भारत में बदलता आईवीएफ का दौर: एडवांस डायग्नोस्टिक टेक्नोलॉजी और एआई ने कैसे सुधारे फर्टिलिटी के नतीजे
IVF in India: भारत में फर्टिलिटी का क्षेत्र बहुत तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है। बांझपन अब केवल एक शारीरिक समस्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश के कार्यबल, स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था और आर्थिक प्रगति पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डालने वाला एक गंभीर संकट बनता जा रहा है।
वर्तमान समय में ज़्यादातर कामकाजी महिलाएँ माँ बनने में देरी कर रही हैं, और खराब जीवनशैली तथा स्वास्थ्य से जुड़ी जटिलताओं के कारण पुरुषों और महिलाओं दोनों में इनफर्टिलिटी की समस्या बढ़ रही है। ऐसे में इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) जैसी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजीज़ (ART) देश भर के उन जोड़ों के लिए एकमात्र बड़ी उम्मीद बन गई हैं जो सही समय पर अपना परिवार बढ़ाने का सपना देख रहे हैं।
आधुनिक तकनीक और एआई से बदली आईवीएफ की दुनिया
आज जब हम कृत्रिम रूप से निषेचित दुनिया की पहली बच्ची, लुईस जॉय ब्राउन के जन्म और आईवीएफ के लगभग 47 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं, तो यह बेहद जरूरी है कि हम उन सटीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित और अत्यधिक आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों पर नजर डालें, जिन्होंने आईवीएफ के परिणामों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। इस बदलाव के मुख्य चरण इस प्रकार हैं:
- ओवेरियन स्टिमुलेशन: पहले यह प्रक्रिया काफी हद तक साधारण 2D पेल्विक अल्ट्रासाउंड और सीमित ब्लड टेस्ट पर निर्भर थी, जिससे सटीक स्थिति का अनुमान लगाना कठिन होता था। वहीं आज, हाई-रिज़ॉल्यूशन माइक्रोस्कोप, आधुनिक इमेजिंग टूल्स और डेटा-संचालित तकनीकों की मदद से डॉक्टर अंडों के विकास पर बारीकी से नजर रखते हैं। इससे ओवेरियन हाइपर-स्टिमुलेशन सिंड्रोम (OHSS) का जोखिम घटता है और हर मरीज के लिए सटीक दवाइयां तय करना आसान होता है।
- एग रिट्रीवल: पहले इस प्रक्रिया के लिए पेट पर चीरा लगाकर लैप्रोस्कोपिक सर्जरी और अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ती थी। आधुनिक समय में, मरीज को हल्का बेहोश करके ट्रांस-वैजाइनल अल्ट्रासाउंड इमेजिंग और वैक्यूम एस्पिरेशन सुई की मदद से सुरक्षित तरीके से अंडे निकाले जाते हैं, जिससे आसपास के अंगों को नुकसान का खतरा नहीं रहता।
- फर्टिलाइजेशन: पहले एम्ब्रियोलॉजिस्ट केवल माइक्रोस्कोप के जरिए देखकर और साधारण पेट्री डिश में स्पर्म मिलाकर अनुमान लगाते थे, जिससे संक्रमण या फर्टिलाइज न होने का खतरा रहता था। आज आधुनिक टाइम-लैप्स इनक्यूबेटर हर 5-20 मिनट में भ्रूण की डिजिटल तस्वीरें लेते हैं, और IMSI जैसे हाई मैग्निफिकेशन टूल्स की मदद से सबसे बेहतरीन स्पर्म चुने जाते हैं।
- प्री-इम्प्लांटेशन: पहले बिना आधुनिक जेनेटिक टेस्टिंग के केवल माइक्रोस्कोप के आधार पर निर्णय लिया जाता था, जिससे गर्भपात का जोखिम अधिक था। वर्तमान में, टाइम-लैप्स एम्ब्रियो मॉनिटरिंग, एआई और प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग (PGT) जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, ईआरए (ERA) टेस्ट जैसे डायग्नोस्टिक टूल से गर्भाशय की परत (एंडोमेट्रियल लाइनिंग) द्वारा भ्रूण को स्वीकार करने के सबसे सटीक समय का पता लगाया जाता है।
- एम्ब्रियो ट्रांसफर: पहले 'ब्लाइंड' तरीके से डॉक्टर अपने अनुभव के आधार पर भ्रूण को गर्भाशय में रखते थे, जिससे संक्रमण या कई भ्रूण डालने के कारण जुड़वां बच्चों के जन्म व गर्भपात की दर बढ़ जाती थी। आज अल्ट्रासाउंड-गाइडेड एम्ब्रियो ट्रांसफर (UGET) और क्रायोप्रिजर्वेशन टेक्नोलॉजी की मदद से सही समय पर सही भ्रूण को सुरक्षित रूप से स्थापित करना संभव हो गया है।
आईवीएफ बाजार का भविष्य और बढ़ता दायरा
भारत में बांझपन की बढ़ती समस्या और घटती प्रजनन दर के बीच, देश भर के आईवीएफ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने में आधुनिक एआई और डायग्नोस्टिक कंपनियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह योगदान देश के सभी 4,281 एआरटी (ART) रजिस्टर्ड क्लीनिकों के साथ-साथ शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, लैब्स और चिकित्सकों के लिए अत्यंत मूल्यवान साबित हो रहा है।
अनुमान के मुताबिक, भारत का 1 अरब डॉलर (1 बिलियन डॉलर) का आईवीएफ बाजार वर्ष 2034 तक बढ़कर 4 अरब डॉलर का हो जाएगा। देश में प्रतिवर्ष लगभग 2.5 से 3 लाख आईवीएफ प्रक्रियाएं की जाती हैं, जबकि एक अनुमान के अनुसार करीब 2.8 करोड़ महिलाएँ बांझपन की समस्या से जूझ रही हैं। माँग और उपलब्धता के बीच का यही अंतर भविष्य में एक बहुत बड़ा अवसर प्रस्तुत करता है।
विशेष लेख: यह जानकारी ए.आर. घटक (सीनियर वाइस प्रेसिडेंट – आईवीएफ डिवीज़न, हानाहेल्थ बाय डीएसएस इमेजटेक) के विचारों पर आधारित है।
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