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Kuwait Security Risk: US Troops की मौजूदगी पर उठे सवाल, Iran के हमलों में भारी Casualties से हड़कंप

कुवैत में इन दिनों युद्ध को लेकर माहौल बदला हुआ नजर आ रहा है। कभी इराकी सेना के कब्जे से मुक्ति दिलाने वाली अमेरिकी सेना को सुरक्षा की गारंटी माना जाता था, लेकिन अब ईरान के लगातार हमलों के बीच कुछ कुवैती नागरिक अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी को ही अपने लिए खतरे की वजह मानने लगे हैं। छह महीने से जारी अमेरिका-ईरान युद्ध ने इस खाड़ी देश को मुश्किल स्थिति में ला खड़ा किया है।

गनीम अलसुलैमानी उन कुवैतियों में शामिल हैं जिन्हें 1990 में इराक के कुवैत पर हमले की तस्वीरें आज भी याद हैं। उस समय इराकी टैंक उनके शहर में पहुंच गए थे और अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने 1991 में सैन्य कार्रवाई कर कुवैत को इराकी कब्जे से मुक्त कराया था। इसके बाद अमेरिकी सेना ने कुवैत में अपनी सैन्य मौजूदगी कायम रखी और यह रिश्ता दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग का अहम आधार बन गया।

मौजूद जानकारी के अनुसार फरवरी के आखिर में अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर हमले शुरू होने के बाद क्षेत्रीय संघर्ष लगातार बढ़ता गया। ईरान और उसके सहयोगियों ने कुवैत में कई बार हमले किए। इन हमलों में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी वाले सैन्य ठिकानों के अलावा पानी साफ करने वाले संयंत्र और ऊर्जा प्रतिष्ठान जैसे नागरिक ढांचे भी निशाने पर आए हैं।

कुवैत की मुश्किल केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य बंद किए जाने से भी कुवैत पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। यह देश इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से जुड़ा हुआ है और उसकी आय का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात पर निर्भर है। युद्ध के कारण समुद्री परिवहन और ऊर्जा कारोबार प्रभावित होने की आशंका ने खाड़ी की अर्थव्यवस्थाओं की चिंता बढ़ा दी है।

इसके बावजूद गनीम अलसुलैमानी अमेरिका के साथ संबंधों को जरूरी मानते हैं। उनका कहना है कि ईरान का उद्देश्य खाड़ी देशों को अमेरिकी दबाव बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करना है। उनके मुताबिक कुवैत पर हमले के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप युद्ध रोकने या पीछे हटने का फैसला केवल कुवैत पर हमलों की वजह से नहीं करेंगे।

हालांकि, निजी बातचीत में कुछ कुवैती अब अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी पर सवाल उठा रहे हैं। एक कुवैती महिला ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर कहा कि अमेरिकी सेना की मौजूदगी की कीमत कुवैत को चुकानी पड़ रही है। हालांकि, उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर अमेरिकी सेना देश में नहीं होती तो ईरान के बढ़ते प्रभाव के बीच कुवैत की सुरक्षा कैसी होती।

गौरतलब है कि कुवैत में अमेरिकी सैनिकों की बड़ी मौजूदगी है। यहां अमेरिकी सेना के लिए हवाई अड्डों, सैन्य ठिकानों और प्रशिक्षण केंद्रों का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि ईरान के लिए कुवैत में मौजूद अमेरिकी ठिकाने आसान सैन्य निशाने माने जा रहे हैं। अब तक कुवैत पर हुए ईरानी हमलों में कम से कम 15 लोगों की मौत की जानकारी है, जिनमें छह अमेरिकी सैनिक, चार कुवैती सैनिक और पांच विदेशी नागरिक शामिल हैं।

कुवैत के सामने यही सबसे बड़ा द्वंद्व है। एक तरफ वह अमेरिका को उस देश के रूप में देखता है जिसने 1991 में उसे इराकी कब्जे से आजाद कराया था, तो दूसरी तरफ अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के कारण वह ईरान के हमलों की चपेट में भी आ रहा है।

बता दें कि क्षेत्र में अमेरिका के प्रति समर्थन पहले ही कमजोर हुआ है। गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई को अमेरिकी समर्थन मिलने के बाद कुवैत सहित कई अरब देशों में अमेरिकी कंपनियों के बहिष्कार के अभियान भी देखने को मिले थे। इसके बावजूद ईरान के बढ़ते प्रभाव और मौजूदा सुरक्षा हालात में कुवैत के लिए अमेरिका का विकल्प तलाशना आसान नहीं है।

कुवैत में अब युद्ध को लेकर चर्चा आम लोगों की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुकी है। बाजारों, रेस्तरां और सार्वजनिक स्थानों पर लोग लगातार बदलते हालात पर नजर रख रहे हैं। अमेरिकी सेना के साथ सुरक्षा सहयोग जारी है, लेकिन हाल के हमलों ने कुवैती नागरिकों के बीच डर और असमंजस जरूर बढ़ा दिया है। ऐसे में कुवैत के सामने सुरक्षा, आर्थिक हित और क्षेत्रीय संतुलन के बीच रास्ता तलाशने की चुनौती बनी हुई है।

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8th Pay Commission: फिटमेंट फैक्टर 3.83 हुआ तो इतनी बढ़ जाएगी सैलरी, 1 करोड़ कर्मचारियों की आ जाएगी मौज

8th Pay Commission: देश भर के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आ रही है. आठवें वेतन आयोग के गठन और उसकी सिफारिशों को लेकर हलचल तेज हो चुकी है. विभिन्न कर्मचारी संगठनों और पेंशनर्स यूनियनों के साथ आयोग की बैठकों का दौर लगातार चल रहा है. इस पूरी कवायद में सबसे अहम मुद्दा फिटमेंट फैक्टर का है. कर्मचारी यूनियनें लंबे समय से मांग कर रही हैं कि इस बार फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाकर तीन दशमलव आठ तीन किया जाए. अगर केंद्र सरकार इस मांग पर अपनी मुहर लगा देती है, तो केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी में ऐसा उछाल आएगा जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी. निचले स्तर से लेकर उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों तक हर किसी के खाते में आने वाली रकम में भारी बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी.

क्या होता है फिटमेंट फैक्टर और इसका पूरा गणित

वेतन आयोग की सिफारिशों में फिटमेंट फैक्टर सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है. यह वह तय पैमाना या गुणांक होता है जिसके आधार पर पुरानी बेसिक सैलरी को नई संशोधित बेसिक सैलरी में बदला जाता है. आसान शब्दों में कहें तो आपकी मौजूदा बेसिक सैलरी को जब तय फिटमेंट फैक्टर से गुणा किया जाता है, तब नया मूल वेतन तय होता है. सातवें वेतन आयोग के समय यह आंकड़ा दो दशमलव पांच सात तय किया गया था. इसके लागू होते ही कर्मचारियों का न्यूनतम मूल वेतन सात हजार रुपये से बढ़कर सीधे अठारह हजार रुपये हो गया था. अब आठवें वेतन आयोग में अगर इसे बढ़ाकर तीन दशमलव आठ तीन कर दिया जाता है, तो फिर से वेतन वृद्धि का एक नया रिकॉर्ड बन सकता है.

एक करोड़ से ज्यादा कर्मचारियों और पेंशनर्स को मिलेगा लाभ

वेतन में होने वाले इस बड़े बदलाव का सीधा फायदा देश के एक करोड़ से भी अधिक लोगों को मिलेगा. इसमें लगभग पचास लाख से ज्यादा मौजूदा केंद्रीय कर्मचारी और करीब पैंसठ लाख से अधिक पेंशनभोगी शामिल हैं. रिटायर्ड कर्मचारियों की पेंशन का निर्धारण भी इसी आधार पर किया जाता है, इसलिए उनके मासिक भुगतान में भी बड़ा इजाफा देखने को मिलेगा. महंगाई के इस दौर में लंबे समय से कर्मचारी अपने वेतन ढांचे में सुधार की राह देख रहे हैं. अगर फिटमेंट फैक्टर की यह मांग स्वीकार हो जाती है तो यह उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने में मील का पत्थर साबित होगी.

न्यूनतम बेसिक सैलरी में आ सकता है इतना बड़ा उछाल

यदि कर्मचारी यूनियनों द्वारा प्रस्तावित आंकड़े को सरकार की हरी झंडी मिल जाती है, तो सबसे निचले स्तर यानी लेवल एक के कर्मचारियों के वेतन में जोरदार छलांग देखने को मिलेगी. मौजूदा समय में न्यूनतम बेसिक सैलरी अठारह हजार रुपये है. तीन दशमलव आठ तीन के हिसाब से गणना करें तो यह रकम सीधे बढ़कर अड़सठ हजार नौ सौ चालीस रुपये पर पहुंच जाएगी. यानी केवल बेसिक पे में ही पचास हजार नौ सौ चालीस रुपये की सीधी और बड़ी बढ़ोतरी दर्ज होगी. इसके साथ ही महंगाई भत्ता और मकान किराया भत्ता जैसे अन्य भत्ते भी इस नई बेसिक सैलरी के आधार पर ही तय होंगे, जिससे कर्मचारियों की कुल इन हैंड सैलरी में जबरदस्त इजाफा होगा.

लेवल 2 से लेकर लेवल दस तक का पूरा वेतन समीकरण

वेतन आयोग के नए फॉर्मूले से अलग-अलग पे मैट्रिक्स लेवल के कर्मचारियों को अलग-अलग स्तर पर बड़ा लाभ मिलेगा. लेवल दो के कर्मचारियों का मूल वेतन जो फिलहाल उन्नीस हजार नौ सौ रुपये है, वह बढ़कर सीधे छिहत्तर हजार दो सौ सत्रह रुपये हो सकता है. इसी तरह लेवल तीन के कर्मचारियों का बेसिक पे इक्कीस हजार सात सौ रुपये से बढ़कर तिरासी हजार एक सौ ग्यारह रुपये तक पहुंच जाएगा.

मध्यम और उच्च स्तर के पदों की बात करें तो लेवल चार के कर्मचारियों की न्यूनतम सैलरी पच्चीस हजार पांच सौ रुपये से बढ़कर सत्तानवे हजार छह सौ पैंसठ रुपये होने का अनुमान है. लेवल पांच में यह रकम उनतीस हजार दो सौ रुपये से बढ़कर एक लाख ग्यारह हजार आठ सौ छत्तीस रुपये हो जाएगी. इसके अलावा लेवल छह के कर्मचारियों का मूल वेतन पैंतीस हजार चार सौ रुपये से बढ़कर एक लाख पैंतीस हजार पांच सौ बयासी रुपये और लेवल दस के अधिकारियों के लिए यह छप्पन हजार एक सौ रुपये से बढ़कर दो लाख चौदह हजार आठ सौ तिरेसठ रुपये के आंकड़े तक पहुंच सकता है.

आयोग की बैठकों का दौर जारी और कब तक होगा लागू

आठवें वेतन आयोग की टीम देश के विभिन्न हिस्सों का दौरा करके हितधारकों से लगातार चर्चा कर रही है. दिल्ली, पश्चिम बंगाल, लद्दाख और उत्तर प्रदेश में बातचीत पूरी होने के बाद अब आयोग की अगली महत्वपूर्ण बैठक बेंगलुरु में प्रस्तावित है. आयोग सात और आठ अक्टूबर को बेंगलुरु का दौरा करेगा और वहां के स्थानीय संगठनों से सुझाव लेगा. आमतौर पर देश में हर दस साल के अंतराल पर नया वेतन आयोग लागू किया जाता है. इस लिहाज से देखा जाए तो सिफारिशें तैयार होने और सरकार से अंतिम मंजूरी मिलने के बाद वर्ष दो हजार सत्ताईस के मध्य तक इस नए वेतन ढांचे के प्रभावी होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है.

यह भी पढ़ें: 8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग से पेंशनभोगियों की नजर, न्यूनतम पेंशन 45 हजार करन की मांग

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