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दिनभर कुर्सी पर बैठे रहना दिल के लिए बन सकता है खतरा, जाने सेहत पर कैसे डालता है असर

नई दिल्ली, 27 अगस्त (आईएएनएस)। आज के समय में लंबे समय तक एक ही जगह बैठकर काम करने की आदत बनती जा रही है। काम शुरू करने के बाद कई लोग लगातार घंटों बीत जाने के बाद भी कुर्सी से उठते नहीं हैं। बीच में खाना, चाय और फोन जैसी चीजें भी अक्सर बैठे-बैठे ही हो जाती हैं। बाहर से देखने पर यह दिनचर्या आरामदायक लग सकती है, लेकिन शरीर के लिए लगातार कम एक्टिव रहना अच्छी बात नहीं है। कई वैज्ञानिक रिसर्च में लंबे समय तक बैठे रहने और दिल से जुड़ी बीमारियों के बीच संबंध पाया गया है।

जब हम लंबे समय तक बैठे रहते हैं, तो हमारा शरीर बहुत कम काम करता है। पैरों और शरीर की दूसरी मांसपेशियां भी ज्यादा नहीं चलतीं। ऐसे में शरीर जितनी ऊर्जा चलने-फिरने के दौरान खर्च करता है, उतनी बैठने पर नहीं करता। अगर यह आदत रोज बनी रहे तो वजन बढ़ सकता है, ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और ब्लड शुगर को संभालना भी मुश्किल हो सकता है। ये सभी चीजें लंबे समय में दिल की बीमारी का खतरा बढ़ा सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी लोगों को लंबे समय तक बैठे रहने का समय कम करने और दिन में ज्यादा एक्टिव रहने की सलाह दी है।

लंबे समय तक बैठे रहने और दिल की बीमारी के बीच संबंध को लेकर कई रिसर्च हुई हैं। 2024 में प्रकाशित एक रिसर्च में करीब 4.8 लाख लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि जो लोग काम के दौरान ज्यादातर समय बैठे रहते थे, उनमें दिल की बीमारी से मौत का खतरा उन लोगों की तुलना में ज्यादा था जो काम के दौरान कम बैठते थे। रिसर्च में यह भी सामने आया कि रोजाना थोड़ी ज्यादा शारीरिक गतिविधि करने से इस खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है।

बता दें कि दिल की बीमारी का खतरा उम्र, वजन, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान और खान-पान जैसी कई चीजों पर भी निर्भर करता है। समस्या तब ज्यादा बढ़ सकती है, जब लंबे समय तक बैठने के साथ चलना-फिरना भी बहुत कम हो।

कई घंटे एक ही जगह बैठे रहने से पैरों की मांसपेशियां ज्यादा काम नहीं करतीं। कुछ लोगों को लंबे समय तक बैठने के बाद पैरों में भारीपन, अकड़न या हल्की सूजन महसूस हो सकती है। यही कारण है कि काम के बीच थोड़ी देर उठना और चलना शरीर के लिए अच्छा माना जाता है। बार-बार छोटे ब्रेक लेने से शरीर लंबे समय तक एक ही स्थिति में नहीं रहता।

बैठकर काम करने में शरीर बहुत कम कैलोरी खर्च करता है। अगर कोई व्यक्ति पूरे दिन बैठा रहता है और साथ में ज्यादा तला-भुना, मीठा या ज्यादा कैलोरी वाला खाना खाता है, तो उसका वजन बढ़ सकता है। ज्यादा वजन होने से ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है।

अगर कोई व्यक्ति सुबह या शाम एक्सरसाइज करता है और बाकी पूरा दिन लगातार कुर्सी पर बैठे रहता है, तो यह भी सेहत के लिए नुकसानदायक है। रिसर्च में यह बात सामने आई है कि रोजाना एक्सरसाइज के साथ दिनभर में छोटी-छोटी शारीरिक गतिविधियां भी जरूरी हैं।

अगर आपका काम कंप्यूटर या लैपटॉप पर बैठकर करने वाला है, तो कुछ आसान आदतें अपनाई जा सकती हैं। कोशिश करें कि लंबे समय तक लगातार बैठे न रहें। कुछ देर काम करने के बाद कुर्सी से उठें और थोड़ा चलें। फोन पर बात करते समय खड़े हो सकते हैं। पानी पीने के लिए अपनी सीट से उठकर जाएं। लंच के बाद कुछ मिनट पैदल चलें। अगर ऑफिस में सीढ़ियां इस्तेमाल करना आसान है, तो कभी-कभी लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें। काम के बीच पैरों और शरीर को हल्का खींचना भी अच्छा रहेगा।

--आईएएनएस

पीके/पीएम

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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ये हमें मंजूर नहीं... ईरान ने बता दी मुस्लिम NATO में एंट्री की शर्त

मुस्लिम नाटो में अगर ईरान अब शामिल होता है तो वह उसके लिए कितना फायदेमंद होगा। यह दुनिया की नजरों में कुछ भी हो मगर ईरान का रुख इस पर बिल्कुल अलग है। ईरान में सुप्रीम लीडर के वरिष्ठ सलाहकार ने अब इस पर खुलकर अपनी राय रखी है। सवाल यह है क्या मुस्लिम नाटो अमेरिका के खिलाफ या इसराइल के खिलाफ बना है? अमेरिका के नजरिए से देखें तो इसमें शामिल सदस्य सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान सभी उसके बेहद करीबी मित्र मुल्क हैं। व इसराइल के नजरिए से पाकिस्तान को छोड़कर यह पर्दे के पीछे के बेहद करीबी देश हैं। फिर यह समझौता किसके खिलाफ हुआ? यही वजह है कि तेहरान इसे बहुत बारीकी से समझ रहा है और उसने इस गठजोड़ को लेकर अपनी शर्तें साफ कर दी हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह मुस्तफा खामनेई के वरिष्ठ सलाहकार और शीर्ष सुरक्षा रणनीतिज्ञ मोहसिन रिजाई ने हाल ही में ईरान के सरकारी मीडिया को दिए इंटरव्यू में तेहरान की कूटनीतिक चालों का खुलासा कर दिया। 

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रिजाई ने साफ शब्दों में कहा कि ईरान मक्का समझौते का हिस्सा केवल एक सामान्य सदस्य के रूप में कभी नहीं बनेगा। ईरान इसमें तभी शामिल होगा जब उसे इस पूरे सुरक्षा ढांचे का कोफाउंडर माना जाए और इसके बुनियादी दस्तावेजों या फिर पॉलिसी ड्राफ्ट को तैयार करने में उसकी सोच शामिल की जाए। रिजाई ने कहा कि ईरान और मिस्र जैसे महाद्वीपीय देशों को ऐसे क्षेत्रीय सुरक्षा समझौतों से बाहर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने सऊदी अरब, तुर्की, पाकिस्तान जैसे मित्र देशों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यह बिल्कुल नामंजूर है कि वे पहले आपस में कोई ड्राफ्ट बना लें और बाद में ईरान के पास उनका समर्थन मांगने आए। ईरान इस पूरे गठजोड़ को अमेरिका की घटती सैन्य ताकत और पश्चिम एशिया में बनते पावर वैक्यूम के रूप में देख रहा है। मोसिन देसाई के मुताबिक अमेरिका ने एक क्षेत्रीय सुरक्षा का जिम्मा उठाने से हाथ खींच लिए हैं और अपने साथी देशों से कह दिया अलविदा हम जा रहे हैं। 

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वाशिंगटन के पीछे हटने से जो खालीपन आया है उसी की वजह से रियाद, अंकारा और इस्लामाबाद को अपनी सुरक्षा के लिए नया मोर्चा तैयार करना पड़ा है। हालांकि ईरानी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि ईरान को मक्का समझौते में शामिल होने का कोई आधिकारिक निमंत्रण नहीं मिला है। लेकिन सुरक्षा मसलों पर इन पड़ोसी देशों से बातचीत के रास्ते खुले रखे गए हैं। ईरान के सख्त रूप से एक बात शीशे की तरह साफ है। तेहरान किसी भी ऐसे एक क्षेत्रीय संगठन का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है जिसकी पटकथा उसकी मर्जी के बिना लिखी गई हो।

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