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Rahul Gandhi की 'धरना-छाप' राजनीति क्या गुल खिलाएगी? LoP छात्रों का वास्तव में भला चाहते हैं या सिर्फ सुर्खियों में जगह चाहते हैं?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज एक प्रदर्शनकारी छात्र साहिल लोचव को साथ लेकर पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे और आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर 20 जुलाई के छात्र आंदोलन के दौरान कथित पेलेट गन कार्रवाई में घायल हुए छात्र की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही है। पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के बाद जब राहुल गांधी संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने वहीं धरना शुरू कर दिया और संदेश साफ था, “एफआईआर नहीं, तो धरना जारी रहेगा।”

यहीं से सवाल उठता है कि राहुल गांधी आखिर किस लड़ाई को लड़ रहे हैं? एक पीड़ित छात्र को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई, पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही तय कराने की लड़ाई, या फिर छात्र राजनीति के उभरते मैदान में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी कोई सामान्य प्रदर्शनकारी नहीं हैं। वह देश की लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उनके पास संसद का मंच है, सरकार को जवाबदेह बनाने की संवैधानिक हैसियत है और पूरे विपक्ष की राजनीतिक आवाज बनने का अवसर भी। फिर कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर तो कभी थाने पहुंचकर धरने पर बैठ जाना क्या उस पद की गरिमा और जिम्मेदारी के अनुरूप राजनीति है?

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धरना देना लोकतंत्र में गलत नहीं है। सरकार और पुलिस के खिलाफ विरोध करना भी विपक्ष का अधिकार है। लेकिन जब देश का नेता प्रतिपक्ष पुलिस स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठकर कहे कि जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी, वह नहीं हटेगा, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक दबाव ही अब राहुल गांधी की प्राथमिक रणनीति बन गया है?

यहां मामला और दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि राहुल गांधी जिस घटना को लेकर धरने पर बैठे, वह घटना अब केवल एक छात्र की शिकायत या पुलिस थाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस कार्रवाई का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। शीर्ष अदालत ने हाल में पुलिस की कथित ज्यादती और बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड समिति गठित करने का फैसला किया है। साथ ही पुलिस अधिकारियों ने राहुल गांधी को यह भी बताया है कि 20 जुलाई की घटना से जुड़े कई मामले दर्ज हैं और उनकी जांच क्राइम ब्रांच तथा स्पेशल सेल को सौंपी गई है।

यानी सवाल यह नहीं है कि साहिल लोचव की शिकायत पर अलग से कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। यदि किसी संज्ञेय अपराध की शिकायत है और कानून के अनुसार एफआईआर बनती है, तो कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए। पीड़ित को न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन सवाल राहुल गांधी की राजनीतिक शैली का है। सवाल उठता है कि क्या लोकसभा में विपक्ष के नेता को यह जानकारी नहीं थी कि मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है? क्या उन्हें नहीं पता था कि घटना की जांच पहले से विभिन्न स्तरों पर चल रही है? और यदि उन्हें यह सब पता था, तो फिर पुलिस स्टेशन के बाहर धरने का राजनीतिक उद्देश्य क्या था?

यहीं से इस पूरी कहानी की जड़ तक जाना जरूरी है। सवाल उठता है कि जंतर-मंतर पर आखिर हुआ क्या था? दरअसल, 20 जुलाई को दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्र परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। आंदोलन का आयोजन कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के नेतृत्व में हुआ था और प्रदर्शनकारियों की मांगों में परीक्षा प्रणाली में सुधार तथा शिक्षा से जुड़े सवाल प्रमुख थे।

जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। आरोप लगे कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग किया, लाठीचार्ज किया और पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ। कई वीडियो और तस्वीरों के बाद पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सीधे निशाने पर लिया। लेकिन दिल्ली पुलिस का पक्ष बिल्कुल अलग रहा। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि प्रदर्शन अवैध था और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अधिकतम संयम बरता। पुलिस का दावा है कि बल का इस्तेमाल हालात बिगड़ने और हिंसा या अव्यवस्था की स्थिति पैदा होने के बाद किया गया। घटना के दौरान पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी सामने आई थी।

यही वजह है कि इस मामले को केवल एकतरफा राजनीतिक नारे में समेटना आसान नहीं है। यदि छात्रों पर अनावश्यक या अनुपातहीन बल प्रयोग हुआ है तो दोषियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन यदि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और पुलिसकर्मी भी घायल हुए, तो जांच में उस पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शायद इसी जटिलता के कारण सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति का महत्व बढ़ जाता है।

इसलिए सवाल उठता है कि ऐसे में राहुल गांधी का धरना क्यों हो रहा है? सवाल उठता है कि क्या यह न्याय के लिए दबाव है, या फिर राजनीतिक दृश्य रचने की कोशिश है? दरअसल, राहुल गांधी की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक पैटर्न दिखाई देता है। मुद्दा उठाइए, सरकार पर सीधा हमला कीजिए और फिर सड़क पर उतरकर उस मुद्दे को राजनीतिक प्रतीक में बदल दीजिए। यह रणनीति विपक्षी राजनीति में असरदार हो सकती है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठे व्यक्ति से सवाल भी बड़ा होता है। सवाल उठता है कि क्या हर मामले में धरना ही अंतिम राजनीतिक हथियार होना चाहिए?

कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर धरने की राजनीति और अब पुलिस थाने पहुंचकर एफआईआर की मांग पर बैठ जाना...राहुल गांधी की यह छापामार शैली उन्हें सुर्खियां तो दिलाती है, लेकिन क्या इससे उनकी संस्थागत भूमिका कमजोर नहीं पड़ती? संसद में सरकार से जवाब मांगना, दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाना, संसदीय जांच की मांग करना और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करना, ये भी नेता प्रतिपक्ष के उतने ही महत्वपूर्ण हथियार हैं।

इसके अलावा, एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यह छात्रों की राजनीति में राहुल गांधी की अपनी जगह बनाने की कोशिश है? देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक संदर्भ भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी विभिन्न राज्यों में स्कूलों की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की समस्याओं को लेकर अभियान चलाकर लगातार सुर्खियां बटोर रही है। जंतर-मंतर का आंदोलन भी इसी व्यापक छात्र असंतोष का हिस्सा बनकर सामने आया था। ऐसे में राहुल गांधी भी शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि छात्रों की आवाज उठाने वाला सबसे बड़ा राष्ट्रीय चेहरा वही हैं।

साहिल लोचव के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचना, उनकी चोटों का मुद्दा उठाना और एफआईआर के लिए धरने पर बैठना, यह सब एक मजबूत राजनीतिक दृश्य भी है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को लगने लगा है कि छात्र राजनीति का यह मैदान उनके हाथ से निकल सकता है? क्या कॉकरोच जनता पार्टी के शिक्षा और स्कूलों से जुड़े अभियान ने राहुल गांधी को यह एहसास कराया है कि केवल संसद में भाषण देना काफी नहीं, बल्कि छात्रों के बीच जाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी? या फिर यह राहुल गांधी की उस पुरानी राजनीतिक शैली का विस्तार है, जिसमें वह सत्ता के खिलाफ खुद को सीधे संघर्षरत व्यक्ति के रूप में पेश करना चाहते हैं?

देखा जाये तो राहुल गांधी को छात्रों के साथ खड़े होने का पूरा अधिकार है। पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना भी उनका कर्तव्य है। पेलेट गन के कथित इस्तेमाल की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग भी पूरी तरह वैध राजनीतिक मुद्दा है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष की राजनीति केवल धरने की राजनीति नहीं हो सकती। जब सुप्रीम कोर्ट जांच की प्रक्रिया शुरू कर चुका हो, जब पुलिस के अनुसार संबंधित मामलों की जांच क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल कर रही हो, तब राहुल गांधी को यह भी बताना चाहिए कि उनका धरना जांच को किस तरह आगे बढ़ाएगा। अगर अलग शिकायत पर एफआईआर जरूरी है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत दर्ज कराया जाना चाहिए और उस प्रक्रिया की निगरानी की मांग की जानी चाहिए। लेकिन हर बार कैमरों के सामने धरना देकर राजनीतिक दबाव बनाना एक गंभीर सवाल छोड़ जाता है कि क्या राहुल गांधी व्यवस्था से लड़ रहे हैं, या व्यवस्था से लड़ने का दृश्य तैयार कर रहे हैं?

राहुल गांधी को समझना होगा कि छात्रों की आवाज बनने के लिए केवल पुलिस थाने की सीढ़ियों पर बैठना काफी नहीं। छात्रों को बेहतर परीक्षा व्यवस्था, मजबूत स्कूल, जवाबदेह संस्थाएं और ठोस शिक्षा नीति चाहिए। राहुल गांधी चाहें तो वह जो सुधार करना चाहते हैं वह कांग्रेस शासित राज्यों में शुरू करवा सकते हैं। राहुल गांधी को समझना होगा कि धरना तस्वीर बनाता है, लेकिन राजनीति की असली परीक्षा तस्वीर के बाद शुरू होती है।

- नीरज कुमार दुबे

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महिंद्रा Scorpio N Facelift ADAS और Digital डिस्प्ले के साथ लॉन्च, कीमत ₹13.69 लाख से

महिंद्रा ने भारत में नई Scorpio N (फेसलिफ्ट) लॉन्च की है, जिसकी शुरुआती कीमत ₹13.69 लाख (एक्स-शोरूम) है और टॉप मॉडल की कीमत ₹25.50 लाख है। कंपनी ने SUV के दमदार लुक या इंजन लाइनअप में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन इस अपडेट में ज़्यादा टेक्नोलॉजी और आरामदायक फीचर्स दिए गए हैं। 2022 में लॉन्च होने के बाद से ही Scorpio N काफी सफल रही है—अब तक 3.8 लाख से ज़्यादा लोग इसे खरीद चुके हैं। अब, और भी ज़्यादा फीचर्स के साथ, महिंद्रा SUV मार्केट में अपनी जगह और मज़बूत करना चाहती है। इसमें Z2, Z4, Z6, Z8S, Z8T और Z8L वैरिएंट्स शामिल हैं। 
 

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अगर आप टॉप-एंड Z8L मॉडल चुनते हैं, तो आपके पास 6 या 7-सीटर का ऑप्शन होगा। फेसलिफ्ट मॉडल डीलरशिप पर पहुँचने लगे हैं और खरीदारों को ये जल्द ही मिलने लगेंगे। बाहर से देखने पर यह गाड़ी ज़्यादातर वैसी ही लगती है—मज़बूत और मस्कुलर। लेकिन महिंद्रा ने ऊँचे ट्रिम्स में नए 18-इंच के डायमंड-कट अलॉय व्हील्स दिए हैं, जो इसके स्टाइल को और बेहतर बनाते हैं। निचले वैरिएंट्स में पुराने व्हील्स ही दिए गए हैं। एक बड़ा बदलाव है 540-डिग्री सराउंड व्यू सिस्टम, जिसके साथ ब्लाइंड व्यू मॉनिटर भी मिलता है। इनकी वजह से पार्किंग और ऑफ़-रोडिंग ज़्यादा सुरक्षित और कम तनावपूर्ण हो जाती है।

अंदर जाने पर बदलाव साफ़ नज़र आते हैं। नई 12.29-इंच की फ्लोटिंग HD टचस्क्रीन तुरंत आपका ध्यान खींचती है; यह 6 फिजिकल शॉर्टकट बटन के ऊपर लगी है, ताकि गाड़ी चलाते समय आपको मेन्यू में उलझना न पड़े। इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर भी अब पूरी तरह से डिजिटल है—10.24-इंच का और एकदम साफ़, जिससे सब कुछ काफी प्रीमियम लगता है। महिंद्रा ने कुछ काम के नए फीचर्स भी जोड़े हैं, जैसे 65W USB टाइप-C फास्ट चार्जर, पैनोरमिक सनरूफ और "एडवेंचर स्टैटिस्टिक्स" डिस्प्ले, जो इंजन की जानकारी, G-फोर्स, ऊंचाई और ऑफ-रोड से जुड़ी हर तरह की डिटेल्स को ट्रैक करता है। डैशबोर्ड का ओवरऑल लेआउट तो जाना-पहचाना ही है, लेकिन डिस्प्ले में हुए इन अपग्रेड्स से केबिन का माहौल वाकई शानदार हो गया है।
 

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टॉप वेरिएंट्स में अभी भी शानदार फीचर्स मिल रहे हैं: लेवल 2 एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS), दमदार 12-स्पीकर वाला सोनी ऑडियो सिस्टम, हवादार फ्रंट सीट्स, इलेक्ट्रॉनिक पार्किंग ब्रेक, लेदर अपहोल्स्ट्री, पावर-एडजस्टेबल ड्राइवर सीट और ऑटो-डिमिंग रियरव्यू मिरर। ADAS अभी भी सिर्फ़ Z8L वेरिएंट में ही मिलता है, इसलिए अगर आपको सबसे एडवांस्ड सेफ्टी फीचर्स चाहिए, तो आपको पता है कि कौन सा मॉडल देखना है। इंजन में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आपको अभी भी 2.0-लीटर mStallion टर्बो-पेट्रोल या 2.2-लीटर mHawk टर्बो-डीज़ल इंजन का ऑप्शन मिलता है। दोनों इंजन के साथ 6-स्पीड मैनुअल या ऑटोमैटिक गियरबॉक्स का ऑप्शन मिलता है।

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