तीज का उत्सव श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह महिलाओं का उत्सव है। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी ओढ़नी से आच्छादित होती है उस अवसर पर महिलाओं के मन मयूर नृत्य करने लगते हैं। वृक्ष की शाखाओं में झूले पड़ जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और आनन्द मनाती हैं।
सौंदर्य, प्रेम के उत्सव और आस्था के इस व्रत का महिलाओं के लिए बड़ा महत्व है, विशेष रूप से नव विवाहिताओं के लिए। यह त्योहार मुख्य रूप से उत्तर भारत (राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर पदेश, बिहार और झारखंड) में धूमधाम से मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार नवविवाहिताएं पहला व्रत मायके में रखती हैं और इसके लिए झूले सजाए जाते हैं, लोक गीत गाए जाते हैं। देश के कई हिस्सों में मेले लगते हैं और माता पार्वती की सवारी निकाली जाती है।
वर्षा ऋतु में श्रावण के महीने में हमारे देश में चारों तरफ पानी बरसता रहता है। इस दौरान चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आती है। हरियाली के आगोश में प्रकृति इस तरह झूम उठती है मानो पृथ्वी अपनी हरी-भरी बाहें फैलाकर सबका अभिनंदन कर रही हो। श्रावण के महीने को हिंदू धर्मावलंबी भगवान शिव का महीना मान मानकर भगवान शिव की पूजा अर्चना करते हैं। कावड़िए देशभर में विभिन्न नदी, तालाबों से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। गणगौर के बाद त्योहारों का सिलसिला रुक जाता है वह एक बार फिर श्रावण मास की तीज से प्रारंभ हो जाता है। श्रावण का महीना महिलाओं के लिए विशेष उल्लास का महीना होता है। इस महीने में आने वाले अधिकांश लोक पर्व महिलाओं द्वारा ही मनाए जाते हैं।
श्रावण मास का आगमन ही इस त्यौहार के आने की आहट सुनाने लगता है। समस्त सृष्टि सावन के अदभूत सौंदर्य में भिगी हुई सी नजर आती है। यह पर्व भारतीय जनमानस के अटूट विश्वास को और अधिक प्रगाढ़ता प्रदान करने का पर्व है। इस पर्व में हरियाली शब्द से ही साफ है कि इसका ताल्लुक पेड़-पौधों और पर्यावरण से है। यह त्योहार जीवन में जश्न का प्रतीक है और हरियाली तीज का पर्व प्रकृति का त्योहार हैं। इस मौके पर महिलाएं अच्छी फसल के लिए भी प्रार्थना करती हैं।
सावन के महीने में सिंजारा, तीज, नागपंचमी एवं सावन के सोमवार जैसे लोकपर्व उत्साह पूर्वक मनाए जाते हैं। श्रावण के महीने में मनायी जानेवाली हरियाली तीज आस्था, प्रेम, सौंदर्य व उमंग का त्यौहार है। तीज को मुख्यतः महिलाओं का त्यौहार माना जाता है। यह पर्व महिलाओं की सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रतीक है। सावन माह में मनाया जाने वाला हरियाली पर्व दंपतियों के वैवाहिक जीवन में समृद्धि, खुशी और तरक्की का प्रतीक है। तीज का त्यौहार भारत के कोने-कोने में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह त्यौहार भारत के उत्तरी क्षेत्र में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है।
श्रावण में में चारों ओर हरियाली की चादर सी बिखर जाती है। जिसे देख कर सबका मन झूम उठता है। सावन का महिना एक अलग ही मस्ती और उमंग लेकर आता है। श्रावण के सुहावने मौसम के मध्य में आता है तीज का त्यौहार। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज कहते हैं। उत्तर भारत में यह हरियाली तीज के नाम से भी जानी जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए इस व्रत का पालन किया था। परिणामस्वरूप भगवान शिव ने उनके तप से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था। माना जाता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने सौ वर्षों के तप उपरान्त भगवान शिव को पति रूप में पाया था। इसी मान्यता के अनुसार स्त्रियां माता पार्वती का पूजन करती हैं। हाथों में रची मेंहंदी की तरह ही प्रकृति पर भी हरियाली की चादर सी बिछ जाती है। इस नयनाभिराम सौंदर्य को देखकर मन में स्वतः ही मधुर झनकार सी बजने लगती है और हृदय पुलकित होकर नाच उठता है। इस समय वर्षा ऋतु की बौछारें प्रकृति को पूर्ण रूप से भिगो देती हैं। सावन की तीज में महिलाएं व्रत रखती हैं। इस व्रत को अविवाहित कन्याएं योग्य वर को पाने के लिए करती हैं तथा विवाहित महिलाएं अपने सुखी दांपत्य की चाहत के लिए करती हैं।
तीज पर मेहंदी लगाने, चूडियां पहनने, झूला झूलने तथा लोक गीतों को गाने का विशेष महत्व है। तीज के त्यौहार वाले दिन खुले स्थानों पर बड़े-बड़े वृक्षों की शाखाओं पर, घर की छत पर या बरामदे में झूले लगाए जाते हैं जिन पर स्त्रियां झूला झूलती हैं। हरियाली तीज के दिन अनेक स्थानों पर मेलों का भी आयोजन होता है।
राजस्थान में जिन कन्याओं की सगाई हो गई होती है। उन्हें अपने होने वाले सास ससुर से एक दिन पहले ही भेंट मिलती है। इस भेंट को स्थानीय भाषा में सिंझारा कहते हैं। सिंझारा में मेंहदी, लाख की चूडियां, लहरिया नामक विशेष वेश-भूषा, घेवर नामक मिठाई जैसी कई वस्तुएं होती हैं। पीहर पक्ष द्धारा अपनी विवाहित पुत्री को भी सिंजारा भेजा जाता है। जिसे पूजा के बाद सास को सुपुर्द कर दिया जाता है। राजस्थान में नवविवाहिता युवतियों को सावन में ससुराल से मायके बुलाने की भी परम्परा है।
तीज के अवसर पर नवयुवतियां हाथों में मेंहदी रचाते हुए गीत गाती हैं। समूचा वातावरण शृंगार से अभिभूत हो उठता है। इस त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता है कि महिलाओं का हाथों पर विभिन्न प्रकार से बेलबूटे बनाकर मेंहदी रचाना। राजस्थान में हाथों व पांवों में भी विवाहिताएं मेंहदी रचाती हैं। जिसे मेंहदी मांडना कहते हैं। इस दिन राजस्थानी बालाएं दूर देश गए अपने पति के तीज पर आने की कामना करती हैं। जो कि उनके लोकगीतों में भी मुखरित होता है। राजस्थान के गांवों में पहले लड़किया गुड्डे-गुड्डी का खेल खेलती थी। तीज के दिन से गुड्डे-गुड्डी का खेल खेलना बन्द कर देती थी। इसलिये गांव की लड़किया एक साथ एकत्रित होकर अपनी पुरानी गुड्डे-गुड्डी को गांव के पास के नदी,तालाब, जोहड़ में बहा देती थी। जिसे गुड्डी बहावना कहा जाता था।
अपने सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिये स्त्रियां यह व्रत किया करती हैं। इस दिन उपवास कर भगवान शंकर-पार्वती की बालू से मूर्ति बनाकर शोडशोपचार पूजन किया जाता है जो रात्रि भर चलता है। स्त्रियों द्धारा सुंदर वस्त्र धारण किये जाते है तथा घर को सजाया जाता है। इसके बाद मंगल गीतों से रात्रि जागरण किया जाता है। इस व्रत को करने वालि स्त्रियों को पार्वती के समान सुख प्राप्त होता है। तीज का आगमन वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही आरंभ हो जाता है। आसमान काले मेघों से आच्छादित हो जाता है और वर्षा की फोहार पड़ते ही हर वस्तु नवरूप को प्राप्त करती है। ऐसे में भारतीय लोक जीवन में हरियाली तीज या कजली तीज महोत्सव का बहुत गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।
आज के दौर में ये सब बीती बाते बन कर रह गयी है। राजस्थान में मान्यता है कि गणगौर के साथ ही पर्व-त्यौंहार मनाना बन्द हो जाते हैं। वो तीज के दिन से पुनः मनाये जाने लगते हैं। तीज से शुरू होने के बाद त्योंहारों का सिलसिला गणगौर तक चलता है। इसीलिये राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है तीज त्योंहारा बावड़ी ले डूबी गणगौर।
- रमेश सर्राफ धमोरा
(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
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सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा-आराधना का विशेष महत्व होता है। सावन माह में पड़ने वाले व्रत भी पुण्यदायी व्रतों में से एक माने जाते हैं। सावन में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व होता है। वहीं प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, इसको सोम प्रदोष व्रत भी कहा जाता है। प्रदोष में व्रत रखना और भगवान शिव की पूजा-आराधना करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है।
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस व्रत में प्रदोष काल में शिवलिंग का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, बेलपत्र और भांग-धतूरा आदि अर्पित किए जाते हैं। वहीं शिव मंत्रों के जाप से भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष कृपा मिलती है। प्रदोष व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, संतान सुख और रोग आदि से छुटकारा मिलता है। इस बार 10 अगस्त को सोम प्रदोष व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं सोम प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे मे...
तिथि और मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 10 अगस्त को सुबह 8 बजे से होगी और इस तिथि का समापन 11 अगस्त को 4 बजकर 55 मिनट पर होगा। सावन सोम प्रदोष व्रत पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 05 मिनट से लेकर रात 09 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इस मुहूर्त में पूजा करना शुभ और फलदायी होता है।
पूजन विधि
इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करें और फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प करें। फिर भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद 11 या 21 बेलपत्र, आक के फूल, धतूरा, फल, सुपारी, इलायची, लौंग, धूप, दीप, फूल, गंध, चावल और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के दौरान घी और शक्कर से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
इसके बाद शिव मंत्रों का जाप करें और शिव चालीसा का पाठ करें। प्रदोष व्रत कथा पढ़े और पूजा के अंत में घी के दीपक से भगवान शिव की आरती करें। पूरा दिन व्रत रखते हुए मन में भगवान शिव का स्मरण करें और शाम को फिर से स्नान आदि करके प्रदोष काल में भगवान शिव की फिर से विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें।
महत्व
प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा-अर्चना का महत्व होता है। वहीं सावन में प्रदोष व्रत का महत्व बढ़ जाता है। भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे अच्छा मुहूर्त प्रदोष काल होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक प्रदोष का समय होता है, जब भगवान शिव कैलाश पर तांडव करते हैं और सभी देवी-देवता उनकी आराधना करते हैं। प्रदोष व्रत रखने और प्रदोष काल में पूजा करने, दीपदान करने, शिव चालीसा और रुद्राष्टक का पाठ करने से सभी तरह के पापों का अंत हो जाता है।
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