Viral Video: असम की टीचर का जज्बा, जुड़वां बेटियों को साथ लेकर कर रहीं सेंसस ड्यूटी
Census 2027 Viral Video: असम की एक टीचर रूमी डेका का वीडियो वायरल हो गया है, जिसमें वह सेंसस 2027 के फील्डवर्क के लिए अपनी जुड़वां बेटियों को साथ ले जाती दिख रही हैं। कोई और विकल्प न होने पर, वह अपने बच्चों को साथ लेकर ही घर-घर जाकर ड्यूटी कर रही हैं।
Puja niyam: आंखें बंद रखकर पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए? जानें ध्यान और दर्शन का सही तरीका
Puja niyam: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान आंखों की स्थिति को लेकर भी कुछ विशेष नियम बताए गए हैं। मान्यता है कि भगवान की मूर्ति के समक्ष पूजा करते समय आंखों को पूरी तरह बंद कर लेना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि इससे भगवान के साक्षात दर्शन का लाभ नहीं मिल पाता। यही कारण है कि पूजा और ध्यान की प्रक्रिया में आंखों की स्थिति को लेकर अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं।
दर्शन और ध्यान में क्या है अंतर?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, पूजा के दौरान "दर्शन" और "ध्यान" दोनों को अलग-अलग महत्व दिया गया है। मान्यता है कि दर्शन के समय भक्त को भगवान की मूर्ति को खुली आंखों से देखते हुए उनके स्वरूप को अपने मन में बसाना चाहिए, ताकि वह दिव्य छवि हमेशा के लिए स्मृति में बनी रहे। वहीं ध्यान की प्रक्रिया में आंखें बंद करके भगवान के उसी स्वरूप को मन ही मन याद करने की परंपरा है, जो दर्शन के बाद अपनाई जाती है।
कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि भगवान का दर्शन करना स्वयं में एक पुण्यदायी कार्य माना जाता है, इसी वजह से पूजा की शुरुआत में आंखें खुली रखकर मूर्ति के स्वरूप को निहारना आवश्यक बताया गया है।
पूजा में आंखों की सही स्थिति
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, पूजा प्रारंभ करते समय सबसे पहले भगवान की मूर्ति को खुली आंखों से भलीभांति निहारना चाहिए, जिसमें उनके चरणों से लेकर पूरे स्वरूप तक के दर्शन शामिल होते हैं। इसके बाद आरती और मंत्र जाप के दौरान आंखें अर्धखुली रखी जा सकती हैं, जबकि ध्यान लगाने या मन ही मन प्रार्थना करने के समय आंखें बंद करना उचित माना जाता है।
पूरी तरह आंखें बंद रखने से जुड़ी मान्यता
मान्यता है कि पूजा के दौरान शुरुआत से अंत तक पूरी तरह आंखें बंद रखने से भक्त भगवान के साक्षात स्वरूप के दर्शन के पुण्य से वंचित रह जाता है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि दर्शन न करने से भक्त और भगवान के बीच वह आत्मीय जुड़ाव पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाता, जो खुली आंखों से मूर्ति को निहारने पर संभव होता है।
ध्यान के समय आंखें बंद करने का महत्व
हालांकि धार्मिक परंपराओं में यह भी स्पष्ट किया गया है कि दर्शन के बाद जब भक्त गहन ध्यान या मानसिक जप में लीन होता है, तब आंखें बंद करना पूरी तरह उचित और लाभकारी माना जाता है। मान्यता है कि इस अवस्था में आंखें बंद करने से मन बाहरी विचलन से दूर होकर पूरी तरह भगवान के स्वरूप और मंत्रों पर केंद्रित हो पाता है।
आज भी पूजा में निभाई जाती है यह परंपरा
समय के साथ भले ही पूजा-पाठ के तरीकों में कुछ बदलाव आया हो, लेकिन दर्शन और ध्यान से जुड़ी यह परंपरा आज भी अनेक श्रद्धालु अपनाते हैं। आज भी मंदिरों में भक्त पहले भगवान की मूर्ति को खुली आंखों से निहारते हैं, और उसके बाद ध्यानमग्न होकर आंखें बंद कर प्रार्थना करते नजर आते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
Asianetnews
Haribhoomi







