तारिक रहमान की भारत यात्रा टलने का असल कारण अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है। भले ही ढाका इस फैसले के पीछे शेख हसीना की भारत से की गई वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस और उससे बिगड़े कूटनीतिक माहौल का हवाला दे रहा हो, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा रणनीतिक समीकरण भी आकार लेता दिख रहा है। संकेत बताते हैं कि तारिक रहमान का ध्यान फिलहाल नई दिल्ली की यात्रा से अधिक बदलते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और मक्का पैक्ट में बांग्लादेश की संभावित भागीदारी पर केंद्रित है। ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ की नीति के तहत ढाका पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के साथ उभरते इस सुरक्षा ढांचे में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहा है। ऐसे में भारत यात्रा को टालना बांग्लादेश की नई विदेश नीति, उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं और दक्षिण एशिया में अपने विकल्पों का दायरा बढ़ाने की कोशिश का भी संकेत माना जा रहा है।
ढाका का स्पष्ट संदेश है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं है। बांग्लादेशी नेतृत्व का कहना है कि पर्याप्त द्विपक्षीय प्रगति और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप समझ बनने पर ही यात्रा का समय तय होगा। दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी संबंधों को “पारस्परिक हित” की कसौटी पर परखने की बात कही है। दोनों पक्षों की भाषा में समानता दिखाई देती है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि ‘राष्ट्रीय हित’ की उनकी परिभाषाएं कितनी दूर तक एक-दूसरे से मेल खाती हैं।
हम आपको बता दें कि वर्तमान तनाव के केंद्र में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का भारत में निर्वासन और उनके प्रत्यर्पण का बांग्लादेशी आग्रह है। इसी महीने नई दिल्ली से शेख हसीना की वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस ने ढाका की नाराजगी और बढ़ा दी। बांग्लादेश इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देखता है, जबकि भारत ने आयोजन में अपनी भूमिका से इंकार किया है। हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास की परीक्षा बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में रहमान की भारत यात्रा के लिए “अनुकूल वातावरण” बनाने की बात कही जा रही है।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। असली सामरिक संकेत बांग्लादेश के संभावित मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की ओर झुकाव में छिपे हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए इस ढांचे में 'किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला' माने जाने की अवधारणा शामिल है। बांग्लादेशी मंत्रियों ने इसमें शामिल होने की संभावना के प्रति सकारात्मक रुख दिखाते हुए अंतिम निर्णय को राष्ट्रीय हितों से जोड़ा है। यदि ढाका इस व्यवस्था से जुड़ता है, तो दक्षिण एशिया और उसके आसपास के सामरिक समीकरणों में एक नई परत जुड़ सकती है।
भारत के लिए चिंता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका है। 1971 के इतिहास के बाद लंबे समय तक भारत-बांग्लादेश संबंधों में जो सामरिक निकटता रही, उसमें अब स्पष्ट परिवर्तन दिखाई दे रहा है। ढाका ने पाकिस्तान के साथ व्यापार, कूटनीतिक संपर्क और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की इच्छा जताई है। यदि यह प्रक्रिया मक्का रक्षा ढांचे जैसी किसी व्यापक सुरक्षा संरचना से जुड़ती है, तो भारत को अपनी पूर्वी सीमा के सामरिक परिवेश का नए सिरे से आकलन करना पड़ सकता है।
इसके साथ चीन का कारक भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश अपनी विदेश नीति को अमेरिका, चीन, पाकिस्तान और अन्य शक्तियों के साथ संतुलित संबंधों की दिशा में विविधतापूर्ण बनाने का प्रयास कर रहा है। बीजिंग के लिए बंगाल की खाड़ी और दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने का अवसर पहले से मौजूद है। ऐसे में यदि भारत-ढाका संवाद कमजोर पड़ता है और बांग्लादेश वैकल्पिक साझेदारों की ओर तेजी से बढ़ता है, तो चीन की आर्थिक और संभावित सामरिक पहुंच भारत की पूर्वी और समुद्री रणनीति के लिए अधिक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।
देखा जाये तो भारत के सामने चुनौती केवल सीमा सुरक्षा की नहीं है। 4,096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा, अवैध आव्रजन, सीमा प्रबंधन और बाड़बंदी जैसे मुद्दे पहले ही संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं। ढाका का आरोप है कि भारत बिना पर्याप्त कूटनीतिक सत्यापन के लोगों को सीमा पार भेज रहा है, जबकि भारत अपनी सुरक्षा और आव्रजन चिंताओं को प्रमुखता देता है। फिर भी इस उभरते तनाव को भारत और बांग्लादेश के स्थायी विच्छेद के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। दोनों देश भूगोल से बंधे हैं और उनके आर्थिक, सुरक्षा तथा संपर्क हित गहराई से जुड़े हुए हैं।
साथ ही यदि बांग्लादेश मक्का पैक्ट में शामिल होता है, तो सवाल उठता है कि इससे ढाका और चीन के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? देखा जाये तो मक्का पैक्ट में तुर्किये की मौजूदगी सबसे महत्वपूर्ण बात है। तुर्किये जहां नाटो का सदस्य और पश्चिमी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा है, वहीं चीन के साथ उसके संबंध प्रतिस्पर्धा और सहयोग, दोनों पर टिके हैं। आर्थिक संपर्क, व्यापार और व्यापक यूरेशियाई राजनीति में दोनों के हित कई जगह मिलते हैं, लेकिन उइगर मुद्दे और मध्य एशिया जैसे प्रश्नों पर मतभेद भी मौजूद हैं। इसलिए बांग्लादेश यदि इस तुर्किये-पाकिस्तान-सऊदी सुरक्षा ढांचे में प्रवेश करता है, तो वह चीन-विरोधी खेमे में सीधे शामिल होने की बजाय एक बहुस्तरीय रणनीतिक संतुलन की नीति अपना सकता है। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान स्वयं चीन का निकटतम रणनीतिक साझेदार है, जबकि तुर्किये मक्का पैक्ट के माध्यम से अपने रक्षा-औद्योगिक और भू-राजनीतिक प्रभाव का विस्तार चाहता है। ऐसे में ढाका के लिए मक्का पैक्ट और चीन के साथ मजबूत आर्थिक-सामरिक संबंध परस्पर विरोधी होने की बजाय समानांतर विकल्प भी बन सकते हैं। लेकिन यदि इस रक्षा ढांचे का विस्तार किसी ऐसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की दिशा में होता है, जहां चीन और तुर्किये के हित आमने-सामने आने लगें, तो बांग्लादेश को कठिन कूटनीतिक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
यहां प्रश्न यह भी उठता है कि यदि बांग्लादेश मक्का पैक्ट में शामिल होता है तो भारत पर क्या असर होगा? देखा जाये तो ऐसी स्थिति में भारत की चिंता यह होगी कि कहीं बांग्लादेश किसी औपचारिक या अनौपचारिक बहु-ध्रुवीय सुरक्षा नेटवर्क का हिस्सा बनकर नई दिल्ली की पारंपरिक रणनीतिक बढ़त को सीमित न कर दे। हालांकि यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि ढाका किसी भारत विरोधी गठबंधन का हिस्सा बन जाएगा। फिर भी भारत के लिए संदेश स्पष्ट है कि बांग्लादेश को केवल 1971 की ऐतिहासिक साझेदारी के चश्मे से देखने की बजाय उसे एक स्वतंत्र रणनीतिक शक्ति के रूप में समझना होगा। यदि नई दिल्ली और ढाका के बीच राजनीतिक संवाद कमजोर रहता है, तो पाकिस्तान, चीन और तुर्किये जैसे देशों के लिए वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की गुंजाइश स्वाभाविक रूप से बढ़ सकती है।
बहरहाल, नई दिल्ली के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि ढाका अब पुराने समीकरणों में बंधकर चलने को तैयार नहीं है। भारत को बांग्लादेश के साथ अपने रिश्ते को शेख हसीना के दौर की राजनीतिक निकटता या 1971 की ऐतिहासिक विरासत के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। यदि भारत और बांग्लादेश के बीच संवाद और विश्वास का अंतराल बढ़ता है, तो उस खाली जगह को भरने के लिए पाकिस्तान, चीन और तुर्किये जैसी बाहरी शक्तियां स्वाभाविक रूप से अधिक सक्रिय होंगी और इसका असर केवल द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और बंगाल की खाड़ी के शक्ति संतुलन पर पड़ेगा।
-नीरज कुमार दुबे
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जरा गौर कीजिए, जब चीन अरुणाचल प्रदेश में भारत को आंखें दिखा रहा हो, जब अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का जम्मू-कश्मीर/लद्दाख पहुंचना और जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताना भारतीय कूटनीति की कितनी बड़ी सफलता है, क्योंकि यह परोक्ष रूप से चीन को संदेश है कि भारत का साथ मिलते ही अमेरिका अन्य एशियाई 'बदमाशों' को रौंद डालेगा।
उधर, पाकिस्तान को संदेश है कि इस्लामिक नाटो उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं बनेगा, यदि अमेरिका खुलकर भारत के साथ खड़ा रहेगा। जी हां, अमेरिकी राजदूत की 19–20 अगस्त 2026 की जम्मू-कश्मीर और लद्दाख यात्रा को केवल एक राजनयिक दौरा मानना पर्याप्त नहीं होगा।
खासकर श्रीनगर में उनका यह कहना कि जम्मू-कश्मीर “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” है और अमेरिकी यात्रा-परामर्श की समीक्षा के संकेत देना, वाशिंगटन के पुराने कश्मीर-संबंधी सार्वजनिक रुख की तुलना में महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामरिक संकेत देता है। इससे कई सवाल उपजते हैं, जिनके निहितार्थ को समझना भी जरूरी है:-
पहला सवाल है कि क्या वास्तव में अमेरिकी स्टैंड बदल गया है? तो जवाब होगा कि अपेक्षित सावधानी जरूरी है। अभी इसे अमेरिका की औपचारिक कश्मीर-नीति में पूर्ण परिवर्तन कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजनयिक भाषा और व्यवहार में बदलाव का संकेत स्पष्ट है। पहले अमेरिकी नीति का सार्वजनिक ढांचा मुख्यतः यह रहा कि कश्मीर भारत-पाकिस्तान के बीच विवादित विषय है और दोनों देशों को बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए। 2019 के बाद भी अमेरिकी अधिकारियों ने इस मूल स्थिति को बनाए रखा था। इसके विपरीत, गोर ने भारतीय प्रशासित जम्मू-कश्मीर में जाकर उसे “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” कहा। पाकिस्तान ने इसे अमेरिकी पारंपरिक रुख से विचलन मानते हुए अमेरिकी प्रभारी राजदूत को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया। इसलिए फिलहाल इसे “नीति परिवर्तन” से अधिक “नीति-संकेत में परिवर्तन” कहना उचित होगा।
दूसरा सवाल है कि इस यात्रा का सबसे बड़ा संदेश क्या है? क्या कश्मीर को जमीन पर देखकर आकलन हुआ है? तो जवाब होगा कि गोर का दौरा छह साल से अधिक अंतराल के बाद किसी अमेरिकी राजदूत की कश्मीर यात्रा है। उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और सुरक्षा व्यवस्था तथा बदलते माहौल का प्रत्यक्ष आकलन किया।
यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अमेरिका की कश्मीर संबंधी धारणा अब केवल इस्लामाबाद, नई दिल्ली या अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों पर निर्भर नहीं रह सकती। राजदूत का स्वयं श्रीनगर जाना और फिर सुरक्षा स्थिति पर सकारात्मक टिप्पणी करना वाशिंगटन के नीति-निर्माताओं को एक अलग जमीनी इनपुट देता है।
तीसरा सवाल यह है कि Travel Advisory में बदलाव—छोटा दिखने वाला बड़ा संकेत है? तो जवाब होगा कि गोर ने जम्मू-कश्मीर के लिए अमेरिकी यात्रा-परामर्श की समीक्षा के संकेत दिए हैं। अगर आगे अमेरिका अपने मौजूदा “Do Not Travel” स्तर को नीचे करता है, तो इसका असर केवल अमेरिकी पर्यटकों पर नहीं पड़ेगा। यह संदेश जाएगा कि सुरक्षा परिस्थितियों में सुधार हुआ है। सामान्य आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। पर्यटन के लिए क्षेत्र अधिक खुल रहा है। अंतरराष्ट्रीय जोखिम-धारणा बदल रही है। यानी कश्मीर के लिए यह सुरक्षा से पर्यटन और पर्यटन से निवेश की दिशा में सकारात्मक कूटनीतिक संकेत बन सकता है।
चौथा सवाल यह है कि क्या यह परिदृश्य पाकिस्तान के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका है? तो कहना न होगा कि इस बयान की सबसे तीखी प्रतिक्रिया पाकिस्तान से आई है। इस्लामाबाद ने इसे अपनी दशकों पुरानी कश्मीर कूटनीति के प्रतिकूल माना और अमेरिकी राजनयिक को तलब किया। पाकिस्तान के लिए समस्या सिर्फ गोर का बयान नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि यदि अमेरिका जैसा प्रभावशाली देश धीरे-धीरे कश्मीर को “भारत-पाकिस्तान के विवाद” की भाषा से हटाकर “भारत के महत्वपूर्ण हिस्से” की भाषा में संबोधित करने लगे, तो पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक रणनीति कमजोर हो सकती है।
पांचवां सवाल यह है कि क्या चीन का कोण भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता? तो जवाब होगा कि गोर का कार्यक्रम केवल श्रीनगर तक सीमित नहीं रहा; वह लद्दाख भी गए। यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लद्दाख भारत-चीन सीमा-सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इसलिए यात्रा का एक व्यापक संदेश यह भी हो सकता है कि अमेरिका भारत के पश्चिमी और उत्तरी दोनों रणनीतिक मोर्चों को अपने Indo-Pacific और South/Central Asia दृष्टिकोण से देख रहा है।
छठा सवाल यह है कि क्या भारत-अमेरिका संबंधों में कश्मीर की भूमिका बदल सकती है? तो कहना न होगा कि यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका संबंधों के उस व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा हो सकता है जिसमेंआतंकवाद के विरुद्ध सहयोग, चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला, हिंद-प्रशांत रणनीति, रक्षा एवं तकनीकी साझेदारी, ऊर्जा एवं व्यापार, और दक्षिण एशिया में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं। गोर स्वयं भारत में अमेरिकी राजदूत होने के साथ South and Central Asian Affairs के Special Envoy भी हैं। इसलिए उनकी टिप्पणी का महत्व सामान्य राजदूत की टिप्पणी से अधिक माना जा सकता है।
सातवां सवाल यह है कि क्या भारत को अति-उत्साहित होने से भी बचना होगा? तो जवाब होगा कि यहां एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सावधानी बरतनी जरूरी है क्योंकि एक राजदूत का बयान अमेरिकी सरकार की पूरी औपचारिक विदेश नीति का विकल्प नहीं होता। जब तक अमेरिकी विदेश विभाग या व्हाइट हाउस अपनी आधिकारिक नीति में स्पष्ट बदलाव घोषित नहीं करता, तब तक यह कहना कि “अमेरिका ने कश्मीर पर पाकिस्तान को छोड़कर भारत का पक्ष ले लिया है” अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अमेरिकी सार्वजनिक कूटनीतिक भाषा में एक उल्लेखनीय बदलाव दिखाई दे रहा है।
आठवां सवाल यह है कि सबसे बड़ा रणनीतिक निहितार्थ क्या है? तो जवाब होगा कि मेरे आकलन में इस यात्रा का वास्तविक महत्व चार शब्दों में है: “Narrative → Ground Reality → Policy.” यदि अमेरिका को जमीनी स्तर पर कश्मीर में सुरक्षा, राजनीतिक प्रक्रिया, पर्यटन और आर्थिक सामान्यीकरण दिखाई देता है और उसके आधार पर उसकी यात्रा चेतावनी कम होती है, तो धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव भी बदल सकता है।
यही भारत के लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक लाभ होगा।
निष्कर्षतः, सर्जियो गोर की कश्मीर यात्रा को भारत की कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे अभी अमेरिकी कश्मीर नीति का अंतिम परिवर्तन घोषित करना जल्दबाजी होगी। असली परीक्षा अगले चरण में होगी—क्या Washington अपनी आधिकारिक भाषा बदलेगा, क्या travel advisory घटेगी और क्या भविष्य में अमेरिकी अधिकारी कश्मीर को भारत के आंतरिक प्रशासनिक-सुरक्षा संदर्भ में अधिक स्पष्टता से देखेंगे?
अगर इन तीनों प्रश्नों का उत्तर “हाँ” होता है, तो गोर की यह यात्रा दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक महत्वपूर्ण turning point सिद्ध हो सकती है।
# क्या ईरान में पिटी अमेरिकी भद्द और पाकिस्तान के दोगले रवैये से अचंभित अमेरिका ने ऐसा किया
हाँ—इसे एक संभावित कारण के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन निर्णायक कारण कहना अभी जल्दबाजी होगी। उपलब्ध घटनाक्रम को जोड़ें तो अमेरिकी सोच में पाकिस्तान को लेकर विश्वसनीयता का प्रश्न जरूर उभरता है। सवाल है कि क्या ईरान प्रकरण ने अमेरिका को पाकिस्तान को नए नजरिये से देखने पर मजबूर किया?
जवाब होगा कि ईरान-अमेरिका संकट में पाकिस्तान ने एक तरफ अमेरिका के साथ संवाद और मध्यस्थता की भूमिका निभाई, जबकि दूसरी तरफ ईरान के प्रति अपनी निकटता और क्षेत्रीय हितों को भी साधता रहा। विशेषज्ञों ने भी पाकिस्तान की निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं—विशेषकर ईरान, अफगानिस्तान और सऊदी अरब से उसके एक साथ जुड़े हितों को देखते हुए।
यानी Washington के लिए संदेश यह हो सकता है कि पाकिस्तान को एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार की बजाय आवश्यकता पड़ने पर उपयोगी लेकिन स्वार्थ-आधारित साझेदार के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक है।
लेकिन कश्मीर पर गोर का बयान सिर्फ पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए? मेरे आकलन में नहीं। क्योंकि सर्जियो गोर ने श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर को “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” कहा और क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए अमेरिकी Travel Advisory की समीक्षा की बात कही। इसके बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी राजनयिक को बुलाकर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और कहा कि यह अमेरिकी पारंपरिक कश्मीर-रुख के विपरीत है।
इसलिए इसके पीछे कई परतें हो सकती हैं:
1. ईरान: पाकिस्तान की मध्यस्थता और दोहरे हितों से अमेरिकी रणनीतिक संदेह बढ़ा हो।
2. आतंकवाद: अमेरिका के लिए पाकिस्तान की उपयोगिता और विश्वसनीयता का मूल्यांकन फिर से हो रहा हो।
3. भारत: चीन के मुकाबले भारत का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है।
4. कश्मीर: जमीनी सुरक्षा परिस्थितियों को देखकर अमेरिकी धारणा में बदलाव की शुरुआत हुई हो।
5. पाकिस्तान: Washington अब Islamabad को South Asia का अनिवार्य रणनीतिक केंद्र मानने की बजाय भारत को अधिक महत्व दे रहा हो।
सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि यह बदलाव ईरान संकट के बाद पाकिस्तान की भूमिका बढ़ने के ठीक उसी दौर में दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक उपयोगिता बढ़ाने की कोशिश की थी। लेकिन यदि उसी समय अमेरिका का शीर्ष राजनयिक भारत में जाकर कहता है कि J&K भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो यह पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से बड़ा कूटनीतिक झटका है।
इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि अमेरिका का संदेश है: “Pakistan may be useful, but India is strategically indispensable.” हालांकि अभी इसे अमेरिकी नीति का औपचारिक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। अगली निर्णायक परीक्षा यह होगी कि Washington अपनी आधिकारिक Kashmir language और Travel Advisory में वास्तव में क्या बदलाव करता है। और एक बड़ा प्रश्न इससे निकलता है—क्या ईरान संकट, पाकिस्तान की कथित दोहरी कूटनीति और चीन की बढ़ती चुनौती ने अमेरिका को अंततः यह समझा दिया है कि दक्षिण एशिया में पाकिस्तान से अधिक भरोसेमंद और दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार भारत है? यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण यक्ष प्रश्न है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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