दादा-पोते की जोड़ी, एक अपने जमाने का सुपरहिट विलेन, दूसरा बना डायरेक्टर, करियर में दी है सिर्फ 1 हिट
प्रेम नाथ और उनके पोते सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा की कहानी. प्रेम नाथ ने 100 से अधिक फिल्मों में काम किया, जबकि सिद्धार्थ ने 'वी आर फैमिली' और 'हिचकी' जैसी फिल्में डायरेक्ट की हैं. चलिए दोनों दादा पोते के साथ साथ इनके परिवार के बारे में भी बताते हैं.
उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की होगी हाईटेक निगरानी, केदारताल और सरस्वती ताल का जल्द सर्वे
उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में ग्लेशियर झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरे को देखते हुए राज्य सरकार ने आपदा प्रबंधन की तैयारियां तेज कर दी हैं. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की वैज्ञानिक निगरानी बढ़ाने और आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के निर्देश दिए हैं. सरकार का जोर केवल खतरे की जानकारी हासिल करने पर नहीं, बल्कि आपदा से पहले लोगों को सुरक्षित निकालने और नुकसान कम करने की पूरी व्यवस्था तैयार करने पर है.
13 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील श्रेणी में
सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन के अनुसार, उत्तराखंड में कुल 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील माना गया है. इनमें से चार झीलों का सर्वेक्षण पहले ही किया जा चुका है. बाकी झीलों का भी चरणबद्ध तरीके से वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा.
सर्वे के दौरान झीलों के जलस्तर, आकार में होने वाले बदलाव, आसपास के भू-भाग और डाउनस्ट्रीम इलाकों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का आकलन किया जाएगा.
केदारताल और सरस्वती ताल की भी होगी जांच
सरकार ने चमोली की सरस्वती ताल और उत्तरकाशी की केदारताल को लेकर भी सर्वे की तैयारी शुरू कर दी है. विशेषज्ञों की टीम जल्द इन दोनों क्षेत्रों का दौरा करेगी.
इस दौरान यह पता लगाया जाएगा कि झीलों की मौजूदा स्थिति क्या है, जलस्तर में कितना बदलाव हो रहा है और अचानक पानी बढ़ने की स्थिति में नीचे बसे क्षेत्रों पर कितना असर पड़ सकता है.
सेंसर और रियल टाइम अलर्ट सिस्टम पर जोर
मुख्यमंत्री ने संवेदनशील इलाकों में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के निर्देश दिए हैं. इसके तहत जलस्तर मापक उपकरण, सेंसर, संचार प्रणाली और अर्ली वार्निंग डिवाइस लगाए जाएंगे.
इन उपकरणों से झीलों में होने वाले बदलावों की जानकारी जल्द मिल सकेगी. जरूरत पड़ने पर ऐसे सिस्टम की संख्या भी बढ़ाई जाएगी, ताकि किसी संभावित खतरे की सूचना समय रहते प्रशासन और स्थानीय लोगों तक पहुंचाई जा सके.
सिर्फ चेतावनी नहीं, नुकसान कम करने की तैयारी
सरकार का फोकस केवल अलर्ट जारी करने तक सीमित नहीं रहेगा. संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षित निकासी मार्ग, संभावित प्रभावित इलाकों की पहचान, वैकल्पिक संचार व्यवस्था और राहत-बचाव संसाधनों को मजबूत किया जाएगा.
स्थानीय लोगों को भी आपदा के दौरान सुरक्षित स्थानों पर जाने और जरूरी सावधानियों के बारे में जागरूक किया जाएगा.
नदियों और बांधों पर भी रहेगी नजर
आपदा प्रबंधन विभाग ने जिलाधिकारियों को नदियों के जलस्तर की लगातार निगरानी के निर्देश दिए हैं. बांध और बैराज प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों के साथ नियमित समन्वय पर भी जोर दिया गया है.
यदि किसी बांध से पानी छोड़ा जाता है तो निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को पहले से सूचना देने की व्यवस्था मजबूत करने को कहा गया है.
नेपाल की आपदा से उत्तराखंड ले रहा सबक
नेपाल में हाल में हुई आपदा के बाद उत्तराखंड सरकार ने अपनी तैयारियों की समीक्षा की है. अधिकारियों का मानना है कि दोनों क्षेत्रों की पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों में काफी समानताएं हैं. ऐसे में नेपाल की घटना से सीख लेकर उत्तराखंड में संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की निगरानी और स्थानीय स्तर की तैयारियों को मजबूत करना जरूरी है.
स्थानीय लोगों को बनाया जाएगा आपदा से निपटने में सक्षम
पूर्व सैन्य अधिकारी ले. कर्नल रघुवीर सिंह भंडारी ने स्थानीय स्तर पर मजबूत संचार नेटवर्क की जरूरत बताई. ग्राम प्रधानों और स्थानीय प्रतिनिधियों को आपदा प्रबंधन व्यवस्था से जोड़ने पर जोर दिया गया है.
सरकार की कोशिश है कि किसी भी आपात स्थिति में सूचना सबसे पहले प्रभावित गांवों तक पहुंचे और बचाव दल के पहुंचने से पहले स्थानीय लोग जरूरी कदम उठा सकें. इस तरह उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी से लेकर राहत-बचाव तक एक मजबूत और तकनीक आधारित सुरक्षा तंत्र तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं.
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