्या पार्टी को वास्तव में पुस्तक के प्रकाशन की चिंता है या उसे मोदी सरकार पर हमला करने के लिए एक और राजनीतिक मंच दिखाई दे रहा है? कांग्रेस को यह समझना होगा कि हर असहमति को ‘सरकारी दबाव’ और हर संपादकीय निर्णय को ‘सेंसरशिप’ बताने से उसके आरोपों की गंभीरता कम भी हो सकती है।
फिलहाल इस विवाद में सबसे मजबूत तथ्य यही है कि कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि संबंधित प्रकाशक ने उन आरोपों से दूरी बना ली है। ऐसे में गेंद कांग्रेस के पाले में है। अगर उसके पास सरकार के दबाव का कोई ठोस सबूत है तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए। सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी से यह साबित नहीं होगा कि किताब को रोकने के पीछे सरकार थी। वरना यही सवाल उठेगा कि कांग्रेस ने एक प्रकाशकीय प्रक्रिया को राजनीतिक हथियार बनाकर मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश तो नहीं की? लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन विपक्ष से सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है।
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