MS DHONI और CSK के रिश्तों में आखिर 18 साल बाद क्यों आई खटास? जानिए क्या है पूरा विवाद
CSK on MS DHONI : महेंद्र सिंह धोनी और चेन्नई सुपर किंग्स 2008 से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. धोनी इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) में चेन्नई सुपर किंग्स की पहचान बन चुके हैं. जब-जब सीएसके का नाम आता है, पांच बार के विजेता कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का नाम सबसे पहले याद आता है. अब लेकिन सीएसके और धोनी के रिश्तों में खटास आ गई है. दरअसल, एक रिपोर्ट की मानें तो, CSK में हिस्सेदारी खरीदने को लेकर महेंद्र सिंह धोनी और फ्रेंचाइजी के बीच बातचीत बेनतीजा रही और इसकी वजह से दोनों के रिश्ते खराब होते हुए नजर आ रहे हैं. धोनी ने फ्रेंचाइजी में हिस्सेदारी खरीदने में दिलचस्पी दिखाई थी. लेकिन हिस्सेदारी के प्रतिशत पर दोनों के बीच सहमत नहीं पाई है. इस पूरे मामले की सच्चाई क्या है. आइए इसके बारे में जानते हैं.
Explainer: अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों कैसे जवाब दे सकता है ईरान, क्या हैं तेहरान के पास विकल्प?
Explainer: अमेरिका और ईरान के बीच हुई जंग का असर पूरी दुनिया पर देखने को मिली है. इस जंग ने पूरे मिडिल ईस्ट को भारी संकट में डाल दिया. ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सत्ता परिवर्तन को लेकर शुरू हुई इस जंग में ईरान को भारी जान और माल का नुकसान उठाना पड़ा है. लेकिन ईरान ने भी अमेरिका और इजरायल को करारा जवाब दिया है. जिसमें दोनों देशों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है.
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के लिए कई दौर की बातचीत हुई लेकिन बात नहीं बनी. ऐसे में अमेरिका ने ईरान से निपटने के लिए अब उसे आर्थिक रूप से चोट पहुंचाने का रास्ता चुना है. जिसके तहत अमेरिका ने ईरान पर कई आर्थिक प्रतिबंधों का एलान किया है. लगभग छह महीने की लड़ाई के बाद ईरान को अपनी शर्तें मानने पर मजबूर करने के लिए अमेरिका की ओर से "इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध" लगाने की धमकी ने खाड़ी क्षेत्र में फिर से नया तनाव पैदा होने की आशंका बढ़ा दी है.
US के आर्थिक दवाब का कैसे जवाब दे सकता है ईरान?
ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बाद अब सवाल ये है कि ईरान इन प्रतिबंधों से कैसे अपने आप को बाहर निकालेगा और अमेरिका को कैसे इसका जवाब देगा. क्या ईरान मध्य पूर्व से और अधिक तेल की आपूर्ति रोक सकता है? क्योंकि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के पूर्व प्रमुख और ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रेजाई पहले ही तेल निर्यात बंद करने की धमकी दे चुके हैं. जो 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से तेहरान की मुख्य रणनीतिक चालों में से एक रही है. उन्होंने कहा, "अगर आर्थिक युद्ध जारी रहा, तो न तो होर्मुज जलडमरूमध्य से और न ही फारस की खाड़ी में कहीं से भी तेल की एक बूंद भी निर्यात की जाएगी."
ईरान के हमलों और जहाजों को दी गई धमकियों की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला ज्यादातर ट्रैफिक पहले ही रुक चुका है. इससे वह जलमार्ग काफी हद तक बंद हो गया है, जिसके जरिए संघर्ष से पहले दुनिया की कुल ऊर्जा का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता था. हालांकि हाल के हफ्तों में कुछ ऑयल टैंकर इस जलडमरूमध्य से गुजरे हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है.
बीते रविवार को ईरान ने 45 टैंकरों को ब्लैकलिस्ट कर दिया; ईरान का कहना है कि ये टैंकर होर्मुज शिपिंग पर लागू किए जाने वाले नियमों का पालन करने में नाकाम रहे हैं. इस दौरान खाड़ी से निकलने की कोशिश कर रहे टैंकरों पर मिसाइल, ड्रोन या स्पीडबोट से हुए हमलों के कारण इन छह महीने के टकराव के दौरान बार-बार तेल की कीमतें बढ़ी हैं.
लाल सागर में हूतियों ने किया शिपिंग को सीमित
इस बीच, तेहरान के सहयोगी हूती गुट ने लाल सागर में शिपिंग को सीमित कर दिया है. वे सऊदी अरब की सभी शिपिंग को रोकने की धमकी दे रहे हैं और हमले भी कर रहे हैं. सऊदी अरब का कच्चा तेल इसी रास्ते से यमन में हूती गुट के गढ़ के पास बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से होकर एशिया तक पहुंचता है.
शुरुआत में इन हमलों से कुछ ही जहाज रुके थे और अगस्त के मध्य तक आधे से ज्यादा जहाज गुजर पा रहे थे, लेकिन शिपिंग कंपनियों के लिए हालात मुश्किल बने हुए हैं. इंडस्ट्री के सूत्रों के मुताबिक, अब चीनी शिपिंग कंपनियां बाब अल-मंदेब के बजाय दूसरे रास्तों का इस्तेमाल कर रही हैं.
अगर और हमले होते हैं- जैसे सोमवार को यानबू में सऊदी अरब के मुख्य रेड सी ऑयल टर्मिनल के पास एक जहाज को निशाना बनाया गया या अगस्त की शुरुआत में स्वेज नहर के पास ड्रोन हमला हुआ तो इससे तेल बाजार में चिंता बढ़ सकती है और कच्चे तेल की कीमतें भी ऊपर जा सकती हैं.
क्या खाड़ी देशों पर अभी भी हमले कर सकता है ईरान?
अमेरिका का आर्थिक प्रतिबंधों के बाद ईरान ने धमकी दी है कि अगर कोई पड़ोसी देश अमेरिका की उस कोशिश में शामिल होता है जिसका मकसद ईरान की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना है, तो वह "भूकंप" जैसी ताकत के साथ उसका जवाब देगा. युद्ध के दौरान इसने बार-बार खाड़ी देशों और जॉर्डन को निशाना बनाया है. इसने ज्यादातर अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया है, लेकिन साथ ही एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरी जगहों को भी निशाना बनाया है.
अगर तेल या गैस की शुरुआती सुविधाओं (अपस्ट्रीम फैसिलिटीज) पर हमले तेज होते हैं, तो इससे एनर्जी की कीमतें और बढ़ सकती हैं. इससे ट्रंप प्रशासन को राजनीतिक नुकसान हो सकता है और शिपिंग पर होने वाले हमलों की तुलना में इन हालात को बदलना ज्यादा मुश्किल हो सकती है.
बता दें कि इस गर्म और सूखे इलाके में बिजली और पानी को खारेपन से मुक्त करने वाले प्लांट (डिसैलिनेशन प्लांट) को निशाना बनाने से अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देशों के लिए भी बड़ा खतरा पैदा हो सकता है, क्योंकि ये देश ग्लोबल इकॉनमी के लिए अहम फाइनेंशियल हब हैं.
क्या ईरान सीधे पश्चिमी देशों पर कर सकता है हमला?
दरअसल, पश्चिमी देश ईरान के मुख्य हथियारों की रेंज से बाहर हैं, लेकिन रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने पहले भी हमले के दूसरे तरीके खोजने में तैयारी की है. दो दिन पहले ही ब्रिटेन ने कहा कि ईरान से जुड़े हैकर्स ने बिजली के एक छोटे स्टेशन को बंद कर दिया था, जबकि अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि मिनेसोटा में पानी के प्लांट पर हुए साइबर हमलों के पीछे तेहरान का हाथ हो सकता है. हालांकि ईरान ने इन आरोपों पर कोई टिप्पणी नहीं की है. पश्चिमी सुरक्षा एजेंसियों ने ईरान पर यह आरोप भी लगाया है कि वह पश्चिम में हमले करने या हत्या की कोशिशों के लिए स्थानीय लोगों को भर्ती कर रहा है. ईरान ने इन आरोपों से इनकार किया है.
फरवरी में हुई थी जंग की शुरुआत
बता दें कि अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान पर संयुक्त हमले किए थे. इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई समेत उनके परिवार के कई लोगों की मौत हो गई. इन हमलों का ईरान भी भी करारा जवाब दिया और मिडिल ईस्ट के देशों में स्थित अमेरिकी सेना के ठिकानों पर ताबड़तोड़ मिसाइल और ड्रोन हमले कर दिए.
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यही नहीं ईरान ने लेबनान की ओर से इजरायली क्षेत्र पर ताबड़तोड़ मिसाइल और ड्रोन हमले किए. इन हमलों ने पूरी मिडिल ईस्ट को दहला दिया. करीब 40 दिनों तक चली जंग अप्रैल के दूसरे सप्ताह में थम गई. लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच हुई शांति वार्ता विफल हो गईं. जुलाई आते-आते फिर से हमलों की शुरुआत हो गई. और अब अमेरिका हमलों के बजाय ईरान आर्थिक प्रतिबंधों को प्राथमिकता दे रहा है.
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