एसिडिटी की परेशानी से राहत पाने के लिए कैसी होनी चाहिए आपकी डाइट? स्वामी रामदेव ने बताया आयुर्वेदिक उपाय
क्या आप भी एसिडिटी की समस्या से परेशान रहते हैं और दवाइयों का सेवन करने के बावजूद राहत नहीं मिल रही है? आइए जानते हैं स्वामी रामदेव के बताए हुए कुछ आसान उपाय.
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‘सास-ससुर की सेवा के लिए पत्नी को मजबूर नहीं कर सकता पति’, कर्नाटक हाईकोर्ट ने की अहम टिप्पणी
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है, जिसमें उन्होंने कहा कि कोई भी पुरुष अपनी पत्नी सहित किसी भी महिला को घर के काम करने और अपने माता-पिता की देखभाल करने का आदेश नहीं दे सकता. हाईकोर्ट का कहना है कि घर के कामों में पुरुषों और महिलाओं की बारबर हिस्सेदारी होनी चाहिए. अगर माता-पिता की देखभाल की जरूरत है तो यह जरूरत खास तौर पर बेटे और बेटी की जिम्मेदारी होती है और न कि दामाद या फिर बहू की.
'सास-ससुर की सेवा के लिए मजबूर नहीं कर सकते'
जस्टिस चिल्लाकुर सुमलता ने 3 अगस्त को नेलमंगला तालुक के रहने वाले एक व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुए एक आदेश जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा कि दामाद या फिर बहू द्वारा ससुराल वालों की देखभाल करना अपनी मर्जी से होना चाहिए न कि जबरदस्ती. तुमकुरु की फैमिली कोर्ट के एक आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. फैमिली कोर्ट ने युवक को उसे अपनी पत्नी को गुजारा-भत्ता के तौर पर 5 हजार रुपये और नाबालिग बेटी को 4 हजार रुपये देने का निर्देश दिया था.
याचिकाकर्ता का दावा है कि वह एक कुली है और तय की गई रकम बहुत ज्यादा है, क्योंकि उसको अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल भी करनी है. उसने बताया कि शादी के छह महीने बाद ही उसकी पत्नी का अपने सास-ससुर के प्रति रवैया बदल गया. उसने घर के काम करने या फिर उनकी देखभाल करने से इनकार कर दिया था. याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी पर आरोप लगाया कि बिना उसकी या फिर उसके माता-पति की अनुमति के वह कई बार अपने मायके चली गई थी.
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को लगाई फटकार
जस्टिस चिल्लाकुर ने कहा कि याचिकाकर्ता की दलील से तो किसी भी सामान्य समझ वाले व्यक्ति को ऐसा लगेगा कि जैसे पति ने अपनी पत्नी को घर के काम करने और माता-पिता की देखभाल करने के लिए कर्मचारी के रूप में रखा है. पत्नी का बिना बताए मायके जाना, पति का ऐसा बोलना उसकी सोच को दिखाता और पत्नी के व्यवहार और पसंद पर नियंत्रण रखने और हुक्म चलाने की इच्छा को दिखाता है.
कैसे जीवन साथी बनते हैं, पति-पत्नी?
जस्टिस ने कहा कि कोर्ट को यह समझ नहीं आता है कि किसी भारतीय महिला को जब भी मन करे या फिर जरूरत महसूस तो अपने माता-पिता से मिलने के लिए ससुराल में हर किसी की अनुमति क्यों लेनी पड़ती है. हाईकोर्ट ने साफ किया कि शादी एक पवित्र बंधन है, जो दो लोगों को एक साथ लेकर आता है. रस्में उनको पति-पत्नी बनाती हैं, हालांकि, प्यार, भरोसा और सम्मान ही उन्हें जीवन साथी और पार्टनर बनाती है.
कोर्ट ने कहा कि एक महिला को अपने करियर, पैसों और जिंदगी के दूसरे पहलुओं के बारे में फैसला लेने का बुनियादी अधिकार है. वह पति अपनी पत्नी को अपनी इच्छाओं या उम्मीदों के हिसाब से जीने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है. जज ने कहा कि शादी किसी दूरे व्यक्ति की पहचान, इच्छाओं और आजादी को कंट्रोल करने या फिर हावी होने या कमजोर करने का लाइसेंस नहीं है.
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