बुक रिव्यू- पीपल की छांव में:एक आदमी, एक पेड़ और एक ऐसी मुहिम की कहानी, जो धीरे-धीरे आंदोलन बन गई
किताब का नाम: पीपल की छांव में लेखक: पीपल बाबा प्रकाशक: पेंगुइन मूल्य: 299 रुपए हम अक्सर पर्यावरण की बात तब करते हैं, जब गर्मी बढ़ जाती है, बारिश का मौसम बदल जाता है या किसी शहर की हवा जहरीली हो जाती है। लेकिन पेड़, मिट्टी, पक्षी और प्रकृति हमारे जीवन को हर दिन कैसे प्रभावित करते हैं, इस पर कम ही सोचते हैं। देशभर में 'पीपल बाबा' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वामी प्रेम परिवर्तन ने अपना जीवन पेड़ लगाने और पर्यावरण संरक्षण के काम को समर्पित किया। उनकी किताब 'पीपल की छांव में' उनके जीवन, अनुभवों और पर्यावरण से जुड़े मिशन की कहानी है। किताब एक ऐसे बच्चे की जिज्ञासा से शुरू होती है, जिसे प्रकृति आकर्षित करती है। यही जिज्ञासा आगे चलकर उसे लाखों पेड़ लगाने की मुहिम तक पहुंचाती है। पीपल बाबा अपने सफर के जरिए दिखाते हैं कि बड़ा बदलाव अक्सर एक छोटे फैसले और लगातार किए गए प्रयास से शुरू होता है। किताब में क्या है? किताब की शुरुआत लेखक के बचपन से होती है। पिता के तबादलों के कारण उनका काफी समय देहरादून में बीता। यहीं जंगलों, पक्षियों और प्रकृति के बीच उनका जुड़ाव गहरा हुआ। एक चील को देखकर उनके मन में प्रकृति को जानने की उत्सुकता पैदा होती है। इसके बाद वे पक्षियों और वन्यजीवों के बारे में पढ़ना शुरू करते हैं और प्रकृति से उनका जुड़ाव लगातार गहरा होता जाता है। किताब में नानी का जिक्र बार-बार आता है। उनकी सीख और जीवन-दृष्टि लेखक की सोच को आकार देती है। बचपन में मिली यही सीख उन्हें प्रकृति के करीब ले जाती है। आगे चलकर मिसेज विलियम्स जैसी शिक्षिकाओं का प्रभाव, अलग-अलग लोगों से मिली सीख और जीवन के अनुभव कहानी को आगे बढ़ाते हैं। लेखक बताते हैं कि पेड़ लगाना सिर्फ पौधा रोप देना नहीं है। मिट्टी, पानी, धूप, खाद और आसपास के माहौल को समझे बिना कोई पौधा नहीं पनप सकता। इसी समझ ने धीरे-धीरे उनके काम को एक दिशा दी। कहानी आगे बढ़ती है और एक समय ऐसा आता है, जब लोग उन्हें 'पीपल बाबा' कहने लगते हैं। यहीं से किताब व्यक्तिगत यात्रा से आगे बढ़कर एक मिशन की कहानी बन जाती है। लेखक बताते हैं कि किस तरह उन्होंने लोगों के बीच जाकर पेड़ लगाने का संदेश फैलाया, किन चुनौतियों का सामना किया और कैसे एक छोटी पहल बड़े आंदोलन का रूप लेती गई। किताब के कई अध्यायों में पीपल के पेड़ का धार्मिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व भी सामने आता है। लेखक यह भी बताते हैं कि पेड़ों की कटाई, बढ़ता शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन हमारे भविष्य को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं। हालांकि किताब का स्वर कहीं भी डर पैदा करने वाला नहीं है। वह समस्या बताती है, लेकिन साथ ही समाधान की संभावना भी दिखाती है। किताब की सबसे असरदार बात इस किताब की सबसे बड़ी ताकत यह है कि लेखक अपने अनुभवों के जरिए पर्यावरण को समझाते हैं। आज पर्यावरण पर बहुत-सी किताबें और भाषण मिल जाते हैं, लेकिन यहां लेखक बार-बार अपने जीवन के अनुभवों पर लौटते हैं। वे बताते हैं कि किसी पेड़ को बचाने के लिए सिर्फ भावनाएं नहीं, समझ भी जरूरी है। कई बार वे मिट्टी की बात करते हैं, कई बार पानी की और कई बार उन लोगों की, जिनके साथ उन्होंने काम किया। किताब पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक इंसान और प्रकृति के गहरे रिश्ते को समझते हैं। उनके लिए दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि पर्यावरण की चर्चा यहां किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव की तरह सामने आती है। एक और बात जो प्रभावित करती है, वह लेखक की सादगी है। वे अपनी परेशानियां बताते हैं, आर्थिक चुनौतियों का जिक्र करते हैं और उन दिनों को भी याद करते हैं, जब उनके विचारों पर लोग भरोसा नहीं करते थे। यही ईमानदारी किताब को विश्वसनीय बनाती है। वे हिस्से जो लंबे समय तक याद रहते हैं नानी से जुड़े प्रसंग किताब के सबसे भावनात्मक हिस्सों में हैं। वे सिर्फ परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि लेखक की पहली गुरु की तरह दिखाई देती हैं। पूरी किताब में उनका प्रभाव अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। एक और दिलचस्प हिस्सा वह है, जहां लेखक बताते हैं कि लोग उन्हें 'पीपल बाबा' क्यों और कैसे कहने लगे। यह उस सफर की कहानी है, जिसमें एक व्यक्ति का जुनून उसकी पहचान बन जाता है। प्रकृति का विज्ञान भी, जीवन की सीख भी किताब की एक खास बात यह है कि लेखक अपने अनुभवों के साथ पेड़ों, मिट्टी, पानी और प्रकृति से जुड़ी कई वैज्ञानिक बातें भी समझाते हैं। वे बताते हैं कि पौधों को कितना पानी चाहिए, ज्यादा पानी क्यों नुकसान पहुंचा सकता है और प्रकृति के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं। हालांकि कुछ जगह ये हिस्से थोड़े विस्तार में चले जाते हैं। ऐसे पाठकों को, जो सिर्फ कहानी पढ़ना चाहते हैं, किताब यहां थोड़ी धीमी लग सकती है। लेकिन यही हिस्से लेखक के काम की गंभीरता भी समझाते हैं। भाषा और लिखने का ढंग किताब की एक खास बात यह है कि लेखक अपने अनुभवों के साथ पेड़ों, मिट्टी, पानी और प्रकृति से जुड़ी कई वैज्ञानिक बातें भी समझाते हैं। वे बताते हैं कि पौधों को कितना पानी चाहिए, ज्यादा पानी क्यों नुकसान पहुंचा सकता है और प्रकृति के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं। हालांकि कुछ जगह ये हिस्से थोड़े विस्तार में चले जाते हैं। ऐसे पाठकों को, जो सिर्फ कहानी पढ़ना चाहते हैं, किताब यहां थोड़ी धीमी लग सकती है। लेकिन यही हिस्से लेखक के काम की गंभीरता भी समझाते हैं। यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए? किताब के बारे में मेरी राय 'पीपल की छांव में' पढ़ते हुए सबसे ज्यादा यह बात प्रभावित करती है कि लेखक कभी जल्दबाजी में नहीं दिखते। जैसे एक पेड़ धीरे-धीरे बढ़ता है, वैसे ही उनकी कहानी भी आगे बढ़ती है। कहीं बचपन है, कहीं सीख है, कहीं संघर्ष है और कहीं एक बड़े उद्देश्य की तलाश। किताब खत्म होने के बाद सबसे ज्यादा वह जिद याद रहती है, जिसके दम पर लेखक ने एक छोटे प्रयास को बड़े आंदोलन में बदल दिया। यही इस किताब की सबसे बड़ी सफलता है। ……………………………. ये खबर भी पढ़ें… बुक रिव्यू: 14वें दलाई लामा की आत्मकथा:अपने देश और लोगों के लिए 70 साल का संघर्ष, प्रेम, करुणा और उम्मीद की सच्ची कहानी दलाई लामा ने अपना घर, मातृभूमि और संस्कृति खोने के बावजूद संवाद, करुणा और अहिंसा का रास्ता चुना। उनकी किताब ‘दलाई लामा: खामोश लोगों की ओर से’ तिब्बत के करीब 75 वर्षों के संघर्ष का दस्तावेज है। पूरी खबर पढ़ें…
पेरेंटिंग- बच्चा बहुत शेखी बघारता है:बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, झूठ भी बोलता है, पेरेंटिंग में हमसे क्या गलती हुई, उसे कैसे बदलें?
सवाल- मैं इंदौर से हूं। मेरा 6 साल का बेटा है। पिछले कुछ समय से मैं देख रही हूं कि वह दूसरों के सामने अक्सर शेखी बघारता है। बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है। कई बार ऐसी बातें भी कह देता है, जो सच नहीं होतीं। क्या इस उम्र में ऐसा व्यवहार सामान्य है? क्या यह सिर्फ बच्चों की कल्पनाशक्ति और अटेंशन पाने की कोशिश है या फिर असुरक्षा या पालन-पोषण से जुड़ा कोई संकेत? हम बिना डांटे उसके इस बिहेवियर को कैसे चेंज करें? एक्सपर्ट- रिद्धि दोषी पटेल, चाइल्ड एंड पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट, मुंबई जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। 6 साल की उम्र में बच्चों का सामाजिक और भावनात्मक विकास तेजी से हो रहा होता है। इस उम्र में वे यह समझने लगते हैं कि दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं। इसलिए कई बच्चे खुद को ज्यादा होशियार, ताकतवर या खास दिखाने की कोशिश करते हैं। कई बार वे अपनी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं या ऐसी बातें भी कह देते हैं, जो पूरी तरह सच नहीं होतीं। बच्चा शेखी क्यों बघारता है? लेकिन इसे हमेशा ‘झूठ’ या ‘खराब परवरिश’ मान लेना सही नहीं है। कई मामलों में यह बच्चे की कल्पनाशक्ति, अटेंशन पाने की इच्छा, आत्मविश्वास की कमी या सामाजिक पहचान बनाने की कोशिश हो सकती है। इसलिए बच्चे को डांटने या ‘झूठा’ कहने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। ग्राफिक में इसके संभावित कारण देखिए- हर शेखी झूठ नहीं होती जब कोई बच्चा बढ़ा-चढ़ाकर बात करता है, तो इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि वह जानबूझकर झूठ बोल रहा है। 5-7 साल की उम्र में बच्चों की कल्पनाशक्ति बहुत तेज होती है। यह झूठ है या कल्पना हालांकि, अगर बच्चा बार-बार दूसरों को प्रभावित करने, तारीफ पाने या खुद को बेहतर दिखाने के लिए जानबूझकर गलत बातें कहता है, तो उसके पीछे आत्मविश्वास की कमी, ध्यान पाने की इच्छा या कोई भावनात्मक जरूरत हो सकती है। इसलिए पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चा कल्पना कर रहा है या सच को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है। इसे कुछ उदाहरणों से समझिए- कल्पना (सामान्य) शेखी, झूठ या बढ़ा-चढ़ाकर कहना ऊपर के उदाहरणों से आप आसानी से झूठ और कल्पना के फर्क को समझ सकते हैं। इसलिए अपने बच्चे की कही बातों पर गौर करें और देखें कि वो झूठ है या उसकी कल्पना की उड़ान। अगर वो सचमुच झूठ या शेखी ही है तो हमें उसके पीछे के मनोविज्ञान और संभावित कारणों को समझने की जरूरत है। इसके पीछे क्या मनोविज्ञान है? 1. अटेंशन पाने की इच्छा अगर बच्चे को लगता है कि लोग उसकी बात तभी सुनते हैं, जब वह कुछ असाधारण या खास बताए, तो वह बढ़ा-चढ़ाकर बातें करने लगता है। 2. असुरक्षा अगर उसे लगता है कि दूसरे बच्चे उससे ज्यादा अच्छे, होशियार या तेज हैं, तो वह खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश कर सकता है। 3. कम आत्मसम्मान जिस बच्चे को अपनी खूबियों पर भरोसा नहीं होता, वह दूसरों की नजरों में बड़ा बनने की कोशिश करता है। 4. बड़ों की नकल अगर घर में बड़े लोग अक्सर अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं या दूसरों से तुलना करते हैं, तो बच्चा भी वही सीख सकता है। 5. कल्पनाशक्ति का विकास इस उम्र में कल्पनाशक्ति बहुत सक्रिय होती है। इसलिए कई बार बच्चा कहानी और हकीकत का फर्क नहीं समझ पाता। वह कल्पना और वास्तविकता को मिलाकर बातें करता है। बढ़ा-चढ़ाकर बोलना कब सामान्य है और कब इस पर ध्यान देने की जरूरत है, ग्राफिक में देखिए- बच्चे के व्यवहार को कैसे समझें? कई बार बच्चे अपनी किसी भावनात्मक जरूरत को व्यक्त करने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं। जैसेकि- जब बच्चा कहता है- "मेरे पास सबसे बड़ा खिलौना है।" तो वह हमेशा खिलौने की बात नहीं कर रहा होता। हो सकता है, वह कहना चाहता हो- यानी कई बार बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातों के पीछे बच्चे की भावनात्मक जरूरत छिपी होती है। अगर माता-पिता केवल शब्दों पर प्रतिक्रिया देंगे, तो समस्या बनी रहेगी। अगर वे भावना को समझेंगे, तो समाधान आसान होगा। माता-पिता क्या करें? 1. सबके सामने शर्मिंदा न करें 2. सच बोलने पर तारीफ करें 3. तुलना बिल्कुल न करें 4. उसके रियल अचीवमेंट्स की तारीफ करें 5. उसकी भावनाएं जानें बच्चे से पूछें- इससे बच्चा खुलकर अपनी बात बताएगा। कई बार माता-पिता अनजाने में बच्चे से कुछ ऐसी बातें कहते हैं, जो उन पर नेगेटिव प्रभाव डालती हैं। ग्राफिक में देखिए- बच्चे से क्या कहें? अगर बच्चा बढ़ा-चढ़ाकर बात करे तो शांत स्वर में कहें- ऐसी बातें बच्चे में ईमानदारी और आत्मविश्वास बढ़ाती हैं। बच्चे में कॉन्फिडेंस कैसे बढ़ाएं? जिस बच्चे को अपने आप पर भरोसा होता है, उसे दूसरों को प्रभावित करने की जरूरत कम महसूस होती है। इसलिए केवल व्यवहार बदलने की कोशिश न करें, बल्कि आत्मविश्वास बढ़ाने पर भी काम करें। इसके लिए ग्राफिक में दी गई कुछ बातों का खास ख्याल रखें। कब चाइल्ड काउंसलर से मिलना चाहिए? इन स्थितियों में चाइल्ड काउंसिलर से सलाह लें। अगर बच्चा- अंत में कहूंगी कि 6-7 साल की उम्र में बढ़ा-चढ़ाकर बातें करना बच्चे के सामान्य विकास का हिस्सा हो सकता है। इसलिए हर बार इसे झूठ या बदतमीजी मानकर डांटना-मारना सही नहीं है। माता-पिता अगर बच्चे की बात के पीछे छिपी भावना को समझें, उसे सुरक्षित माहौल दें, सच बोलने के लिए प्रोत्साहित करें और उसकी वास्तविक खूबियों की तारीफ करें, तो धीरे-धीरे यह व्यवहार अपने आप कम हो सकता है। …………………… पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- 10 साल का बेटा कोई काम खुद नहीं करता: चाहता है, सबकुछ कोई और करके दे, उसे घर के काम करना, जिम्मेदार होना कैसे सिखाएं? बच्चों को उम्र के अनुसार छोटी-छोटी जिम्मेदारियां देना बिल्कुल भी गलत नहीं है। लेकिन यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘जिम्मेदारी सिखाने’ और ‘बच्चे से काम करवाने’ में एक बारीक अंतर है। पूरी खबर पढ़िए…
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