डॉक्टरों की राय: स्वाइन फ्लू से घबराने की जरूरत नहीं, सावधानी बरतना जरूरी
नई दिल्ली, 25 अगस्त (आईएएनएस)। देश में एच1एन1 यानी स्वाइन फ्लू के मामलों को लेकर चिंता के बीच डॉक्टरों ने लोगों से घबराने के बजाय सावधानी बरतने की अपील की है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वाइन फ्लू संक्रमण खासकर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए अधिक परेशानी पैदा कर सकता है। ऐसे में लक्षण दिखाई देते ही चिकित्सकीय सलाह लेना और संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए आवश्यक सावधानियां बरतना जरूरी है।
यथार्थ हॉस्पिटल के डॉ. अनिल गोम्बर ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि एच1एन1 यानी स्वाइन फ्लू चिंता का विषय हो सकता है, क्योंकि यह बच्चों में अधिक आसानी से फैल सकता है। बच्चे आपस में करीबी संपर्क में रहते हैं, इसलिए उनमें संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। यह संक्रमण ड्रॉपलेट्स और हवा के जरिए फैल सकता है और बच्चों के बीच तेजी से फैलने की संभावना रहती है। खासतौर पर उन बच्चों में जो पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे हैं, उनका विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। बुजुर्गों को भी सावधानी बरतनी चाहिए। खासकर डायबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से पीड़ित तथा कम चलने-फिरने वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसे लोगों को संक्रमण होने की स्थिति में खुद को अन्य लोगों से अलग रखना चाहिए।
डॉ. गोम्बर ने स्वाइन फ्लू के लक्षणों के बारे में बताया कि इसमें बुखार, गले में खराश, सूखी खांसी, तेज बुखार, छींक आना और आंखों से पानी आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ लोगों को सांस लेने में परेशानी भी हो सकती है। इसके अलावा शरीर में कमजोरी और थकान महसूस होना भी इसके लक्षणों में शामिल है।
उन्होंने लोगों को सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि संक्रमण की स्थिति में कुछ दिनों तक खुद को अलग रखना चाहिए और डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाएं लेनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर एंटीवायरल दवाओं का इस्तेमाल भी चिकित्सकीय सलाह से किया जा सकता है। स्वाइन फ्लू को लेकर लोगों में काफी डर और घबराहट होती थी और गंभीर मामलों में कई लोगों की मौत भी हो जाती थी। हालांकि, अब मेडिकल साइंस काफी आगे बढ़ चुकी है। लोगों को पैनिक होने की जरूरत नहीं है। समय पर जांच और उचित इलाज से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने फ्लू वैक्सीन लगवाने की भी सलाह दी।
दूसरी ओर, स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी के बीच राजधानी दिल्ली के अस्पतालों ने भी तैयारियां तेज कर दी हैं। लोकनायक जय प्रकाश अस्पताल में स्वाइन फ्लू के मरीजों के लिए आइसोलेशन की व्यवस्था की गई है।
डॉ. सत्यजीत कुमार ने अस्पताल की तैयारियों के बारे में बताया कि इमरजेंसी वार्ड में सात बेड हैं, जिनमें पांच एचडीयू बेड और दो वेंटिलेटर बेड शामिल हैं। अगर किसी मरीज को इमरजेंसी बेड की जरूरत होती है तो उसे यहां लाकर जांच और इलाज किया जाता है। मरीज के लक्षणों के आधार पर उसे आगे संबंधित वार्ड में शिफ्ट किया जाता है।
डॉ. सत्यजीत कुमार ने भी लोगों से पैनिक नहीं करने की अपील की। छोटे बच्चों और बुजुर्गों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। अगर कुछ सामान्य सावधानियों का ध्यान रखा जाए तो संक्रमण से बचाव किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि खांसी होने पर मुंह और नाक को रुमाल या मास्क से ढकना चाहिए। जरूरत पड़ने पर मरीज घर पर भी खुद को आइसोलेट कर सकता है, ताकि संक्रमण दूसरे लोगों तक न फैले। सामान्य सर्दी-जुकाम भी बहुत से लोगों को हो सकता है। अगर गला खराब हो रहा है तो पर्याप्त मात्रा में गर्म पानी पीना राहत दे सकता है। हालांकि, लक्षण गंभीर होने या लगातार बने रहने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
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बच्चों की सेहत पर केंद्र का फोकस, समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम पर हुई राष्ट्रीय कार्यशाला
नई दिल्ली, 25 अगस्त (आईएएनएस)। बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (एसएसबीएसके) पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया। यह कार्यशाला 24-25 अगस्त को महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित की गई।
कार्यशाला की अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की अतिरिक्त सचिव और मिशन निदेशक आराधना पटनायक ने की। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बाल स्वास्थ्य और आशा कार्यक्रम के नोडल अधिकारी, तकनीकी विशेषज्ञ और विकास साझेदार शामिल हुए।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य एसएसबीएसके की ऑपरेशनल गाइडलाइंस को जमीनी स्तर पर लागू करना था, ताकि जन्म से लेकर 3 साल तक के बच्चों के लिए देखभाल की निरंतरता बनी रहे।
आराधना पटनायक ने अपने संबोधन में कहा कि भारत ने नवजात और बाल मृत्यु दर कम करने में बड़ी प्रगति की है, लेकिन अभी भी कमजोर नवजातों और बच्चों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा, बच्चों की सेहत में सुधार के लिए शुरुआती पहचान, जोखिम के आधार पर फॉलो-अप और समय पर कार्रवाई जरूरी है। उन्होंने जीवन के पहले 7 दिन और मस्तिष्क के विकास के लिए पहले 3 साल को सबसे महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने आशा, एएनएम, कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर, मेडिकल ऑफिसर और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत टीम वर्क पर जोर दिया।
कार्यशाला का सबसे बड़ा फोकस शैशव ऐप पर रहा। यह ऐप एसएसबीएसके को लागू करने में मदद करने वाला डिजिटल प्लेटफॉर्म है। इस ऐप के जरिए जोखिम वाले नवजात शिशुओं और बच्चों की पहचान, उनकी डिजिटल ट्रैकिंग, घर जाकर जांच का शेड्यूल, रेफरल और फॉलोअप किया जा सकेगा। यह ऐप बच्चे का एक लंबा हेल्थ रिकॉर्ड तैयार करेगा, जिससे जन्म से लेकर शुरुआती बचपन तक की जानकारी एक जगह उपलब्ध होगी।
कार्यशाला में बताया गया कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सही समय पर फैसले लेने के लिए किया जाएगा, लेकिन देखभाल में संवेदनशीलता और परिवार-केंद्रित दृष्टिकोण सबसे अहम रहेगा। साथ ही वीएचएसएनडी, आयुष्मान आरोग्य मंदिर और अन्य सेवाओं के जरिए फॉलोअप को मजबूत करने पर चर्चा हुई, ताकि स्वास्थ्य, पोषण या विकास संबंधी समस्याओं वाले बच्चों का फॉलो-अप न छूटे।
तकनीकी सत्रों में जोखिम की पहचान, होम विजिट शेड्यूल, मां के प्रसव के बाद के स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य, शिशु के खान-पान, विकास की निगरानी और खतरे के संकेतों की पहचान जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
परिवार की भूमिका पर भी विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों की देखभाल में माता-पिता के साथ-साथ दादा-दादी और परिवार के अन्य सदस्यों को भी शामिल करना जरूरी है। इस दौरान एसएसबीएसके से जुड़े कई संसाधन भी जारी किए गए, जिनमें उद्घाटन वीडियो, शैशव ऐप वीडियो और फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए ट्रेनिंग वीडियो शामिल हैं।
बता दें कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने 29 जून को एसएसबीएसके कार्यक्रम लॉन्च किया था। पहले तीन साल, संपूर्ण देखभाल के विजन पर आधारित यह कार्यक्रम एचबीएनसी और एचबीवाईसी को जोड़कर जन्म से 36 महीने तक एकीकृत, जोखिम-आधारित और डिजिटल रूप से सक्षम देखभाल व्यवस्था बनाता है। यह कार्यक्रम सिर्फ जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के स्वस्थ विकास, पोषण और समय पर रेफरल पर भी ध्यान देता है।
--आईएएनएस
एससीएच/डीकेपी
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