Explainer: नेपाल में तबाही के पीछे न तो भूकंप था न ही GLOF,सामने आई कहर की असली वजह
Explainer: नेपाल में हाल ही में आई अचानक और बेहद तेज बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक खतरों को लेकर चिंता बढ़ा दी है. शुरुआत में इस आपदा की वजह को लेकर कई तरह की आशंकाएं सामने आईं. कहीं इसे भूकंप से जोड़कर देखा गया तो कहीं ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की संभावना जताई गई. चीन के तिब्बत क्षेत्र में हुई किसी घटना को भी बाढ़ से जोड़कर देखा गया.
लेकिन सैटेलाइट तस्वीरों और भूकंपीय रिकॉर्ड की दोबारा जांच के बाद सामने आई तस्वीर इन शुरुआती अनुमानों से अलग है. उपलब्ध जांच के मुताबिक, नेपाल-तिब्बत सीमा के पास लिरुंग ग्लेशियर का एक हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिरा, जिसके साथ भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा घाटी की ओर आया. इसी घटनाक्रम ने नदी के प्रवाह को अचानक बेहद खतरनाक बना दिया.
शुरुआत में भूकंप को माना गया संभावित कारण
बाढ़ के दौरान जमीन में कंपन रिकॉर्ड हुआ था. इस वजह से शुरुआती तौर पर आशंका बनी कि शायद इलाके में भूकंप आया हो और उसी के कारण नदी में अचानक उफान आया.
लेकिन बाद में इस रिकॉर्ड की जांच की गई. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS के विश्लेषण में किसी सामान्य भूकंप की पुष्टि नहीं हुई. इसके बजाय कंपन का संबंध ग्लेशियर के टूटने और उसके साथ नीचे की ओर तेजी से आए मलबे से जोड़ा गया.
यानी जिस कंपन को पहले संभावित भूकंप माना जा रहा था, वह वास्तव में ग्लेशियर के अचानक टूटने की प्रक्रिया से पैदा हुआ था.
लिरुंग ग्लेशियर में आखिर क्या हुआ?
नेपाल-तिब्बत सीमा के नजदीक स्थित लिरुंग ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूट गया. यह हिस्सा करीब एक किलोमीटर नीचे घाटी की ओर गिरा.
ग्लेशियर के साथ केवल बर्फ ही नहीं आई. उसके साथ पत्थर, चट्टान, मिट्टी और भारी मलबा भी नीचे आया. इतनी बड़ी मात्रा में सामग्री के अचानक नीचे आने से घाटी और नदी का पूरा हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम प्रभावित हो गया.
सैटेलाइट तस्वीरों में ग्लेशियर से घाटी तक एक नया निशान दिखाई दिया है. यही क्षेत्र उस भूकंपीय कंपन के रिकॉर्ड से भी जुड़ा हुआ था. दोनों तरह के डेटा को साथ देखने पर ग्लेशियर टूटने की घटना और उसके बाद आई बाढ़ के बीच संबंध मजबूत होता है.
ग्लेशियर कैसे अचानक टूट सकता है?
इसे आसान भाषा में समझें. किसी ग्लेशियर को पहाड़ पर जमी हुई बर्फ की विशाल और धीरे-धीरे खिसकती परत के रूप में देखा जा सकता है. जब तापमान बढ़ता है तो बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है.
पिघला हुआ पानी ग्लेशियर की दरारों से नीचे तक पहुंच सकता है. इससे बर्फ और उसके नीचे मौजूद चट्टानी सतह के बीच पानी की परत बन सकती है. परिणामस्वरूप घर्षण कम हो सकता है और ग्लेशियर का कोई हिस्सा अस्थिर होकर अचानक खिसक सकता है.
लिरुंग में भी वैज्ञानिक इसी तरह की संभावनाओं की जांच कर रहे हैं. हालांकि किसी एक कारण को अंतिम रूप से जिम्मेदार ठहराने से पहले विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है.
नदी ने कुछ ही समय में बदला अपना रूप
ग्लेशियर से नीचे आए बर्फ और मलबे की भारी मात्रा नदी तक पहुंची. इससे नदी का सामान्य प्रवाह प्रभावित हुआ और पानी तथा मलबा बेहद तेज गति से नीचे की ओर बढ़ा. इसका असर निचले इलाकों में बेहद भयावह दिखाई दिया.
स्याफ्रुबेसी में नदी के किनारे बसे इलाकों में भारी मलबा पहुंचा. कई जगहों पर लोगों को सामान्य नदी के बजाय पानी और चट्टानों की तेज धारा का सामना करना पड़ा.
बेट्रावती बाजार में नदी का फैलाव करीब 90 मीटर से बढ़कर 490 मीटर तक पहुंच गया. वहीं बिदुर में नदी का दायरा लगभग 100 मीटर से बढ़कर 549 मीटर तक हो गया.
इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुछ ही समय में नदी ने अपने सामान्य बहाव क्षेत्र को कितनी तेजी से बढ़ा दिया.
यह GLOF से कितना अलग है?
नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड एक जाना-पहचाना खतरा है. इसमें ग्लेशियर के पास बनी झील का पानी किसी प्राकृतिक बांध के टूटने या कमजोर होने के कारण अचानक बाहर निकलता है और नीचे की ओर विनाशकारी बाढ़ ला सकता है.
लेकिन यहां उपलब्ध जांच के मुताबिक घटनाक्रम अलग था. इस मामले में किसी ग्लेशियल झील के अचानक फटने के बजाय ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और उसके साथ आए मलबे ने नदी के प्रवाह को प्रभावित किया.
इसलिए दोनों घटनाओं को एक जैसा समझना सही नहीं होगा. हालांकि दोनों ही परिस्थितियों में हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ, पानी और मलबे की अचानक गति गंभीर बाढ़ पैदा कर सकती है.
ग्लेशियर टूटने की वजह पर अभी भी सवाल
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि लिरुंग ग्लेशियर का हिस्सा टूटा क्यों?
वैज्ञानिक इसके पीछे कई संभावित कारकों का अध्ययन कर रहे हैं. इनमें बढ़ता तापमान, बर्फ का तेजी से पिघलना, ग्लेशियर के भीतर पानी का प्रवेश और ग्लेशियर की संरचनात्मक अस्थिरता शामिल हैं.
यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस विशेष घटना का एकमात्र कारण जलवायु परिवर्तन था. किसी प्राकृतिक आपदा को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता होती है. फिर भी हिमालय में तापमान और ग्लेशियरों की स्थिति में हो रहे बदलाव ने विशेषज्ञों की चिंता जरूर बढ़ाई है.
तेजी से गर्म होता हिमालय क्यों चिंता का विषय?
हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखला नहीं है. यहां मौजूद ग्लेशियर करोड़ों लोगों के लिए जल संसाधनों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. लेकिन तापमान में बदलाव के कारण ग्लेशियरों और बर्फ से जुड़े प्राकृतिक सिस्टम में परिवर्तन हो रहा है.
जब बर्फ तेजी से पिघलती है तो ग्लेशियरों के आसपास और भीतर पानी की मात्रा बढ़ सकती है. इससे कुछ स्थानों पर ढलानों और बर्फ की संरचनाओं की स्थिरता प्रभावित हो सकती है.
ऐसी परिस्थितियों में छोटी-सी घटना भी नीचे बसे गांवों, कस्बों और नदी किनारे के बुनियादी ढांचे के लिए बड़ा खतरा बन सकती है.
खतरा बाढ़ के बाद भी खत्म नहीं हुआ
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बाढ़ का पानी कम हो जाने के बाद भी खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा सकता. नेपाल-तिब्बत सीमा के ऊपरी इलाकों में जगह-जगह भारी मलबा जमा हो सकता है. अगर यह मलबा नदी या किसी जलधारा के रास्ते में प्राकृतिक अवरोध बनाता है तो पानी कुछ समय के लिए रुक सकता है.
बाद में अगर यह अवरोध अचानक टूटता है तो जमा पानी और मलबा एक साथ नीचे की ओर आ सकता है. इससे दूसरी अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है. इसी वजह से ऊपरी इलाकों में नदी के रास्तों और मलबे के जमाव की निगरानी बेहद जरूरी हो जाती है.
भारत के लिए भी क्यों है चेतावनी?
नेपाल में हुई यह घटना भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है. हिमालय का बड़ा हिस्सा भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत के क्षेत्रों में फैला है और कई नदियां पहाड़ी क्षेत्रों से निकलकर नीचे के मैदानी इलाकों तक पहुंचती हैं.
अगर ऊपरी हिमालय में ग्लेशियर टूटता है, अचानक मलबा गिरता है या जलधारा का मार्ग बाधित होता है, तो उसका असर सीमाओं से आगे तक पहुंच सकता है.
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में भी ग्लेशियरों और नदियों की निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण है. खासकर नदी किनारे बसे गांवों और संवेदनशील बुनियादी ढांचे के लिए समय रहते चेतावनी प्रणाली बेहद उपयोगी साबित हो सकती है.
भविष्य के लिए क्या सीख मिलती है?
नेपाल की इस घटना ने एक महत्वपूर्ण सबक सामने रखा है—हिमालय में बर्फ, पानी, चट्टान और मौसम को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता.
ग्लेशियर की हलचल, तापमान में बदलाव, अचानक होने वाली बर्फबारी या बारिश और पहाड़ी ढलानों की स्थिति एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती है.
ऐसे में केवल बाढ़ आने के बाद राहत और बचाव पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा. ग्लेशियरों की लगातार निगरानी, सैटेलाइट से बदलावों का अध्ययन, भूकंपीय सेंसरों का इस्तेमाल, नदी के जलस्तर की निगरानी और स्थानीय लोगों तक समय पर चेतावनी पहुंचाना जरूरी है.
नेपाल की अचानक आई बाढ़ की जांच ने शुरुआती आशंकाओं से अलग तस्वीर सामने रखी है. उपलब्ध सैटेलाइट और भूकंपीय आंकड़ों के मुताबिक, लिरुंग ग्लेशियर का हिस्सा टूटना इस विनाशकारी घटनाक्रम की अहम कड़ी था.
यह घटना सिर्फ नेपाल की प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है. आने वाले समय में जैसे-जैसे तापमान और ग्लेशियरों की स्थिति में बदलाव होंगे, वैसे-वैसे ऐसे अचानक पैदा होने वाले खतरों को समझने और उनसे पहले से निपटने की जरूरत भी बढ़ेगी.
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