संसद द्वारा 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026' का पारित होना भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के सफर में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। इस नए विधेयक ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने पर लगी छह साल पुरानी वैधानिक रोक को आधिकारिक रूप से हटा दिया है। हालाँकि, सरकार और वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में किसी भी प्रकार का नया शुल्क लागू नहीं किया जा रहा है और आम उपभोक्ताओं व छोटे व्यापारियों के लिए UPI सेवाएँ पहले की तरह ही पूरी तरह मुफ़्त और शून्य-लागत पर बनी रहेंगी। इसके बावजूद, इस विधायी बदलाव ने देश के बैंकिंग सेक्टर, फिनटेक कंपनियों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के दीर्घकालिक वित्तीय मॉडल को लेकर एक व्यापक नीतिगत बहस को जन्म दे दिया है।
नई नीति, प्रस्तावित फ्रेमवर्क और वित्तीय राहत का ढांचा
सरकार और वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि बुनियादी स्तर पर उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों को इस बदलाव से दूर रखा जाएगा:
उपभोक्ता एवं छोटे व्यापारी सुरक्षित: ग्राहकों के लिए UPI पूरी तरह मुफ़्त रहेगा। इसके अलावा, ₹1.5 करोड़ से कम टर्नओवर वाले छोटे व्यापारियों को MDR से पूरी तरह छूट मिलती रहेगी।
प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR): भविष्य में MDR केवल ₹2,000 से अधिक के ट्रांज़ैक्शन करने वाले बड़े व्यापारियों पर ही लागू होगा। प्रस्तावित दर 0.25% से 0.5% के बीच रखी जा सकती है, जो क्रेडिट कार्ड (1.5%–2%) की तुलना में काफी कम है।
घटती सरकारी सब्सिडी: FY 2024-25 तक बैंकों और फिनटेक कंपनियों को मुआवज़ा देने के लिए ₹8,276 करोड़ की बजटीय सहायता दी गई (अकेले FY24 में ₹3,631 करोड़)। हालाँकि, FY27 के बजट में इसे घटाकर ₹2,000 करोड़ कर दिया गया है।
उद्योग का पक्ष: फिनटेक लीडर्स जैसे मोबिक्विक (MobiKwik) की उपासना टाकू के अनुसार, अब तक मिली सरकारी सब्सिडी बैंकों और पेमेंट कंपनियों की वास्तविक प्रोसेसिंग लागत का केवल 10-11% ही कवर कर पाती है।
राष्ट्रीय तस्वीर और बढ़ता परिचालन दबाव
National Payments Corporation of India (NPCI) के आँकड़ों के अनुसार, UPI नेटवर्क का दायरा अब ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच चुका है:
विशाल वॉल्यूम: UPI हर महीने लगभग 20 अरब ट्रांज़ैक्शन प्रोसेस करता है, जिसकी सालाना दर ₹25 लाख करोड़ के करीब है। यह भारत के रिटेल डिजिटल पेमेंट का 80% हिस्सा संभालता है।
लागत का गणित: सर्वर मेंटेनेंस, फ्रॉड प्रिवेंशन, कस्टमर सपोर्ट और सेटलमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की सालाना परिचालन लागत हज़ारों करोड़ रुपये है।
वैश्विक व्यापार विवाद: मार्च 2026 में, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत की ज़ीरो-MDR नीति को विदेशी व्यापार में बाधा बताते हुए कहा कि इससे Visa और Mastercard जैसे ग्लोबल नेटवर्क को नुकसान पहुँच रहा है। हालाँकि, GTRI जैसे थिंक-टैंक ने चेतावनी दी है कि भारत को बाहरी व्यापारिक दबाव में आकर नीतिगत बदलाव नहीं करने चाहिए।
क्षेत्रीय केस स्टडी: जम्मू-कश्मीर और वित्तीय समावेशन
जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में UPI केवल एक भुगतान साधन नहीं, बल्कि वित्तीय समावेशन का एक बड़ा स्तंभ बन चुका है:
तेज़ी से बढ़ता दायरा: J&K में UPI ट्रांज़ैक्शन वैल्यू 2022-23 में ₹37,511 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में ₹40,289 करोड़ हो गई। अकेले J&K बैंक ने ईद के चार दिनों में ₹3,125 करोड़ से अधिक के 4 करोड़ ट्रांज़ैक्शन संभाले।
स्ट्रीट वेंडर्स और क्रेडिट हिस्ट्री: राजौरी के एक सर्वे के अनुसार, 75% स्ट्रीट वेंडर UPI का उपयोग करते हैं और 94.3% लोग डिजिटल लेन-देन से जुड़े हैं। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में हर डिजिटल स्कैन व्यापारियों के लिए लोन पात्रता (Credit History) बनाने में मदद कर रहा है।
शहरी-ग्रामीण अंतर: J&K के 94% गाँवों में कनेक्टिविटी के बावजूद केवल 11.9% ग्रामीण परिवार ऑनलाइन लेन-देन करते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आँकड़ा 32.4% है। मध्यम स्तर के व्यापारियों पर शुल्क की थोड़ी भी संभावना उन्हें डिजिटल अर्थव्यवस्था से दूर कर सकती है।
आगे की राह और संतुलन की चुनौती
UPI का ज़ीरो-कॉस्ट मॉडल ही भारत में डिजिटल क्रांति की अभूतपूर्व सफलता का मुख्य आधार रहा है। हालाँकि, हर महीने अरबों लेन-देन के बढ़ते दबाव और इंफ्रास्ट्रक्चर के भारी-भरकम रखरखाव को हमेशा के लिए घटती सरकारी सब्सिडी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। भारत के लिए असली चुनौती वित्तीय रूप से एक टिकाऊ मॉडल तैयार करने और डिजिटल समावेशन के मूल मंत्र को बनाए रखने के बीच सही संतुलन बनाने की है।
आगामी समय में NPCI की स्टीयरिंग कमेटी और RBI को एक ऐसा पारदर्शी ढांचा तैयार करना होगा जो बड़े व्यापारियों से मामूली शुल्क लेकर बैंकों और फिनटेक कंपनियों को परिचालन लागत निकालने का एक मजबूत जरिया दे सके। वहीं दूसरी ओर, आम उपभोक्ताओं और छोटे दुकानदारों के लिए मुफ्त लेन-देन का वादा पूरी तरह सुरक्षित रहना चाहिए। यदि नीतिगत बदलावों में छोटे व्यापारियों पर किसी भी तरह का वित्तीय बोझ पड़ता है, तो श्रीनगर के स्थानीय विक्रेताओं से लेकर ग्रामीण इलाकों तक फैला यह भरोसेमंद डिजिटल नेटवर्क प्रभावित हो सकता है। भारत को अपनी डिजिटल संप्रभुता और वैश्विक मिसाल बने इस मॉडल को बरकरार रखते हुए इसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना होगा
UPI का ज़ीरो-कॉस्ट मॉडल ही इसकी अभूतपूर्व सफलता का कारण रहा है। लेकिन लगातार बढ़ते ट्रांज़ैक्शन लोड को हमेशा के लिए घटती सरकारी सब्सिडी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। असली चुनौती NPCI की स्टीयरिंग कमेटी के सामने होगी: नेटवर्क को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना, बिना उस 'ज़ीरो-फ़ीस' के वादे को तोड़े जिसने श्रीनगर के छोटे रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर देश के हर कोने तक डिजिटल क्रांति को पहुँचाया है।
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एनटीपीसी का 2037 तक 244 गीगावाट की परिचालन क्षमता विकसित करने और 16.86 लाख करोड़ रुपये का निवेश करने का लक्ष्य है। कंपनी पूरी ऊर्जा मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। एनटीपीसी के चेयरमैन गुरदीप सिंह ने बृहस्पतिवार को कहा कि अगला दशक कंपनी के इतिहास में वृद्धि के सबसे महत्वपूर्ण दौर में से एक होगा।
अर्थव्यवस्था के विस्तार और जीवन स्तर में सुधार के साथ भारत की बिजली की जरूरत लगातार बढ़ती रहेगी। उन्होंने कंपनी की 50वीं वार्षिक आम बैठक (एजीएम) में शेयरधारकों को संबोधित करते हुए कहा कि इसी के साथ बिजली व्यवस्था की संरचना में भी तेजी से बदलाव आएगा। सिंह ने कहा, ‘‘हमने दीर्घकालिक क्षमता के अपने लक्ष्य बढ़ाए हैं और अब 2032 तक 149 गीगावाट उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा है, जिसमें 60 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा शामिल है।
2037 तक भंडारण क्षमता को छोड़कर 244 गीगावाट तक पहुंचने का हमारा लक्ष्य है।’’
फिलहाल एनटीपीसी की क्षमता करीब 91 गीगावाट है। चेयरमैन ने कहा कि कंपनी की वित्त वर्ष 2036-37 तक ताप, जलविद्युत एवं पंप स्टोरेज, नवीकरणीय ऊर्जा, बैटरी भंडारण, खनन तथा परमाणु ऊर्जा क्षेत्रों में कुल करीब 16.86 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय करने की भी योजना है। यह किसी भारतीय बिजली कंपनी द्वारा किए जाने वाले सबसे बड़े निवेश कार्यक्रमों में से एक होगा।
उन्होंने कहा कि एनटीपीसी का बदलाव केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा। सिंह ने कहा कि कंपनी पूरी ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में अपनी क्षमताएं विकसित कर रही है। परमाणु ऊर्जा के बारे में उन्होंने कहा कि यह एनटीपीसी की भविष्य की वृद्धि के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है।
कंपनी परमाणु ऊर्जा मिशन के तहत 2047 तक सरकार के 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता के महत्वाकांक्षी लक्ष्य में 30 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करना चाहती है। राजस्थान में एनपीसीआईएल के साथ संयुक्त उद्यम में 2.8 गीगावाट की परमाणु ऊर्जा परियोजना विकसित कर रही एनटीपीसी अलग-अलग परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित करने की भी इच्छुक है। सिंह ने कहा, ‘‘परमाणु परियोजनाओं एवं प्रौद्योगिकियों के लिए 13 राज्यों में 34 अतिरिक्त स्थानों को लेकर अध्ययन तथा चर्चा आगे बढ़ रही है।’’
उन्होंने कहा कि परमाणु ऊर्जा विश्वसनीय, कम कार्बन उत्सर्जन वाली और चौबीसों घंटे बिजली उपलब्ध कराकर नवीकरणीय तथा ताप विद्युत, दोनों की पूरक होगी।
चेयरमैन ने बताया कि एनटीपीसी की कोयला गैसीकरण आधारित कृत्रिम प्राकृतिक गैस परियोजना पर काम अच्छी तरह आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘हम 5.75 लाख टन सालाना क्षमता वाली परियोजना पर भी अच्छी प्रगति कर रहे हैं। इसके स्थापित होने के बाद यह भारत में अपनी तरह का पहला संयंत्र होगा और सीधे तौर पर आयातित प्राकृतिक गैस का स्थान लेगा।’’
एनटीपीसी समूह ने वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक का सबसे अधिक 27,546 करोड़ रुपये का एकीकृत शुद्ध लाभ दर्ज किया है, जो इससे पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक है।
समूह की कर पूर्व आय भी बढ़कर 60,564 करोड़ रुपये हो गई जबकि समूह का नेटवर्थ भी बढ़कर करीब 2.03 लाख करोड़ रुपये रहा।
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