पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा के साथ जोड़ना होगा तभी इसका लाभ व्यापक स्तर तक पहुंचेगा: डॉ. जितेंद्र सिंह
नई दिल्ली, 25 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने मंगलवार को कहा कि भारत की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को आधुनिक विज्ञान, चिकित्सा और उभरती प्रौद्योगिकियों के साथ अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने की आवश्यकता है, ताकि इसका लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंच सके और इसकी उपयोगिता को नए आयाम मिल सकें।
डॉ. सिंह ने यह बात सीएसआईआर-परंपरागत ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (टीकेडीएल) के दौरे के दौरान कही। इस अवसर पर उन्होंने टीकेडीएल और विभिन्न शैक्षणिक तथा चिकित्सा संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। उनका मानना है कि पारंपरिक ज्ञान से जुड़े अनुसंधान को विश्वविद्यालयों और चिकित्सा संस्थानों से जोड़ने से इस क्षेत्र में नए शोध और नवाचार को प्रोत्साहन मिलेगा।
उन्होंने सुझाव दिया कि स्नातकोत्तर चिकित्सा विद्यार्थियों के लिए सह-मार्गदर्शन जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जानी चाहिए, ताकि छात्र पारंपरिक ज्ञान आधारित अनुसंधान में अधिक रुचि लें। उनके अनुसार, इससे टीकेडीएल के कार्यों को नई पीढ़ी के शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पारंपरिक ज्ञान को केवल आयुर्वेद या अन्य भारतीय चिकित्सा पद्धतियों तक सीमित दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बजाय इसे विज्ञान, चिकित्सा और अन्य आधुनिक विषयों के साथ जोड़कर व्यापक शोध और नवाचार का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहां बहु-विषयक अनुसंधान भविष्य की आवश्यकता बनता जा रहा है।
मंत्री ने युवा विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को पारंपरिक ज्ञान, बौद्धिक संपदा अधिकारों तथा ऐसे ज्ञान के दस्तावेजीकरण और संरक्षण की प्रक्रियाओं से परिचित कराने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनका कहना था कि यदि नई पीढ़ी को इस विरासत का महत्व समझाया जाए, तो भारत अपने पारंपरिक ज्ञान को वैश्विक स्तर पर और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत कर सकेगा।
बैठक के दौरान पारंपरिक ज्ञान से संबंधित ऑनलाइन शिक्षा और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों पर भी चर्चा हुई। इन पहलों का उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों तक पारंपरिक ज्ञान आधारित शिक्षा और प्रशिक्षण को पहुंचाना है।
डॉ. सिंह ने कहा कि भारत के पास एक ओर अत्याधुनिक वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताएं हैं, तो दूसरी ओर हजारों वर्षों से संचित समृद्ध पारंपरिक ज्ञान का भंडार भी है। इन दोनों को साथ लाकर अनुसंधान और नवाचार के लिए एक अधिक समन्वित और प्रभावी मॉडल विकसित किया जा सकता है।
चर्चा के दौरान टीकेडीएल के लिए विकसित डेटा संरचना और मानकीकृत शब्दावली की भी जानकारी दी गई। इससे पारंपरिक ज्ञान से संबंधित जानकारी को व्यवस्थित तरीके से खोजने और उसे ऐसे प्रारूप में प्रस्तुत करने में मदद मिलती है जिसे दुनिया भर के पेटेंट परीक्षक आसानी से समझ सकें।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, टीकेडीएल में उपलब्ध ज्ञान संसाधनों को अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, जापानी और स्पेनिश सहित कई भाषाओं में पेटेंट कार्यालयों के लिए उपलब्ध कराया गया है, जिससे भारत के पारंपरिक ज्ञान को गलत तरीके से पेटेंट कराने की कोशिशों को रोकने में महत्वपूर्ण सहायता मिली है।
उल्लेखनीय है कि टीकेडीएल की स्थापना वर्ष 2001 में की गई थी। प्रारंभ में इसका फोकस आयुर्वेदिक सूत्रों और उपचार पद्धतियों के दस्तावेजीकरण पर था, लेकिन बाद में इसका दायरा बढ़ाकर पारंपरिक ज्ञान की अन्य प्रणालियों को भी इसमें शामिल किया गया।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
बहुत जल्द एके-203 राइफलों की खेप भारतीय सेना को की जाएगी सुपुर्द, बढ़ेगी सेना की ताकत: मेजर जनरल सुधीश कुमार शर्मा
अमेठी, 25 अगस्त (आईएएनएस)। भारतीय सेना के लिए स्वदेशी एके-203 राइफल अब बॉर्डर पर गरजने के लिए पूरी तरह तैयार है। उत्तर प्रदेश के अमेठी जनपद के मुंशीगंज थाना क्षेत्र स्थित आयुध निर्माण फैक्ट्री में तैयार की जा रही इस आधुनिक राइफल को शेर नाम दिया गया है।
एके-203 राइफल के निर्माण और तैयारियों को लेकर इंडो रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड (आईआरआरपीएल) के प्रबंध निदेशक (एमडी) एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) मेजर जनरल सुधीश कुमार शर्मा ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने बताया कि बहुत जल्द एके-203 राइफलों की खेप भारतीय सेना को सुपुर्द कर दी जाएगी।
आईआरआरपीएल के एमडी और सीईओ मेजर जनरल सुधीश कुमार शर्मा ने आईएएनएस से कहा कि उत्तर प्रदेश के अमेठी जनपद के मुंशीगंज में इस स्वदेशी राइफल का तैयार होना बेहद गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रहित और देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तैयार की जा रही एके-203 शेर भारतीय सेना की ताकत बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
अमेठी की आयुध निर्माण फैक्ट्री में तैयार हो रही इस राइफल को लेकर स्थानीय स्तर पर भी गर्व का माहौल है। अब जल्द ही इसकी खेप भारतीय सेना के जवानों तक पहुंचने की उम्मीद है।
आईआरआरपीएल के एमडी और सीईओ मेजर जनरल सुधीश कुमार शर्मा ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, साल 2019 के आस-पास, भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय ने तय किया कि हमारी सेनाओं के लिए एके-203 राइफलें भारत में बनाई जाएंगी और इसके लिए टेक्नोलॉजी रूस से आएगी। यह फैसला उस समय लिया गया था, जिसके बाद एक कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया।
उन्होंने आगे कहा, रक्षा मंत्रालय को हम पर पूरा भरोसा है कि हम उन्हें राइफलें समय पर उपलब्ध करा देंगे। मेरा बोर्ड, शेयरधारक और हितधारक सभी इस बात से अवगत हैं। हमारी योजना इसी के अनुरूप बनाई गई है, ताकि हम इन सभी राइफलों का निर्माण इसी गति से कर सकें और अनुबंध के अनुसार निर्धारित समय सीमा 2032 से एक वर्ष पहले भारतीय सेना को सौंप सकें।
बता दें कि इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड (आईआरआरपीएल) उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के कोरवा में स्थित एक असॉल्ट राइफल बनाने वाली फैसिलिटी है। यह 6,00,000 से ज्यादा एके-203 असॉल्ट राइफल बनाने के लिए भारत के डीपीएसयू और रूस की कंसर्न कलाश्निकोव व रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के बीच एक जॉइंट-वेंचर है।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others
News Nation








