भारत में सांप के काटने का खतरा कितना गंभीर है, इसका खुलासा एक नए वैश्विक अध्ययन ने किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर साल लाखों लोग सांप के जहर का शिकार होते हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों और खेतों में रहने वाले लोगों पर इसका खतरा ज्यादा रहता है। बारिश में घटनाएं बढ़ने की आशंका रहती है
रक्षाबंधन पर्व रक्षा के तात्पर्य से बांधने वाला एक ऐसा सूत्र है, जिसमें बहनें अपने भाईयों के माथे पर तिलक लगाकर जीवन के हर संघर्ष तथा मोर्चे पर उनके सफल होने तथा निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर रहने की ईश्वर से प्रार्थना करती हैं तथा उनके सुखद जीवन के लिए मंगलकामना करती हैं। भाई इस कच्चे धागे के बदले अपनी बहनों की हर प्रकार की विपत्ति से रक्षा करने का वचन देते हैं और उनके शील एवं मर्यादा की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। वास्तव में भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक पर्व रक्षाबंधन स्नेह, सौहार्द एवं सद्भावना का एक ऐसा पर्व है, जो उन्हें अटूट एकता के सूत्र में बांध देता है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले रक्षाबंधन पर्व की भारतीय समाज और संस्कृति में कितनी महत्ता है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बहनों के हाथ अपने भाईयों की कलाईयों पर राखियां बांधने के लिए मचल उठते हैं और कलाई पर बांधे जाने वाले मामूली से दिखने वाले इन्हीं कच्चे धागों से पक्के रिश्ते बनते हैं। पवित्रता तथा स्नेह का सूचक यह पर्व भाई-बहन को पवित्र स्नेह के बंधन में बांधने का पवित्र एवं यादगार दिवस है। इस पर्व को भारत के कई हिस्सों में श्रावणी के नाम से जाना जाता है। पश्चिम बंगाल में ‘गुरु महापूर्णिमा’, दक्षिण भारत में ‘नारियल पूर्णिमा’ तथा नेपाल में इसे ‘जनेऊ पूर्णिमा’ के नाम से जाना जाता है।
रक्षाबंधन मनाए जाने के संबंध में अनेक पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि जब देवराज इन्द्र बार-बार राक्षसों से परास्त होते रहे और हर बार राक्षसों के हाथों देवताओं की हार से निराश हो गए तो इन्द्राणी ने बहुत कठिन तपस्या की और अपने तपोबल से एक रक्षासूत्र तैयार किया। यह रक्षासूत्र इन्द्राणी ने देवराज इन्द्र की कलाई पर बांध दिया। तपोबल से युक्त इस रक्षासूत्र के प्रभाव से देवराज इन्द्र राक्षसों को परास्त करने में सफल हुए। तभी से रक्षाबंधन पर्व की शुरूआत हुई। एक उल्लेख यह भी मिलता है कि जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था, तब उन्होंने एक ब्राह्मण वेश धारण कर अपनी दानशील प्रवृत्ति के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी और बलि द्वारा उनकी मांग स्वीकार कर लिए जाने पर भगवान वामन ने अपने पग से सम्पूर्ण पृथ्वी को नापते हुए बलि को पाताल लोक भेज दिया। कहा जाता है कि उसी की याद में रक्षाबंधन पर्व मनाया गया।
रक्षाबंधन पर्व से कई ऐतिहासिक प्रसंग भी जुड़े हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से इस पर्व की शुरूआत मध्यकालीन युग से मानी जाती है। भारतीय इतिहास ऐसे प्रसंगों से भरा पड़ा है, जब राजपूत योद्धा अपनी जान की बाजी लगाकर युद्ध के मैदान में जाते थे तो उनके देश की बेटियां उन वीर सैनिकों की आरती उतारकर उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा करती थी तथा वीर रस के गीत गाकर उनकी हौंसला अफजाई करते हुए उनसे राष्ट्र की रक्षा का प्रण भी कराती थी। कहा जाता है कि उस जमाने में अधिकांश मुस्लिम शासक हिन्दू युवतियों का बलपूर्वक अपहरण करके उन्हें अपने हरम की शोभा बनाने का प्रयास किया करते थे और ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए राजपूत कन्याओं ने बलशाली राजाओं को राखियां भेजकर उनके साथ भ्रातृत्व संबंध स्थापित कर अपने शील की रक्षा करनी आरंभ कर दी थी। उसी परम्परा ने बाद में रक्षाबंधन पर्व का रूप ले लिया।
चितौड़ की महारानी कर्मावती का प्रसंग तो इस संबंध में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जब गुजरात के शासक बहादुरशाह ने चितौड़ पर आक्रमण कर दिया तो चितौड़ की महारानी कर्मावती घबरा गई। उन्हें चितौड़ के साथ-साथ स्वयं की तथा चितौड़ की अन्य राजपूत बालाओं की सुरक्षा का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। कोई उपाय न सूझने पर रानी कर्मावती ने बादशाह हुमायूं को राखी के धागे में रक्षा का पैगाम भेजा और हुमायूं को अपना भाई मानते हुए उनसे अपनी सुरक्षा की प्रार्थना की। बादशाह हुमायूं महारानी कर्मावती का यह रक्षासूत्र और संदेश पाकर भाव विभोर हो गए और अपनी इस अनदेखी बहन के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने तुरन्त अपनी विशाल सेना लेकर चितौड़ की ओर रवाना हो गए लेकिन जब तक वह चितौड़ पहुंचे, तब तक महारानी कर्मावती और चितौड़ की हजारों वीरांगनाएं अपने शील की रक्षा हेतु अपने शरीर की अग्नि में आहूति दे चुकी थी। उसके बाद हुमायूं ने महारानी कर्मावती की चिता की राख से अपने माथे पर तिलक लगाकर बहन के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करने के लिए जो कुछ किया, वह इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया तथा इसी के साथ रक्षाबंधन पर्व के इतिहास में एक अविस्मरणीय अध्याय भी जुड़ गया। इस ऐतिहासिक घटना के बाद ही यह परम्परा बनी कि कोई भी महिला या युवती जब किसी व्यक्ति को राखी बांधती है तो वह व्यक्ति उसका भाई माना जाता है।
समय के साथ-साथ रक्षाबंधन पर्व के स्वरूप और मूल उद्देश्य में बहुत बदलाव आया है। तेजी से आधुनिकता की ओर अग्रसर आज के इस भागदौड़ भरे और स्वार्थपरक जमाने में जहां बहनों के लिए अब राखी का अर्थ भाई से महंगे उपहार तथा नकदी इत्यादि पाना हो गया है, वहीं भाई भी अपनी निजी जिन्दगी की व्यस्तताओं के चलते बहनों के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वहन सही ढ़ंग से नहीं कर पाते। ऐसे में यह पवित्र पर्व अब रुपये-पैसे तथा साड़ी, आभूषण व अन्य कीमती उपहारों इत्यादि के लेन-देन का पर्व बनता जा रहा है और भाई-बहन के बीच राखी का मोलभाव होने की वजह से धीरे-धीरे इस पर्व की मूल भावनाएं सिकुड़ रही हैं। कच्चे धागों की जगह रेशम के धागों ने ले ली और अब इन धागों की अहमियत कम होती जा रही है। रक्षाबंधन महज कलाई पर एक धागा बांधने की रस्म नहीं है बल्कि यह भाई-बहन के अटूट स्नेह, पवित्रता और सद्भावना का पर्व है। यह पर्व रिश्तों की पवित्रता और वचनबद्धता का प्रतीक है। इसलिए रक्षाबंधन पर्व को चंद रुपयों या कीमती उपहारों से तोलकर देखना इस पर्व के अंतस में विद्यमान पवित्र भावना का अपमान है।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
Khelo India Dialogue: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खेलो इंडिया संवाद के दौरान देश के युवाओं, एथलीटों और स्वयंसेवकों को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए ओलंपिक खेलों में भारत की व्यापक और बहुमुखी भागीदारी बढ़ाने का आह्वान किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश की खेल महत्वाकांक्षाएं केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इन्हें राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा बनाया जाना बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को विभिन्न खेल विधाओं में अपनी छुपी हुई प्रतिभाओं को सामने लाने और उनकी क्षमता का पूरा दोहन करने की आवश्यकता है।
पीएम मोदी बोले- जो खेलते हैं, वे खिलते हैं प्रधानमंत्री मोदी ने खेल के व्यापक सामाजिक प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि खेल के मैदान पर मिलने वाली सफलता का असर सिर्फ खिलाड़ी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह परिवारों, शिक्षण संस्थानों, जिलों और पूरे राज्य के मान-सम्मान को और अधिक मजबूत करता है। अपने विचार साझा करते हुए उन्होंने कहा, "जो खेलते हैं, वे खिलते हैं और खेल में 'खिलने' का मतलब सिर्फ मैदान पर जीत हासिल करना नहीं है। इसका अर्थ किसी व्यक्ति और उसके परिवार का समग्र विकास होने के साथ-साथ राष्ट्र के गौरव को बढ़ाना भी है।"
Khelo India has become a wonderful platform for nurturing sporting talent across the country. It is providing young athletes with opportunities and support to pursue their dreams.@kheloindia https://t.co/hj8qEJRj09
ओलंपिक खेलों की आधी स्पर्धाओं में भी नहीं होती भारत की मौजूदगी भारतीय खेलों के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि देश आज भी ओलंपिक में शामिल कई प्रमुख खेल विधाओं में भाग ही नहीं ले पाता है। उन्होंने लाल किले से दिए गए अपने संबोधन को याद करते हुए बताया कि ओलंपिक में जितने भी खेल खेले जाते हैं, भारत उनमें से आधे से भी कम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।
#WATCH | Delhi: Prime Minister Narendra Modi says, "When we talk about preparations for the 2036 Olympics, our focus should be on preparing those players starting today who will qualify and compete in various events in 2036, and therefore, from the Red Fort, I have announced a… pic.twitter.com/7h3xLKpb6Z
अपने पुराने आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि साल 2012 के ओलंपिक खेलों के दौरान भारत ने मात्र 13 खेलों में ही हिस्सा लिया था, जबकि बीस से अधिक ऐसी खेल स्पर्धाएं थीं जिनमें देश का एक भी एथलीट मैदान में नहीं उतरा था। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि अपनी पदक तालिका को बेहतर बनाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबदबा कायम करने के लिए हमें उन खेलों में भी महारत हासिल करनी होगी जिनमें पारंपरिक रूप से हमारी मौजूदगी या तो नगण्य रही है या फिर बिल्कुल नहीं है।
राष्ट्र निर्माण और युवा शक्ति का अभियान हैं खेल प्रधानमंत्री ने इस बात को विस्तार से समझाया कि भारत का खेल दृष्टिकोण केवल मेडल टैली तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य देश की युवा शक्ति और खेल प्रतिभा को सही दिशा देना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब वे खेल की बात करते हैं, तो इसका दायरा सिर्फ जीत-हार से कहीं आगे जाता है, और यह एक विकसित भारत के निर्माण के लिए देश की युवा ऊर्जा को एकजुट करने का एक महत्वपूर्ण अभियान है। उन्होंने कहा कि खेल में सफलता मिलने से न केवल खिलाड़ी को पहचान मिलती है, बल्कि उनके परिवार, स्कूल, कॉलेज और पूरे समाज का सिर गर्व से ऊंचा होता है।
मेजर ध्यानचंद को किया याद और भारत-न्यूजीलैंड के रिश्तों का जिक्र इस विशेष संवाद के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय हॉकी के महान जादूगर मेजर ध्यानचंद को श्रद्धांजलि अर्पित की और देश के खेल इतिहास में उनके अमूल्य योगदान को याद किया। इसके साथ ही उन्होंने भारत और न्यूजीलैंड के बीच सदी पुराने खेल संबंधों का भी विशेष उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, "आज का यह दिन मां भारती के महान सपूत मेजर ध्यानचंद को याद करने का भी अवसर है। ठीक सौ साल पहले, भारतीय सेना की हॉकी टीम ने न्यूजीलैंड का दौरा किया था और मेजर ध्यानचंद उस ऐतिहासिक टीम का हिस्सा थे। इसी ने भारत और न्यूजीलैंड के बीच 100 साल पुराने खेल संबंधों की मजबूत नींव रखी थी।"
बता दें कि सरकार 'खेलो इंडिया' जैसी विभिन्न पहलों के माध्यम से लगातार जमीनी स्तर पर खेल प्रतिभाओं को तराशने और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश की उपस्थिति को और अधिक मजबूत करने के लिए प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है।