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Explainer: 50 की उम्र में बना ICC नंबर-1 टेस्ट गेंदबाज... जानें कौन हैं 5 सबसे उम्रदराज बॉलर्स, जिन्होंने दुनिया को झुकाकर रचा इतिहास

ICC Test Bowling Raikings: क्रिकेट में बढ़ती उम्र के साथ खिलाड़ियों के प्रदर्शन में गिरावट आना स्वाभाविक माना जाता है, लेकिन क्रिकेट को कुछ ऐसे दिग्गज मिले जिन्होंने ढलती उम्र में भी अपनी फिरकी और रफ्तार से दुनिया पर राज किया. टेस्ट फॉर्मेट से ही साल 1877 में इंटरनेशनल क्रिकेट की शुरुआत हुई थी. तब से लेकर अब तक 149 साल के टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में कई महारथी खिलाड़ियों ने ऐसे रिकॉर्ड बनाए हैं जो आज भी कायम हैं. हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के स्टार तेज गेंदबाज मिचेल स्टार्क आईसीसी नंबर-1 टेस्ट बॉलर बने हैं. स्टार्क ने 36 साल की उम्र में यह कारनामा किया है, लेकिन आपको बता दें कि टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में सबसे उम्रदराज आईसीसी नंबर-1 टेस्ट बॉलर्स की टॉप-5 लिस्ट में स्टार्क शामिल नहीं हैं. ऐसे में अब फैंस के मन में यह सवाल जरूर होगा कि आखिर इस टॉप-5 की लिस्ट में कौन-कौन है और सबसे उम्रदराज होने का रिकॉर्ड किसके नाम है. तो चलिए इस आर्टिकल में जानते हैं.

बर्ट आयरनमोंगर - ऑस्ट्रेलिया, नंबर-1 बनते समय उम्र: 50 साल

ICC के ऐतिहासिक रेटिंग बैक-डेटा देखने पर टेस्ट इतिहास के कई हैरान करने वाले रिकॉर्ड्स सामने आए हैं. बता दें कि आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में सबसे उम्रदराज नंबर-1 गेंदबाज बनने का रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया के स्पिनर बर्ट आयरनमोंगर के नाम है, जो फरवरी 1933 में 'बॉडीलाइन सीरीज' के दौरान 50 साल और 10 महीने की उम्र में आईसीसी नंबर-1 टेस्ट गेंदबाज बने थे. बता दें कि बर्ट आयरनमोंगर के टेस्ट करियर की शुरुआत ही 46 साल की उम्र में हुई थी. वह बचपन में एक हादसे के कारण अपने बाएं हाथ की उंगली का अगला हिस्सा गंवा चुके थे, इसके बावजूद वह एक शानदार स्पिनर बने. उन्होंने अपने करियर में सिर्फ 14 टेस्ट मैच खेले और इस दौरान उन्होंने 17.97 की जादुई औसत से कुल 74 विकेट अपने नाम किए.

क्लैरी ग्रिमेट - ऑस्ट्रेलिया, नंबर-1 बनते समय उम्र: 44 साल

टेस्ट क्रिकेट में सबसे उम्रदराज आईसीसी टेस्ट बॉलर बनने के मामले में ऑस्ट्रेलिया के लेग स्पिनर क्लैरी ग्रिमेट दूसरे नंबर पर मौजूद हैं. उन्होंने फरवरी 1936 में 44 साल और 2 महीने की उम्र में ICC नंबर-1 टेस्ट गेंदबाज बनने का कारनामा किया था. न्यूजीलैंड में जन्मे लेकिन ऑस्ट्रेलिया के लिए खेलने वाले क्लैरी ग्रिमेट को टेस्ट क्रिकेट में 'फ्लिपर' गेंद का आविष्कारक माना जाता है. उन्होंने अपने करियर में 37 टेस्ट मैच खेले, जिसमें कुल 216 विकेट चटकाए. वह क्रिकेट इतिहास के पहले ऐसे गेंदबाज थे जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 200 विकेट का आंकड़ा छुआ था. साल 1936 में साउथ अफ्रीका के खिलाफ बेहतरीन गेंदबाजी कर क्लैरी ग्रिमेट 44 साल की उम्र में आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में नंबर-1 बने थे.

'टिच' फ्रीमेन - इंग्लैंड, नंबर-1 बनते समय उम्र: 41 साल

इंग्लैंड के महान लेग स्पिनर रहे टिच फ्रीमेन इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर आते हैं. टिच फ्रीमेन 41 साल और 2 महीने की उम्र में ICC नंबर-1 टेस्ट गेंदबाज बने थे. अल्फ्रेड 'टिच' फ्रीमेन की लंबाई महज 5 फीट 2 इंच थी, इसलिए उन्हें 'टिच' कहा जाता था. उन्होंने इंग्लैंड के लिए इंटरनेशनल क्रिकेट में सिर्फ 12 टेस्ट मैच खेले और इस दौरान कुल 66 विकेट अपने नाम किए थे, लेकिन उनका फर्स्ट-क्लास क्रिकेट रिकॉर्ड अविश्वसनीय रहा है. उन्होंने अपने फर्स्ट क्लास करियर की बात करें तो उन्होंने कुल 592 मुकाबले खेले, जिसमें उन्होंने 18.42 की औसत से कुल रिकॉर्ड 3776 विकेट अपने नाम किए.

फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उनसे ज्यादा विकेट लेने का कारनामा सिर्फ विल्फ्रेड रोड्स ही कर पाए हैं, जिन्होंने कुल 4204 विकेट चटकाए हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि टिच फ्रीमेन ने साल 1928 में अकेले एक सीजन में 304 विकेट चटकाए थे, और आज भी यह रिकॉर्ड कायम है. उन्हें साल 1929 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ दमदार प्रदर्शन के दम पर ICC रैंकिंग में नंबर-1 टेस्ट गेंदबाज आंका गया था. 

सिडनी बार्न्स - इंग्लैंड, नंबर-1 बनते समय उम्र: 40 साल

इंग्लैंड के महान गेंदबाज सिडनी बार्न्स आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में सबसे उम्रदराज नंबर-1 टेस्ट बॉलर बनने के मामले में चौथे नंबर पर काबिज हैं. सिडनी बार्न्स 40 साल और 9 महीने की उम्र में आईसीसी नंबर-1 टेस्ट बॉलर बने थे. सिडनी बार्न्स को क्रिकेट इतिहास के सबसे खतरनाक गेंदबाजों में गिना जाता है. उनके पास मध्यम-तेज गति से गेंद को दोनों तरफ स्विंग और स्पिन कराने की अद्भुत कला थी. उन्होंने सिर्फ 27 टेस्ट मैचों में 16.43 के शानदार औसत से कुल 189 विकेट अपने नाम किए थे. उन्होंने साल 1913-14 में साउथ अफ्रीका के खिलाफ अपनी आखिरी टेस्ट सीरीज में सिर्फ 4 मैचों में 49 विकेट लेकर दुनिया को हैरान कर दिया था, जिसके दम पर सिडनी बार्न्स साल 1914 में 40 साल की उम्र में आईसीसी नंबर-1 बॉलर बने थे.

जेम्स एंडरसन - इंग्लैंड, नंबर-1 बनते समय उम्र: 40 साल

इंग्लैंड के दिग्गज तेज गेंदबाज जेम्स एंडरसन आधुनिक क्रिकेट के इकलौते खिलाड़ी हैं, जो टॉप-5 की इस लिस्ट में शामिल हैं. बर्ट आयरनमोंगर और सिडनी बार्न्स के दौर के 87 साल बाद फरवरी 2023 में न्यूजीलैंड के खिलाफ शानदार प्रदर्शन कर जेम्स एंडरसन आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में नंबर-1 बॉलर बने थे. इस दौरान उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के पैट कमिंस को पीछे छोड़ा था. जेम्स एंडरसन ने 40 साल और 207 दिन की उम्र में ICC नंबर-1 टेस्ट बॉलर बनने की ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की थी. टेस्ट क्रिकेट में बतौर तेज गेंदबाज 700 से अधिक विकेट (704 विकेट) लेने वाले जेम्स एंडरसन दुनिया के एकमात्र तेज गेंदबाज हैं.

मिचेल स्टार्क बने 8वें गेंदबाज

भारतीय ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन इस लिस्ट में छठे नंबर पर काबिज हैं, जो मार्च 2024 में इंग्लैंड के खिलाफ अपने 100वें टेस्ट के बाद 37 साल और 172 दिन की उम्र में आईसीसी नंबर-1 टेस्ट गेंदबाज बने थे. वहीं श्रीलंका के महान मुथैया मुरलीधरन साल 2008 में 36 साल और 221 दिन की उम्र में लंबे समय तक दुनिया के नंबर-1 टेस्ट बॉलर बने रहे थे. अब ऑस्ट्रेलिया के बाएं हाथ के स्टार तेज गेंदबाज मिचेल स्टार्क ने भी अपनी धारदार गेंदबाजी के दम पर 36 साल की उम्र में नंबर-1 टेस्ट बॉलर बनने का यह गौरव हासिल किया है.

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एच1एन1 को लेकर घबराने की जरूरत नहीं, कुछ लोगों को बरतनी होगी सावधानी : प्रो. गांगुली

नई दिल्ली, 26 अगस्त (आईएएनएस)। देश के कई हिस्सों में एच1एन1 यानी स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। ऐसे में लोगों के मन में कई सवाल हैं। क्या यह कोरोना जैसा खतरनाक है, इसके लक्षण क्या हैं, कब टेस्ट जरूरी है और किन लोगों को वैक्सीन लगवानी चाहिए? इन तमाम सवालों पर पद्म भूषण पुरस्कार विजेता, आईसीएमआर के पूर्व महानिदेशक, माइक्रोबायोलॉजिस्ट और ट्रॉपिकल बीमारियों के विशेषज्ञ प्रोफेसर निर्मल कुमार गांगुली ने आईएएनएस से खास बातचीत की।

प्रोफेसर गांगुली ने बताया कि इन्फ्लुएंजा वायरस कोई नया वायरस नहीं है। यह लंबे समय से इंसानों के बीच मौजूद है और समय-समय पर इसके अलग-अलग स्ट्रेन सामने आते रहते हैं। इन्फ्लुएंजा वायरस मुख्य रूप से टाइप ए और टाइप बी में बांटे जाते हैं। एच1एन1, इन्फ्लुएंजा ए वायरस का एक स्ट्रेन है। वायरस के अलग-अलग स्ट्रेन जानवरों और पक्षियों में भी पाए जाते हैं। सूअर और प्रवासी पक्षी इसके प्राकृतिक होस्ट माने जाते हैं। हालांकि, इंसानों में इस समय फैल रहा एच1एन1 मुख्य रूप से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संक्रमण के जरिए फैलता है।

एच1एन1 मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या सांस लेने के दौरान निकलने वाली बूंदों के जरिए फैल सकता है। बंद और भीड़भाड़ वाली जगहों पर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, संक्रमित लोगों को छूने और फिर बिना हाथ धोए आंख, नाक या मुंह छूने से भी संक्रमण फैल सकता है।

इन्फ्लुएंजा वायरस ज्यादातर मानसून या जनवरी-फरवरी के महीने में ज्यादा लोगों को संक्रमित करता है। इसलिए फ्लू के मौसम में स्कूल, कॉलेज, सिनेमा हॉल, भीड़भाड़ वाले कार्यक्रमों और बंद जगहों पर अतिरिक्त सावधानी बरतना बेहतर है। अगर ऐसी जगहों पर जाना जरूरी हो तो मास्क का इस्तेमाल भी मददगार हो सकता है।

एच1एन1 के लक्षण कई दूसरे वायरल संक्रमणों जैसे ही हो सकते हैं। इनमें बुखार, नाक बहना, खांसी, गले में परेशानी, शरीर में दर्द, कमजोरी और थकान प्रमुख हैं। कई लोगों को ऐसा महसूस होता है कि शरीर में बिल्कुल जान नहीं बची है। ज्यादातर स्वस्थ लोगों में संक्रमण सामान्य फ्लू की तरह रह सकता है और आराम, पर्याप्त पानी और सामान्य देखभाल से ठीक हो जाता है। कुछ लोगों में यह गंभीर रूप ले सकता है और निमोनिया जैसी समस्या पैदा कर सकता है।

प्रोफेसर गांगुली के अनुसार, 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग और पांच साल से कम उम्र के बच्चे फ्लू के गंभीर संक्रमण के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील होते हैं। इसके अलावा जिन लोगों को पहले से कोई बीमारी है, उन्हें भी विशेष सावधानी रखनी चाहिए। इनमें डायबिटीज, हृदय संबंधी बीमारी, क्रोनिक किडनी डिजीज, डायलिसिस कराने वाले मरीज, कैंसर और कीमोथेरेपी ले रहे मरीज, अंग प्रत्यारोपण करा चुके लोग और कमजोर इम्युनिटी वाले मरीज शामिल हैं। ऐसे लोगों में अगर फ्लू जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

उनका कहना है कि अगर फ्लू के ज्यादातर मामले एक ही स्ट्रेन के कारण सामने आ रहे हों और व्यक्ति में सामान्य फ्लू जैसे लक्षण हों, तो हर मरीज का टेस्ट कराना जरूरी नहीं है। ऐसे मामलों में मरीज घर पर आराम कर सकता है, पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ ले सकता है और डॉक्टर की सलाह के अनुसार बुखार आदि के लिए दवा ले सकता है। लेकिन, अगर सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, ऑक्सीजन लेवल कम होना, लगातार तेज बुखार या हालत बिगड़ने जैसे संकेत दिखाई दें तो तुरंत अस्पताल जाना चाहिए। ऐसे मरीजों में टेस्ट और चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत पड़ सकती है।

वहीं, बीमारी की निगरानी यानी सर्विलांस के लिए टेस्टिंग और सीक्वेंसिंग बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह पता लगाया जाता है कि वायरस का कोई नया स्ट्रेन या म्यूटेशन तो सामने नहीं आ रहा।

प्रोफेसर गांगुली ने कहा कि एच1एन1 और कोविड-19 दोनों श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं और दोनों में बुखार, खांसी, कमजोरी और निमोनिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। दोनों वायरस अलग-अलग परिवारों से आते हैं और उनकी जैविक संरचना अलग है। कोविड-19 में कुछ मरीजों में हृदय और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं ज्यादा देखने को मिली थीं, जबकि सामान्य इन्फ्लुएंजा में ऐसी जटिलताएं उसी स्तर पर आम नहीं हैं। हालांकि, दोनों ही संक्रमणों में गंभीर स्थिति में निमोनिया हो सकता है। एच1एन1 के इलाज में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख एंटीवायरल दवा ओसेल्टामिविर है।

प्रोफेसर गांगुली ने बताया कि यह इन्फ्लुएंजा वायरस में काम करती है, कोविड-19 में नहीं। इसका असर बीमारी के शुरुआती चरण में, खासकर लक्षण शुरू होने के करीब 48 घंटे के भीतर शुरू करने पर ज्यादा प्रभावी माना जाता है।

यह प्रिस्क्रिप्शन ड्रग है, इसलिए इसे खुद से मेडिकल स्टोर से लेकर खाने के बजाय डॉक्टर की सलाह पर ही लेना चाहिए। फ्लू से बचाव के लिए वैक्सीन उपलब्ध हैं। खासकर बुजुर्गों, बच्चों और कोमॉर्बिडिटी वाले मरीजों को डॉक्टर की सलाह से वैकसीन जरूर लेनी चाहिए। युवाओं के लिए वैकसीन लगवाना ज्यादा जरूरी नहीं है।

--आईएएनएस

पीआईएम/एबीएम

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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